31 वें साल में ही इंद्रावती सेतु नहीं सम्हाल पाया पैरापेट वॉल, मेंटेनेंस पर उठ रहे सवाल  

एन.एच.ए.आई के पास है मेंटेनेंस का जिम्मा, 50 साल है पुल की उमर

धर्मेन्द्र महापात्र,  जगदलपुर| 50 साल की उमर, मगर 31 साल पूरा करते ही इंद्रावती सेतु कमजोर हो गया| लगातार 31 सालों तक इस पुल ने लाइफलाइन बन कर बस्तर को देश दुनिया से जोड़े रखा, मगर अफसोस इस बात का है कि अब लोग इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाने लगे है|

इन 31 सालों तक न जाने कितनी भारी वाहनें पुल से गुजरी होंगी,मगर 1 साल पूर्व पुल के दोनों ओर लगाए गये  पैरापेट वॉल के चलते पुल के अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं|

शुरुवाती कारण तो यही बताया जा रहा है| आखिर कुछ टन वजनी पैरापेट वॉल को इंद्रावती सेतु सम्हाल क्यों नहीं पाई|

क्या उत्तर प्रदेश ब्रिज कारपोरेशन लिमिटेड और पीडब्लूडी ने इसके डिजाइन में कुछ कमी खामियां नहीं देखी या उस वक्त के एल.टी मिस्त्री कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कंक्रीट में कुछ कमी रखी या फिर वर्तमान मेंटेनेंस एजेंसी एन.एच.ए.आई इसका सही ढंग से देखभाल नहीं कर पा रहा|

इन तमाम सवालों के बीच बस्तर की जनता को तो अब यही लगने लगा है कि इसके 50 साल की मियाद आने से पहले ही पुल को मृत घोषित कर दिया जायेगा|

इसी नदी के कुछ दुरी पर आज भी 78 साल पुराने  पुल पर लोग ज्यादा भरोसा करते हैं हालांकि इस पुल पर केवल दुपहिया व साइकिलो को आने जाने की अनुमति है|लेकिन आज भी इसे एक मजबूत पुल माना जाता है|

द्वितीय विश्व युद्ध के समय 1939 में अंग्रेजों के समय में पुराने पुल का निर्माण प्रारंभ किया गया था जो महज 3 साल की अवधि में ही 1942 में बनकर तैयार हो गया था और आज यह पुल वैसे ही खड़ा है जैसे 78 साल पहले हुआ करता था|

बस्तर में ऐसे कई पुल-पुलिया है जो कई सदियों पहले बनाए गए मगर इंद्रावती नदी पर बने सेतु के हाल ही में एक हिस्से के खिसक जाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं|

दरअसल 21 जनवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बस्तर आए थे बोधघाट परियोजना के साथ-साथ उन्होंने इंद्रावती नदी में सेतु निर्माण के लिए भी भूमि पूजन किया था|

यह पुल 1987 को बनकर तैयार हो गया| 1989 में अविभाजित मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा और राज्यपाल सरला ग्रेवाल ने आम लोगों के लिए इसे लोकार्पित किया|

उत्तर प्रदेश ब्रिज कॉरपोरेशन लिमिटेड के द्वारा बनाए गए इस पुल की लाइफ 50 साल तक की है|

मगर कुछ दिन पूर्व पैरापेट वॉल की वजन को पुल का किनारा सम्हाल नहीं पाया और भरभरा के जमीन के नीचे आ गिरा|

प्राथमिकी तौर पर  पैरापेट वॉल को इसका जिम्मेदार बताया जा रहा है|पुल का हिस्सा गिर जाने से लोगों को यह शंका होने लगी कि अब नया पुल सुरक्षित नहीं है|

इंद्रावती नदी में बने इस पुल को बस्तर के लोग नए पुल के नाम से जानते  पहचानते हैं लिहाजा लोग गंभीरता के साथ पुल के गिरे हिस्से को देखने भी पहुंचे|

विभागीय टीम भी संशय में है कि आखिर इतनी मजबूत पुल का एक हिस्सा गिर कैसे गया| वर्तमान में नए नये पुल के रखरखाव का काम एन.एच.ए.आई के पास है|

वर्ष 2019 में पीडब्लूडी राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग द्वारा जगदलपुर – रायपुर रोड को एन.एच.ए.आई को हस्तांतरित कर दिया गया था| तब से एन.एच.ए.आई इस मार्ग के रखरखाव का काम कर रही है|

पीडब्लूडी राष्ट्रीय राजमार्ग के श्री गुरु ने जानकारी देते हुए बताया कि समस्त कागजी कार्रवाई के साथ जगदलपुर – रायपुर राष्ट्रीय राजमार्ग एन.एच.ए.आई को दे दिया गया है| मार्ग में बने पुल पुलिया और सड़क की देखरेख अब एन.एच.ए.आई के हवाले हैं|

वही एन.एच.ए.आई के वरिष्ठ अधिकारी श्री चौधरी से संपर्क किए जाने पर उन्होंने कहा कि एक एक्सपर्ट टीम पुल क्षतिग्रस्त होने के मामले की जांच करने जगदलपुर आई हुई है| उनके रिपोर्ट का इंतजार है रिपोर्ट आने पर ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि किस वजह से पुल का एक हिस्सा नीचे गिरा|

बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार एस.करीमुद्दीन ने बताया कि इंद्रावती पुल उद्घाटित होते ही इलाके के नेता महेंद्र कर्मा अपने कुछ साथियों के साथ निरीक्षण किया था और उन्होंने उस वक्त पुल में बने स्पॉन को गलत बताया था और उसकी वजह से आगे दिक्कत होने की चेतावनी भी दी थी| श्री करीमुद्दीन ने बताया कि पुल पर सबसे पहले इलाके के पत्रकारों और अधिकारियों को पार कराया गया था उसके बाद आम जनता के लिए यह मार्ग खोल दिया गया| उन्होंने बताया कि कि नए पुल के बन जाने से इलाके के लोगों में काफी खुशी देखी गई थी|

वहीं बस्तर कलेक्टर रजत बंसल से पुल का हिस्सा गिरने की जानकारी मिलने की बाद जाँच कराये जाने की बात कही है|