कोरिया: वन अधिकार कानून के जरिए मिली जमीन से आत्मनिर्भर की ओर ग्रामीण

सामूहिक श्रमदान से 700 ग्रामीणों की जमीन पर लगे फलदार पौधे  

कोरिया। वनाधिकार कानून के लागू होने से पूर्व वन विभाग की जमीन पर काबिज ग्रामीणों को हमेशा इस बात का डर लगा रहता था कि कहीं उन्हें वन विभाग जमीन से बेदखल न कर दे, इसीलिए ग्रामीण संबंधित जमीनों का अस्थाई तौर पर इस्तेमाल करते थे और उस पर अल्पकालीन फसलें लगाया करते थे। लेकिन जब से सरकार ने इन्हें वन अधिकार के तहत संबंधित जमीनों का पट्टा दे दिया है, तब से ग्रामीण इन जमीनों को रोजी रोटी का जरिया बनाने में जुटे हुए हैं।

कोरिया जिले के भरतपुर सोनहत क्षेत्र के सैकड़ों आदिवासियों ने अपनी जमीनों पर फलदार पौधों का रोपण किया है, ताकि आगे चलकर वे इनसे आय प्राप्त कर सकें और आत्मनिर्भर बनें।

वन अधिकार अधिनियम-2005 के तहत कोरिया जिले में भी बड़ी संख्या में आदिवासियों और अन्य समुदाय के लोगों को वनाधिकार पट्टे दिए गए हैं। पूर्व में यहां के ग्रामीण गांव से लगी हुई वन भूमि पर दलहन तिलहन की छोटी – मोटी खेती किया करते थे। इससे उन्हें थोड़ी बहुत आय हो जाती थी।

भरतपुर सोनहत ब्लॉक के तरतोरा, लाखनटोला, कन्नौज और धुमका जैसे अनेक गांव हैं, जहां के सैकड़ों ग्रामीण पट्टे पर मिली जमीनों पर अब फलदार पौधों का रोपण कर रहे हैं। ऐसे ग्रामीणों की संख्या 700 से भी अधिक है, जो एकता परिषद और प्रयोग समाजसेवी संस्था से जुड़े हुए हैं। संस्था की प्रेरणा से ग्रामीण अभियान के रूप में वृक्षारोपण कर रहे हैं।


प्रयोग समाजसेवी संस्था के समन्वयक राजेन्द्र चंदेल ने बताया कि ग्रामीण श्रमदान करते हुए एक दूसरे की चिन्हित जमीनों पर फलदार पौधे लगा रहे हैं। पौधे इन्हें वन विभाग और जनकपुर स्थित उद्यानिकी विभाग की नर्सरी से मिल रहे हैं। प्रत्येक किसान कम से कम 20 पौधे लगा रहे हैं। इसके अलावा खाली पड़ी हुई शासकीय जमीन पर भी इनके द्वारा सामूहिक रूप से फलदार पौधों का रोपण किया गया है, ताकि भविष्य में इन जमीनों पर अतिक्रमण न हो सके।

आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम
राजेन्द्र चंदेल बताते हैं कि पट्टे पर मिली जमीनों का इस तरह सदुपयोग करके ग्रामीण आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। ग्रामीण अपने पट्टे की जमीन पर घेरेबंदी भी कर भी रहे हैं, ताकि पौधों की सुरक्षा हो सके। ग्रामीणों द्वारा पौधों के साथ ही अपनी जमीनों पर बाड़ी तैयार करके सब्जी -भाजी भी लगाई जा रही है। आने वाले समय में पौधे बड़े होकर वृक्ष बनेंगे और उनमें लगने वाले फल ग्रामीणों की आय का जरिया बनेंगे।

ग्राम कोष और अनाज बैंक
इस आदिवासी बाहुल्य इलाके में ग्रामीणों द्वारा जरूरत होने पर साहूकारों से ऋण लेने की परंपरा रही है। अधिक ब्याज और समय पर पैसे नहीं पटा पाने के चककर में ग्रामीण कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, और कई तो अपनी संपत्ति भी गवां बैठते हैं।ऐसे साहूकारों से ही बचाने के लिए गावों में प्रयोग संस्था द्वारा ग्राम कोष और अनाज बैंक की स्थापना की गई है। प्रत्येक गांव की इकाई की हर 15 दिनों में बैठक होती है। इस दौरान हर सदस्य एक किलो चावल और 10 रूपए का अंशदान संस्था में जमा करता है। भविष्य में जब भी किसी सदस्य के परिवार में मांगलिक या अन्य कार्य के लिए अनाज की जरूरत होती है, तो संस्था उसे इस शर्त पर चावल देती है कि वह लौटाते समय संस्था में 5 किलोग्राम चावल और जमा करेगा। इसी तरह जरूरतमंद ग्रामीणों को मात्र 2 प्रतिशत ब्याज दर पर रूपए ऋण के रूप में दिए जाते हैं। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि ग्रामीणों का यह बैंक चौबीसों घंटे खुला रहता है,अर्थात रुपया और अनाज संस्था के मुखिया के पास रखा होता हैं, जो जरूरत पड़ने पर आधी रात को भी सदस्यों को दिया जा सकता है। इससे ग्रामीणों में बचत की प्रवृत्ति भी बढ़ती है।

वंचितों को पट्टा दिलाने का प्रयास
इलाके में जिन ग्रामीणों को वन भूमि पर कब्जे के बावजूद पट्टा नहीं दिया गया है, उन्हें पट्टा दिलाने के लिए नए सिरे से संस्था द्वारा प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए स्थानीय एस डी एम और वन विभग से समन्वय स्थापित कर जमीन का पट्टा दिलाने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा कोरोना काल में दीवारों पर पेंटिंग करके ग्रामीणों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है।

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