बस्तर दशहरा : कांटों के झूले पर बैठ दी इजाजत

काछनगादी रस्म अदाएगी के साथ बस्तर दशहरा शुरू

जगदलपुर| विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की रस्मों की शुरुआत हुई, जब काछनदेवी ने पर्व मनाने की अनुमति दी। लगातार चौथी बार भी बड़ेमारेंगा की रहने वाली 9 साल की अनुराधा काछनदेवी बनी। बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद भजंदेव अपने लाव लश्कर के साथ राजमहल से बाजे-गाजे और आतिशबाजी के साथ निकलकर काछनगुड़ी पहुंचे।

                जहां पर परम्परानुसार काछनदेवी से विधिवत दशहरा मनाने की अनुमति ली। काछनगादी रस्म के तहत 9 साल की कन्या अनुराधा पर शाम को कथित तौर पर रण की देवी का आवेश आया। उस दौरान छोटी सी बालिका को देवी रूप में बेल कांटों के झूले में झुलाया गया।

                 इसी दौरान बस्तर राजपरिवार के कमलचंद भंजदेव काछन देवी की पूजा-अर्चना कर बस्तर दशहरा पर्व शुभारंभ करने के साथ ही निर्वाध रूप से संपन्न कराने की अनुमति ली। काछनगादी रस्म के साथ ही विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी भव्यता के साथ शुरू हुई।

जानकार बताते हैं कि करीब छह सौ साल पहले यह परंपरा 17वीं शताब्दी में शुरू हुई। इसके बाद से अब तक काछनगादी परंपरा चलती आ रही है। इसके पहले शनिवार को काछनदेवी काछनगुड़ी पहुंची। उनके साथ गुरूमाई, सिरहाइन और सहायक पुजारी भी पहुंचे। पुजारी सुकलु दास ने बताया कि करीब 1 महीने तक अनुराधा का पूरा परिवार यहीं रहकर पूजा-अर्चना करता है। दशहरा पर्व खत्म होने के बाद उनकी विदाई होती है।