Exclusive : बस्तर के इतिहास-बोध में देवी प्रतिमाएं

नवरात्रि पर विशेष आलेख श्रंखला - पहली कड़ी

देश टीवी विशेष|बस्तर (छतीसगढ़) में पले–बढ़े,वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी मे प्रबंधक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर की गहरी संवेदनाओ के साथ पड़ताल की है। कला, संस्कृति, साहित्य, राजनीति से लेकर तमाम सामयिक मुद्दों पर वे लिखते रहते हैं। वे बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों, और विशेषताओं को सामने रखते हैं जो अब तक बहुत कम देखने-सुनने-पढ़ने को मिलती है। चर्चित किताब ‘आमचो बस्तर’ के लेखक राजीव रंजन प्रसाद को उनकी किताब ‘बस्तरनामा’ के लिए भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने अपने प्रतिष्ठित ‘राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार’ से सम्मानित किया है। देश टीवी पोर्टल पर नवरात्रि के नौ दिनों तक उनके आलेखों की श्रृंखला की यह पहली कड़ी – संपादक

बस्तर की देवी-प्रतिमायें हमारे इतिहासबोध को दिशा प्रदान करती हैं। ये प्रतिमायें हमें इस अंचल में किसी समय शाक्त सम्प्रदाय की बहुलता का संकेत देती हैं। धार्मिक कारणों से देवी प्रतिमाओं का अपना महत्व है, तथापि इन्हें समझने की कोशिश किसी अध्येता को अंचल के समाजशास्त्र के नजदीक लाने में सक्षम है। नवरात्र के अवसर पर इस भूमिका आलेख का उद्देश्य बस्तर अंचल में शाक्त प्रभाव पर एक विहंगम दृष्टि प्रदान करना है। नौ आलेखों के श्रखला की कड़ियों में बस्तर संभाग के प्रमुख देवी-मंदिर तथा प्रतिमाओं पर विमर्श प्रस्तुत किया जाना है। अत: उपसंहार में इतना ही कि आस्थाओं और मान्यताओं को किसी भी पूर्वाग्रह से परे रख कर देखने की आवश्यकता है।
                                                                                        – राजीव रंजन प्रसाद

स्त्रीविमर्श के इतिहास को टटोलने की कोशिश में आस्थाओं को परे हटा कर नहीं देखा जा सकता। धरती के कोने-कोने में फैली प्रत्येक धार्मिक मान्यता में देवी अथवा स्त्री की किसी न किसी रूप में भूमिका रही है। हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त मृण्मुहरों में देवी प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं। वह महाकाव्यों का युग हो, जनपदों का युग हो अथवा साम्राज्यों के बनने-बिगड़ने की समयावधि, भारत में देवी शक्ति-स्वरूपा मानी गयी हैं तथा उनके उपासना की महत्ता सर्वदा रही है। पूर्व वैदिक काल में उषा और निशा जैसे प्रहरों को देवी के रूप में कल्पित किया गया है, धरती को देवी की मान्यता प्राप्त है। उत्तर वैदिक काल में देवी-मान्यतायें अधिक सशक्तता से सामने आयी हैं, अनेक ग्रंथों में उनकी महिमा व शक्ति-सामर्थ्य का स-विस्तार वर्णन किया गया है।

                           उत्तर वैदिक कालखण्ड के ग्रंथों में अम्बिका, उमा, दुर्गा, काली आदि देवियों का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत के दुर्गा स्त्रोत में देवी महात्म्य का स-विस्तार वर्णन है। मार्कण्डेय पुराण में महिषासुरमर्दिनी की उत्पत्ति, स्वरूप तथा उनके द्वारा किये गये महिषासुर सहित अनेक राक्षसों के संहार का विवरण दिया गया है। इसी तरह मान्यता है कि देवताओं द्वारा शुभ्म और निशुम्भ राक्षसों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना देवी पार्वती से की गयी, फलस्वरूप अम्बिका उत्पन्न हुई। अम्बिका को उनके काले रंग के कारण देवी काली के रूप में भी जाना गया है। चण्ड और मुण्ड राक्षसों का विनाश करने के पश्चात देवी अम्बिका को चामुण्डा नाम से पहचान मिली। मुण्डकोपनिषद में अग्नि की सात जिव्हा बतलायी गयी है – काली, कराली, मनोजवा, सुलेहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुर्तिगनी और विश्व रुचि। यही संकल्पना कालांतर में सप्तमातृकाओं से जुड़ जाती है। देव शक्तियाँ वास्तव में सप्तमातृकायें हैं अर्थात ब्रम्हा की शक्ति – ब्राम्ही, विष्णु की वैष्णवी, शिव की माहेश्वरी, कुमार की कौमारी, वराह की वाराही, इन्द्र की इंद्राणी तथा यम की चामुण्डा। वाराह मिहिर की वृहतसंहिता के अनुसार सभी मातृकायें अपने देवता के वाहन, आयुध और चिन्हों से जानी जाती हैं

                                    बस्तर अर्थात प्राचीन दण्डकारण्य का क्षेत्र अपने विशिष्ठ इतिहास के लिये प्रसिद्ध है। इस वनांचल में नल वंशीय राजाओं ने ईसा पूर्व 600 से 760 ई. तक शासन किया। इस समयावधि की सबसे भव्य निर्मिति राजिम के पास स्थित राजिवलोचन मंदिर है। इस मंदिर के महामण्डप की दक्षिणवर्ती पार्श्व भित्ति स्तम्भ पर देवी दुर्गा की अष्टभुजी मूर्ति उकेरी गयी है। इसी तरह छिंदक नाग वंशीय शासकों ने 760 ई. से 1324 ई. तक बस्तर में अपनी सत्ता कायम रखी। अभिलेखों से साक्ष्य मिलते हैं कि नागवंशीय शासकों की कुलदेवी मणिकेश्वरी थी। इसके साथ ही साथ कुरुषपाल से प्राप्त नाग राजा सेमेश्वरदेव के अभिलेख (11वीं सदी) में विंध्यवासिनी देवी का उल्लेख मिलता है। यह दौर तंत्र साधना के लिये भी जाना जाता है, राजपुर ताम्रपत्र (1065 ई.) में उल्लेख मिलता है कि राजा मधुरांतकदेव ने नरबलि के लिये एक ग्राम दान किया था। इस अंचल में राजतंत्र की आखिरी कड़ी था – चालुक्य शासन (1324 ई. से 1947 ई.)। देवी दंतेश्वरी को चालुक्य शासकों की कुलदेवी के रूप में जाना जाता है। बस्तर आरण्यक से ज्ञात होता है कि राजा अन्नमदेव ने 14 वी सदी में दंतेवाड़ा में देवी मंदिर का निर्माण करवाया। दंतेवाड़ा में स्थित मंदिर में काले प्रस्तर से निर्मित देवी दंतेश्वरी की प्राचीन प्रतिमा वस्तुत: महिषासुरमर्दिनी का ही स्वरूप है।

                       बस्तर के विभिन्न कालखण्ड को यहाँ प्राप्त देवी प्रतिमाओं पर उकेरी गयी नक्काशियों, वस्त्राभूषणों आदि से पहचाना जा सकता है। इस अंचल में पाई गयी असंख्य देवी प्रतिमायें तथा मंदिर एक समय में शाक्त सम्प्रदाय के प्रभावी होने की ओर इशारा करते हैं। एक दृष्टि इस अंचल में प्रमुख देवी प्रतिमाओं पर डालनी आवश्यक है। महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमायें बारसूर, दंतेवाड़ा, छोटे डोंगर, कोण्डागाँव, फंदीवाया, भण्डारसिवनी आदि स्थानों पर प्रमुखता से पायी गयी हैं। अन्य उल्लेखनीय प्रतिमायें भोपालपट्टनम (भद्रकाली), भैरमगढ (चतुर्भुजी पार्वती), समलूर (गौरी), बारसूर (अष्टभुजी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, भैरवी, वाराही, चामुण्डा आदि), बस्तर ग्राम (चामुण्डा), सुरडोंगर (दुर्गा), छिंडगाँव (चामुण्डा), जगदलपुर (पार्वती, कात्यायनी, अम्बिका, इंद्राणी) आदि स्थानों पर प्राप्त हुई हैं।