नहीं रहे प्रोफेसर खेरा, 92 बरस की उम्र…30 साल आदिवासियों को समर्पित…

प्रो. प्रभुदत्त खेरा ने बिलासपुर के अपोलो में ली अंतिम साँसे

बिलासपुर। अचानकमार के जंगल में एक छोटा सा आशियाना बनाकर बीते 30 सालों से शिक्षा की अलख जगाने वाले प्रोफेसर खेरा को आज मौत ने हरा दिया। लंबे समय से अपनी ज़िंदगी और मौत की जंग के बिच आज उन्होंने अपना देह त्याग दिया। बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में भर्ती प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा ने आज अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन पर सुबे के शिक्षा जगत और आदिवासियों के हित की बात करने वाले सभी समाज सेवी संगठन और आदिवासी समाज शोकाकुल है।

             वही प्रदेश के मुख्यमंत्री और तमाम नेता उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है “अचानकमार के घने जंगलों के बीच 30 साल तक कुटिया बनाकर बैगा आदिवासियों के बीच शिक्षा का उजियारा फैलाने वाले, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. प्रभुदत्त खेड़ा के निधन की खबर सुनकर मन दुःखी है। डॉ खेड़ा त्याग, संकल्प और नि:स्वार्थ सेवा की प्रतिमूर्ति थे। विनम्र श्रद्धांजलि ”

दिल्ली साहब के नाम से मशहूर
दिल्ली में पूरी लग्जरी लाइफ छोड़कर अचानकमार के जंगलों में पहुंचे प्रोफेसर खेरा “दिल्ली साब” के नाम से मशहूर थे। उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में रहने वाले हर आदिवासी बच्चा कम से कम 12वीं तक अपनी शिक्षा दीक्षा ले। वे खुद भी इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए 12वीं कक्षा तक के स्कूल का संचालन करते थे। डॉ खेरा दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

राज्य का पहला गांधी सम्मान
छत्तीसगढ़ की पिछली सरकार ने वनांचल में शिक्षा की अलख जगा रहे प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा को पहला “मुख्यमंत्री गांधी स्मृति सम्मान” से सम्मानित भी किया था। जिसमें प्रोफेसर खेड़ा को 5 लाख रुपए व प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया था। यह राशि भी उन्होंने वनांचल में रहने वाले बच्चों की शिक्षा दीक्षा में लगा दी थी। गौरतलब है कि प्रोफेसर खेरा पहले व्यक्ति थे, जिन्हें छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से “मुख्यमंत्री गांधी स्मृति सम्मान” दिया गया था।