देश-विशेष : इश्क के लिए आंखों की नहीं दिल की रौशनी चाहिए, एक-दूजे के हुए गूंजा-सूरज

महफिल को रौशन कर दिया आंखों से बेरौशन बारातियों ने

बैकुंठपुर। क्या हुआ जो आंखें रौशन नहीं, इश्क के लिए दिल चाहिए और दिल सीरत देखता है सूरत नहीं। जब दो दिल मिलते हैं, तब कुछ कुछ होता है और प्यार का समंदर लहर मारते एक-दूजे में खो जाता है। बस कुछ ऐसी ही दास्तान है प्यार के सफर के हमराही कोरिया के दो जवान दिलों की।
आंखों की रौशनी से महरूम गूंजा और सूरज ने साथ-साथ जीनें मरने का वादा किया और जीवन के इस नए सफर के लिए निकल पड़े। दो अलग-अलग जात बिरादरी भी इनके आगे रोड़ा नहीं बनी। माता-पिता, परिजनों ने सहर्ष स्वीकृति दी और गूंजा के घर पहुंची बारात, जहां वे एक-दूजे के हो गए और इस पल के साक्षी बने वे तमाम दोस्त जो सभी आंखों की रौशनी से महरूम हैं। हम बात कर रहे हैं कोरिया जिले के डुमरिया गांव में सम्पन्न इस में दृष्टिबाधित जोड़े की जो परिणय सूत्र में बंधे। जात-बिरादरी के बंधन को धता बताते इस अंतरजातीय विवाह में बारात ग्वालियर से आई थी। पूरा गांव अपनी इस बेटी की शादी में शामिल होकर आशीर्वाद दिया। बैकुंठपुर जनपद के डुमरिया गांव निवासी दादूराम पनिका की बड़ी बेटी गूंजा जन्म से ही देख नहीं पाती थी। पर पढ़ने में तेज होने कारण उसे पिता ने मध्यप्रदेश के चित्रकूट के रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय में दाखिला करा दिया। जहां से उसने ब्रेल लिपि के माध्यम से बीएड की पढाई पूरी की।

पढ़ाई के दौरान ही मध्यप्रदेश के ग्वालियर निवासी सूरज से उसकी मुलाकात हुई। सूरज भी उसी महाविद्यालय का छात्र था और वो वहां संगीत कला में आईटीआई कर रहा था। वह माधव अन्ध आश्रम में संगीत सिखाता है। मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और पढ़ाई पूरी करते-करते दोनों एक –दूसरे को दिल दे चुके थे। प्यार परवान चढ़ा और फिर दोनों ने हमसफर बनने का फैसला किया। दोनों ने अपने परिजनों को इससे अवगत कराया। अलग जात बिरादरी के बाद भी दोनों के परिवारवालों नो सहर्ष स्वीकृति दी। फिर सूरज ग्वालियर से बारात लेकर पहुंचा और बाराती थे उस कालेज के छात्र जो आंखों की रौशनी से महरूम थे।पूरे गांव ने बारात का स्वागत कर अपनी इस बेटी को आशीर्वाद दिया। इस मौके पर आयोजित समारोह की खुशियां तब दूनी हो गईं जब इन बाराती छात्रों ने आर्केस्ट्रा के साथ एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दी।