राजनांदगांव: आजादी के बाद पहली बार देखी मलैदा ने चमचमाती सड़क

बीहड़ इलाके में बसे आदिवासी बाहुल्य मलैदा के बाशिंदो के लिए बनी लाईफ लाइन

प्रदीप मेश्राम, राजनांदगांव। राजनांदगांव जिले के दुर्गम क्षेत्र में बसे वनग्राम मलैदा के 42 साल के रामसिंग पंद्रे को सहसा यह यकीन नहीं हो रहा है कि जिस उबड़-खाबड़ रास्ते में सफर करने से दम निकलता था, अब वह एक चमचमाती सड़क  लाईफ लाइन बन गई है। इस पूर्व पंच को यह समझने में वक्त लग रहा है कि शहरी आबो हवा से कोसो दूर यह गांव भी पक्की सड़क से जुड़ गया है। देश की आजादी के 70 साल बाद आदिवासी बाहुल्य मलैदा गांव के बाशिंदे पहली बार कच्ची मार्ग में डामर की परत बिछने से बेहद खुश हैं।

गातापार से मलैदा तक बनी 14 किमी तक बनी यह सड़क नक्सलियों के लिए काफी मुफीद मानी जाती है। यह रास्ता कई अंधे मोड़ और खतरनाक ऊंचाईयों से घिरा हुआ है। कच्चे मार्ग के स्वरूप में इस रास्ते से आवाजाही करने में 2 से 3 घंटे का वक्त लगता था। अब यह तकलीफ मलैदावासियों के लिए दूर हो गई है।

प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत करीब 4 साल के लंबी मशक्कत के बाद पक्की सड़क के स्वरूप में यह कच्चा मार्ग आया है। पक्के सड़क के अभाव में मलैदा के साथ-साथ अंदरूनी इलाके के गांव जुरलाखार, भावे और भोथली भोजारी जैसे कुछ गांव में पहुंचना आसान नहीं था। कच्चे मार्ग की स्थिति में ग्रामीणों को प्रसूति, स्कूल, हाट बाजार तथा अन्य घरेलू कार्य के लिए गातापार पहुंचने के लिए 2 से 3 घंटे का समय लगता था। इस मार्ग को नक्सलियों ने हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए भी अपने कब्जे में रखा था।

गातापार से मलैदा के बीच दर्जनभर एम्बुस पाईंट बनाकर नक्सली फोर्स को डराने-धमकाने का काम करते थे। कच्चे मार्ग में चलते हुए फोर्स को नक्सली अपने निशाने में रखते थे। नई सड़क को मूर्तरूप देने के लिए पुलिस जवानों की भी अहम भूमिका रही है। नक्सलियों द्वारा मार्ग निर्माण में खलल पैदा करने के लिए कई बार वाहनों को आग के हवाले किया गया। वहीं फोर्स के साथ कई बार मुठभेड़ भी हुआ। इसकी परवाह किए बगैर जवानों ने सड़क निर्माण कार्य में पुख्ता सुरक्षा का माहौल बनाकर अपनी जवाबदारी को बखूबी निभाया। नतीजतन आज एक चमचमाती सड़क से मलैदा सीधे जुड़ गया।

गातापार से मलैदा जाने के लिए एक बड़ी पहाड़ी को भी पार करना पड़ता है। कच्चे मार्ग से पहाड़ को लांघना आसान काम नहीं था। लगभग दर्जनभर पुल-पुलिया बनाकर सड़क को सुगम रूप दिया गया है। मलैदा से पहले एक बड़े नाले में पुल निर्माण से ऊबाउ सफर राहत दे रहा है। नए रास्ते में आवाजाही करते ग्रामीणों के चेहरे में थकान गायब हो गई है। पहले चरण में गातापार से मलैदा तक बने इस मार्ग को बकरकट्टा तक विस्तार किए जाने का काम चल रहा है। अगले कुछ सालों में इस रास्ते में नियमित आवाजाही होने से नक्सल खौफ भी बेअसर साबित होगी। लंबा कच्चा मार्ग होने के कारण अंदरूनी बाशिंदों को विकास की धारा में शामिल होने का मौका नहीं मिलता था।

हाल ही के वर्षों में राज्य सरकार ने विकास से पिछड़े इलाकों को संवारने के लिए सड़कों का जाल बिछाने का इरादा जाहिर किया। मलैदा को वन ग्राम का दर्जा है। लिहाजा वन नियमों की मंजूरी मिलने के बाद ही विकास कार्य कराए जाने की बंदिशें रही है। करीब 3 साल पहले इस गांव को ‘लालटेनÓ युग की काली छाया से छुटकारा मिला है। गांव में बिजली की तारें भी पहुंच गई है। भारत की आजादी के बाद मध्यप्रदेश की सीमा से सटा मलैदा गांव अब भी विकास से कोसो दूर है। सड़क से जुडऩे के बाद गांव के लोगों को अपनी जीवन स्तर में सुधार आने की उम्मीद जगी है।

गातापार पंचायत के अधीन गांव के पंच राजेन्द्र पंदे्र ने बताया कि मलैदा वासियों के लिए सड़क बनना किसी स्वप्न की तरह है। सड़क के बन जाने से प्रसूति और बीमार लोगों को इलाज के लिए लाने-ले-जाने के लिए चुनौती खत्म हो गई है। वहीं स्कूल के लिए भी बच्चों को आने-जाने में आसानी होगी।

गांव के ही पूर्व पंच रामसिंग पंद्रे ने कहा कि पक्की सड़क बनने के बाद गातापार जाने के लिए अब घंटेभर का समय लगता है। पहले 2 से 3 घंटे सिर्फ जाने के लिए लगते थे। हाट बाजार करना भी अब आसान हो गया है।

एक और ग्रामीण अमर उईके ने बताया कि सड़क एक जरूरी आवश्यकता है। निश्चिततौर पर सरकार अब जंगली क्षेत्रों का विकास करने के लिए कटिबद्ध दिख रही है। उधर गांव के ही एक उम्रदराज मोहन सिरसाम और गांव की महिलाएं भी सड़क को एक सौगात के रूप में देखती है।

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