छत्तीसगढ़ के इस जगह पर जन्मे लव-कुश, यहीं माता सीता धरती की गोद में समाई

छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवनगमन के तहत पर्यटन स्थल के लिए किया है चिन्हांकित

पिथौरा। क्या आप जानते हैं लव कुश का जन्म छत्तीसगढ़ के किस जगह पर हुआ था। जी हां, बलौदाबाजार जिले का और महासमुंद जिले की सरहद पर स्थित तुरतुरिया। माना जाता है इसी जगह वाल्मीकी के आश्रम में माता सीता ने लव कुश को जन्म दिया था। सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर निर्माण के फैसले के कुछ दिनों बाद ही छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवनगमन के स्थलों की पहचान कर इन्हें पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने की घोषणा की है। इसके बाद से यहां के लोगों में लव कुश जन्म स्थली तुरतुरिया में भी भव्य मंदिर निर्माण एवम इसे प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थल बनाने की उम्मीद जाग गयी है।


छत्तीसगढ़ के दक्षिण कौशल के दण्डकारण्य में स्थित तुरतुरिया राजधानी रायपुर से कोई 125 किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्थित है।यहां राजधानी से जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 53 में पटेवा से रायतुम बार नवापारा होते हुए तुरतुरिया पहुचा जा सकता है।यहा प्रतिबर्ष पौष पूर्णिमा में तीन दिवशीय मेलेबक आयोजन भी किया जाता है। यह क्षेत्र अभ्यारण्य के अंतर्गत है । धूल भरी कच्ची सड़को से सैकड़ो वाहनों में लोग मेला सहित अन्य दिनों में भी यहां की खूबसूरती एवम मेला के दिन मन्नत पूरी होने की किवदन्तियों के कारण आते है और यहां के मंदिरों के दर्शन लाभ लेते हुए मन्नत मांग कर लौटते है।

तुरतुरिया नाम कैसे पड़ा
इस छुपे पर्यटन स्थल का नाम तुरतुरिया पड़ने के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है।आसपास के ग्रामीण बताते है कि कोई 200 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के एक संत कलचुरी कालीन राजधानी मने जाने वाले स्थल पहुचे।घने वनों से आच्छादित एवम पहाड़ियों से घिरे इस स्थल पर पहाड़ो का जल वर्ष भर लगातार एक धार के रूप में बहता था।जिससे तुर तुर की आवाजें निकलती थी।बताया जाता है कि इसी तुर तुर की आवाजों के कारण संत ने इस गुमनाम स्थान का नाम तुरतुरिया रख दिया जो कि आज भी प्रचलन में है।यह स्थान रामचरित मानस में भी (त्रेतायुग)उल्लखित है।इस उल्लेख में दण्डकारण्य दक्षिण कौसल में स्थित तुरतुरिया में महर्षि बाल्मीकि आश्रम का वर्णन किया गया है।माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान राम ने माता सीता को वन में छोड़ने सुमन्त को भेजा था।यही महर्षि वाल्मीकि आश्रम आज भी मौजूद है। माना जाता है कि इसी स्थान पर माता सीता ने लव कुश को जन्म भी दिया था।

तुरतुरिया के दर्शनीय स्थल :-
वैदेही मंदिर
तुरतुरिया में माता सीता के निवास स्थान के पास वाल्मीकि आश्रम के पास ही वैदेही विहार है।वैदेही(बिना शरीर वाली)यानी माता सीता इसी स्थान पर निवासरत थी।माना जाता है कि माता सीता अपने जीवन के अंतकाल में यही धरती के गर्भ में समा गई थी। काली मंदिर- वैदेही विहार के पास ही मां काली का मंदिर भी है।यहां मां काली की काफी पुरातन मूर्ति स्थापित है।यहां मान्यता अनुसार प्रतिवर्ष हजारो दर्शनार्थी मन्दिर दर्शन के लिए आते है और मन्नते मांगने नवरात्र में ज्योत भी जलवाते है।

लव कुश की मूर्ति
वैदेही मन्दिर के पास ही लव कुश की एक मूर्ति घोड़े को पकड़े खड़े रहने की है।ये मूर्ति यहां खुदाई के दौरान मिली है।जानकारों के अनुसार लव-कुश जिस घोड़े को पकड़े है वह अश्वमेघ का घोड़ा है।ये मूर्तियां ही भगवान राम एवम सीता के यहां प्रवास का प्रणाण माना जाता है।

मातागढ़
वैदेही विहार से लगभग 800 सीढ़ी ऊपर मातागढ़ मन्दिर है।यहां चारों ओर आम कटहल जैसे फल सब्जियों के पेड़ पौधे देखकर ऐसा लगता है कि जंगल में समय गुजारते वक्त यहां जंगल के बीचों बीच फल एवम सब्जियों के पेड़ पौधे लगाए गए थे।इस मंदिर की देवी को सन्तान दात्री भी कहा जाता है।जानकारों के अनुसार इस मंदिर में सन्तान की मन्नत के लिए लोग अधिक आते है।यहां मन्नते पूरी होने की चर्चा भी आम है।नीचे वैदेही विहार का मुख्य मंदिर मातागढ़ को ही माना जाता है।

बालमदेही नदी
मन्दिरो के आसपास एक विशाल नदी बहती है।इस नदी को बलमदेही नदी के रूप में जाना जाता है।ग्रामीणों के अनुसार यहाँ कोई कुँआरी कन्या यदि वर की कामना करती है तो उसे अच्छा वर शीघ्र ही मिल जाता है।इसकी इसी चमत्कारिक खासियत के कारण इसका नाम (बालम=पति,देहि=देने वाला) बलमदेही पड़ा।

प्राचीन प्रतिमाएं
सन 1914 में ब्रिटिश शासनकाल में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच एम लारी ने इस स्थल का महत्व समझने के लिए यहां खुदाई करवाई थी।इस दौरान याहा अनेक मन्दिर एवम सदियों पुरानी पुरातत्व महत्व की मूर्तियां मिली थी।यहां छठवी से आठवीं शताब्दी के बीच के शिवलिंग भी खुदाई के दौरान मिले थे।सीता एवम लव-कुश की खड़ी शिला भी खुदाई में मिली थी।जिससे राम-सीता के यहां आने रहने के प्रमाण मिलते हैं।

गौमुख कुंड
तुरतुरिया प्रवेश करते ही एक गौमुख दिखाई देता है।इस गौमुख से लगातार ताजा पानी इस पर बने कुंड में गिरता रहता है।इसी पानी मे दर्शनार्थी स्नान करते है।बताया जाता है कि गौमुख से निकलने वाली जलधारा पूरे वर्ष भर एक ही रफ्तार से निकलती रहती है।इसलिए यहां कभी गर्मियों में भी पानी की कमी नहीं होती।वैज्ञानिक लिहाज से ये जल आसपास घिरे वररंगा पहाड़ी से अनवरत बहती है।जिसे गोमुख बना कर एक ही स्थान पर एकत्र किया गया है।

उपेक्षित है तुरतुरिया
अंग्रेजों के समय से खुदाई में पुरातात्विक महत्व की मूर्तियों एवम अन्य प्रमाण मिलने के बाद भी यह क्षेत्र अब तक उपेक्षित है।यह क्षेत्र बलौदाबाजार जिले के बार क्षेत्र में होने के बाद भी इसे पूरी तरह उपेक्षित रखा गया है।जबकि इस क्षेत्र में पर्यटन की अपार सम्भावनाएं के साथ क्षेत्र वासियों का दिल से लगाव भी है।

प्रदेश सरकार द्वारा पर्यटक केंद्र घोषित
रामायण में वर्णित प्रदेश के महत्वपूर्ण स्थल तुरतुरिया को अब छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राम वनगमन मार्ग घोषित कर इसे पर्यटन केंद्र घोषित कर दिया गया है।अब इस क्षेत्र का विकास सम्भावित है।