मदर्स डे: एक माँ, जो बस्तर के बीहड़ गांवों में जान बचाने में जुटी

धर्मेन्द्र महापात्र, जगदलपुर|यह माँ,  गोद में बेटी और कंधों पर वेक्सिनेशन का बोझ लिए हर दिन निकल पड़ती है | जंगल,पहाड़ी व नदी नालों को पार कर लोगों की जान बचाने| नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ आदेर स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ एएनएम कविता कर्मा  कर्तव्य परायणता की प्रतिमूर्ति नजर आती है|

घर में अन्य किसी के न होने से मजबूरी है मासूम को गोद में लेकर कठिन व दुर्गम रास्तों से चलकर ड्यूटी को अंजाम देने में जुटी रहती है कविता|

कोरोना जैसे घातक बीमारी को जड़ से दूर करने अपनी ढाई साल की बेटी को गोद में और कंधों पर वेक्सिनेशन का बोझ लटकाकर जंगल,पहाड़ी व नदी नालों को पार कर लोगों की जान बचाने निकलती है एएनएम कविता|

नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ आदेर स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ एएनएम कविता कर्मा मां के फर्ज के साथ लोगों के वेक्सिनेशन कार्य में लगी रहती हैं|

फुरसत के पल

पति छोटेडोंगर में शिक्षा विभाग में पदस्थ हैं| घर में अन्य किसी के न होने से मजबूरी है मासूम को गोद में लेकर कठिन व दुर्गम रास्तों से चलकर ड्यूटी को अंजाम देने में जुटी रहती है कविता|

यह मां सुबह बेटी को लेकर घर से निकल जाती है और अंधेरा होने के पहले काम कर वापस लौटती है|

फिर खुद और बेटी को सेनेटाइज कर नहाने के बाद घर में प्रवेश करती है|

आदेर वो इलाका है जहां पैदल चलने तक कि सड़क नहीं है| संचार साधन की सोच भी बेमानी है जहां सड़क है वहां नक्सलियों ने पेड़ों को काटकर गिरा रखा है|

नक्सली बंदिश की वजह से मैदानी अमले गान की दहलीज तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, ऐसी स्थितियों में भी कविता कर्मयोगी बन मिसाल पेश कर रही है|

आदेर वो इलाका है जहां पैदल चलने तक कि सड़क नहीं है|