नरवा, गरुवा, घुरवा बाड़ी योजना का कोरिया में लग रहा पलीता

कोरिया जिले में आधे से ज्यादा गोठान अधूरे

बैकुंठपुर। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में नरवा, गरुवा, घुरवा बाड़ी के तहत 45 गोठान का निर्माण कराया जा रहा है। जिसमें से आधे से अधिक गोठान आधे-अधूरे हैं। लोग मवेशियों को अब भी खुला छोड़ रहे हैं। कुछ स्थानों पर चारागाह भी तैयार हुआ भी है तो जिला पंचायत का प्रबंधन इतना कमजोर है कि वो मवेशियों के काम नहीं आ पा रहा है। जिला पंचायत के अधिकारियों की लापरवाही के कारण कांग्रेस सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पर ग्रहण लग रहा है।
इस संबंध में खडगवां जनपद पंचायत के सीईओ अनिल अग्निहोत्री का कहना है कि चिरमी में कोई शिकायत नहीं है, खंधौरा जाकर मै देखूंगा। चिरमी में जानवर आते जाते रहते है, जो घास काटी गई है उसे लगाया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार कुल 45 गोठानों को निर्माण 26 फरवरी 2019 को काफी धूमधाम से शुरू किया गया, एक गोठान की प्रथम चरण की लागत 19 लाख 62 हजार रखी गयी, जिले के तहसील बैकुंठपुर में 5, भरतपुर में 14, खडगवां और मनेन्द्रगढ में 9-9 और सोनहत में 8 ग्राम पंचायतांें में इसका कार्य शुरू भी हुआ। परन्तु जिले के खडगवां तहसील के ग्राम पंचायत खंधौरा और ग्राम पंचायत चिरमी के गोठानों को देखकर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिला पंचायत के अधिकारी सिर्फ कागजों पर गोठान की उपलब्धियों बता वाहवाही लेने से पीछे नहीं है। दोनों ही गोठानों में मवेशियों की आवाजाही ना के बराबर है, खंधौरा का गोठान मात्र 30 प्रतिशत ही पूर्ण हो पाया है, खंभे लगे है तो तार गायब है, गेट और अन्य कार्यो के लिए गढ्ढे खोदकर खुले छोड दिए गए है, आने वाले जानवर उसमें गिर कर घायल हो सकते है। दूसरी ओर चिरमी के गोठान के गेट पर हमेशा ताला लगा रहता है, जब कोई अधिकारी देखने आता है उसके पहले कुछ जानवर लाकर खडा कर दिया जाता है, ताकि फोटो में सबकुछ ठीक आए। गोठान के बाहर चरवाहे मवेशियां चरा रहे है, गोठान के बगल में लगाया हरा चारा काट कर मवेशियों को खिला तो रहे है, परन्तु बर्बाद ज्यादा कर रहे है, क्योंकि उसे वो काट कर नहीं खिला रहे है, जिसके कारण चारा काफी मात्रा में खराब हो रहा है। वहीं ना तो ट्रंच तैयार हो पाया है और ना ही गौमूत्र इकट्ठा करने के लिए व्यवस्था।

तीन नग पानी की टंकियां
गोठान में तीन नग पानी की टंकियां बनाई गई है, खंदौरा में तीनों टंकी में बारिश का पानी भरा सड गया है, एक दो टंकी में मरे हुए चूहें तैर रहे है, पानी गंदा होने के कारण उसमें काफी मात्रा में मेढकों ने अपना घर बना लिया है, ऐसे में यदि मवेशी उसका पानी पी ले तो उनका जान चली जाए। बनाए गए झाले टूट कर गिर चुके है, दूसरी ओर चिरमी की टंकियों में पानी तो भरा है, परन्तु हमेशा बंद रहने से जिस उद्देश्य के लिए उसका निर्माण कराया गया है वो पूरा नहीं हो रहा है, गांव के किसी भी व्यक्ति के मवेशी गोठान में नहीं जा रहे है।

बीमार पशुओं के लिए शेड
खंधौरा में अभी तक बीमार पशुओ के लिए शेड का निर्माण नहीं हो पाया है, फरवरी 2019 में शुरू हुआ निर्माण कार्य साल भर होने को है, आज तक अधूरा है, पूरे गोठान में जंगली पेड पौधों का अंबार लगा हुआ है, 4 मजदूर मनरेगा के तहत कार्य कर रहे है। आज तक गेट नहीं बन पाया है और ना ही फेंसिग हो पाई है। खाना खाने के लिए बनी टंकियों के सामने गढ्ढे खुदे हुए है। जिस पर निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।

शानदार लगी है घास, पर गलत प्रबंधन
चिरमी मे इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा नेपियर घास लगवाई है, जो गोठान के बगल में स्थित है, बडी बडी हरी घास को ग्रामीण काटकर ऐसे ही खिला देते है, जबकि गोठान में घास को काटने वाली मशीन ताले में बंद है, जिसके कारण नेपियर घास के हरे हरे पत्ते मवेशी खा लेते है, और उसकी टहनियों को छोड़ देते है, यदि उसे मशीन से काटकर खिलाया जाता तो चारा बर्बाद नहीं होता है, जबकि बड़ी मात्रा में ऐसा चारा गोठान के बाहर पडा हुआ है। गांव के लोग अपने मवेशी को गोठान के बाहर स्थित मैदान चराने के लिए ले जाते हैं।