नवरात्री विशेष: महासमुंद के पहाड़ी पर विराजमान इस सिद्ध दिव्य चंडी मंदिर में होती है तंत्र साधना

दक्षिणामुखी मां चंडी की साधना करने दोनों नवरात्रों में जुटते हैं देश भर के तंत्र साधक ,साधू-संत

रजिंदर खनूजा, पिथौरा |छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में बागबाहरा से कोई चार किलोमीटर दूर स्थित ग्राम घुंचापाली के समीप एक पहाड़ी पर चंडी माता का एक दिव्य मंदिर है।माना जाता है कि दिव्य शक्तियां  इस पहाड़ी पर विराजमान है।लिहाजा वर्ष के दोनों नवरात्रों में साधक साधु एवम संतो का आगमन होता है।वे यह शक्ति की साधना करते है। इस मंदिर,के आसपास का स्थान प्राकृतिक रूप से जंगल व पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां के प्राकृतिक वातावरण और मां के आंचल तले निर्मित चंडी बांध ने इसे पर्यटन की दृष्टि से भी उभारा है।

इस मंदिर में मां चंडी की दक्षिणामुखी प्राकृतिक रूप से निर्मित्त 23 फ़ीट ऊंची प्रतिमा है।इसका पौराणिक कहानियों में अपना एक अलग महत्व है.।ऐसी प्रतिमा अपने अप्प में एक आश्चर्य है।इस तरह की प्रतिमा और कही देखी नही गयी है। तंत्र साधना की प्रमुख स्थली माना जाने वाला यह स्थल अब एक पीठ के रूप में भी ख्याति अर्जित कर चुका है। मां चंडी की महिमा और प्रभाव से जनसामान्य काफी प्रभावित है और इस क्षेत्र में लोग प्रत्येक कार्य मां चंडी के स्मरण से ही प्रारम्भ करते हैं।

चंडी पर्वत करीब आधा दर्जन पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित है।इस पर्वत में अनेक गुफाएं हैं जहां वर्षों पहले वन्य प्राणियों का बसेरा हुआ करता था इनमें से चंडी जलाशय से लगा भाग भलवा माड़ा के नाम से जाना जाता है।

पहाड़ी के नीचे बघवा माड़ा वाली पहाड़ी के मार्ग पर पांच फीट गहरा और लगभग इतना ही चौड़ा एक कुआं है। ऊंचे पथरीले भाग में स्थित इस कुएं की विशेषता यह है कि बारहों महीने इसमें पानी भरा रहता है और कभी कम नहीं होता! कहते हैं वह सोतेनुमा (गढ़ा) स्थल है जो दर्शनार्थियों के साथ ही वन्य प्राणियों के लिए पेयजल प्राप्ति का साधन था। आज भी स्थिति ऐसी ही है। आज तो इसी कुएं के जल से माता के मंदिर में विभिन्न निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।

कभी  दी जाती थी बलि

माता मन्दिरो में अक्सर पारम्परिक रूप से माता को प्रसन्न करने के लिए बलि दी जाती है।कुछ ऐसी ही प्रथा यहां भी थी।.यहां पशु-बलि अनिवार्य हुआ करती थी। पहले वर्ष में दोनो नवरात्रि की पूर्णिमा में यहां धूमधाम से पूजा की जाती थी। इस दौरान बैगा द्वारा देवी को प्रसन्न करने के लिए बकरे की बलि देकर उसका रक्त एक कटोरे में भरकर रख दिया जाता था और मांस को पका कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता था।परन्तु बदलते समय के अनुसार. अब ये प्रथा बन्द हो गयी है।

मंदिर परिषर में घूमते हिंसक प्राणी

चंडी मंदिर परिसर में शान की आरती के समय पहाड़ो की गुफाओं में रहने वाले हिंसक वन्य प्राणी भालू अक्सर दिखाई देते है।दर्शनार्थियों का मानना है कि भालू माता जी की आरती के समय ही आते है।कोई आधा दर्जन भालुओं ने यहां कभी किसी को नुकसान नही पहुचाया इसलिए ऐसा माना जाता है कि ये भालू माता जी के भक्त है।

वही प्रशासन एवम वन विभाग दर्शनार्थियों के इस तर्क को नही मानता।प्रशासन एवम वन्य प्राणी जानकारों का मानना है कि इन दिनों जंगलो में भालू के खाने की वनोपज इंसान ले जा रहा है।इसलिए भालू के शरीर मे नमक की कमी हो रही है।इसी नमक की पूर्ति एवम पानी के लिए ही भालू मन्दिरो तक पहुच रहे है।मन्दिरो में जिस तरह लोग उन्हें खिला पिला रहे है।उससे इंसान के प्रति भी कम हुआ है लिहाजा वह इंसानों से निर्भीक हो कर कहा रहा है।इसके बावजूद भालू कभी भी अपनी आदत के अनुसार हिंसक हो सकते है।इससे बच कर दूर रहना अवश्यक है।

मनोकामना पूर्ण होती है-ग्रामीण

ग्रामीण बताते हैं कि माता के दरबार मे उन्हें सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मां की कृपा से अनेक नि:संतान महिलाओं को संतान-सुख, रोगियों को आरोग्य-सुख प्राप्त होने की कई चर्चाएं क्षेत्र में सुनी जाती हैं।  कालांतर में, साधकों के साथ ही भक्तों का माता के दरबार में जब आना-जाना बढ़ा, तब से यहां वैदिक और शास्त्रीय रीति से पूजन होने लगा।  1950-51 में नवरात्रि पर्व पर पहली बार यहां दुर्गा सप्तशती का पाठ और शत चंडी महायज्ञ कर पूजा प्रारंभ कराए जाने की बात जानकार बताते हैं उसी समय से शुरू हुआ मड़ई मेला अब तक जारी है।

नागिन की तरह पहाड़ी

चंडी पहाड़ी से कोई एक किलोमीटर दूर ही ग्राम जुनवानी में नागिन डोंगरी है. यहां लगभग 60 फीट लंबा एक ऐसा स्थान है जिसे देखने से ऐसा लगता है मानो वहां कोई सर्प पड़ा हो और जिसे किसी ने धारदार हथियार से टुकड़े-टुकड़े कर दिया हो. जुनवानी के ग्रामीण श्रावण के महीने में इसकी ‘ग्राम रसिका’ के रूप में पूजा करते हैं।  यहां पड़े अनेक निशान ऐसा आभास देते हैं कि कोई सर्प अभी-अभी ही वहां से गुजरा है।  यहां कुछ ऐसे बिंदु हैं जहां पत्थरे के टुकड़े मारने से वहां मधुर ध्वनि निकलती है. ऐसा प्रतीत होता है, मानो इस डोंगरी के गर्भ में कुछ छिपा है।

शानदार नजारा

चंडी मंदिर चढ़ते समय दायीं ओर पहाड़ी के ढलान धरातल पर करीब 17 फीट लंबा अंडाकार विशालकाय पत्थर दर्शनार्थियों के आकर्षण का एक केंद्र होता है।  वर्षों से उसी स्थान पर उसी स्थिति में अवस्थित यह पत्थर प्रकृति और मां चंडी के चमत्कार के रूप में श्रद्धा का केंद्र बन गया है। इसी डोंगरी में एक स्थान ऐसा भी है जहां छोटा-कंकड़ मारने पर आवाज गूंजती है।

दर्शनार्थी इस बिंदु पर कंकड़ मारकर यह आवाज सुनते है।इसके अलावा मां चंडी के मंदिर के एकदम बाजू में गस्ति वृक्ष के नीचे दो विशालकाय नगाड़ा रूपी दो पत्थर अगल-बगल रखे हुए हैं. इसी के पास है एक तुलसी पौधा, जहां नवरात्रि पर्व पर नाग देवता के दर्शन होने की बात श्रद्धालु भक्त बताते हैं।

यहां की बघवा माड़ा पहाड़ी पर स्थित अनेक गुफाएं दर्शकों के मनोरंजन का केंद्र हैं. मंदिर जाते समय राम भक्त हनुमानजी का एक मंदिर है जो पहले गुफा में विराजमान थे. इसके ठीक सामने भैरव बाबा की मुक्ताकाशी प्रतिमा एक वृक्ष के नीचे स्थित थी. अब मंदिर बनाकर इन दोनों देव प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई है. मां के मंदिर के ठीक पीछे एक गुफा में मां काली विराज रही हैं.।

बहरहाल चंडीमंदिर एवम उसके आसपास की खूबसूरत पर्वत श्रृंखला धार्मिकता के साथ प्रदेश का एक बेहतरीन पर्यटन केंद्र भी विकसित हो रहा है।