आदिमानव की तरह जी रहा छत्तीसगढ़ का एक परिवार…

कोरिया जिले के इस परिवार की सुध ले सरकार

बैकुंठपुर। गुफा से निकलकर इंसान आज चाँद-मंगल पर पहुँच गया है, पर आपको हैरत होगी कि छत्तीसगढ़ के कोरिया में आज भी एक परिवार एक जंगलों के बीच एक गुफा में अपना गुज़र बसर कर रहा है। न सिर्फ रहना ही ये परिवार सालों पुराने पैतरों से कर रहा है बल्कि इनका खान-पान भी तक़रीबन डेढ़ दो सौ साल पुराने अंदाज़ में हो रहा है। जंगल के कंदमूल खा कर अपना दिन गुजार रहे है।
इनकी दिनचर्चा को अगर क़रीब से देखा जाए तो एक पल के लिए आपको भी आदिमानव की झलक दिखाई पड़ सकती है। इस परिवार की जानकारी देते हुए गणेशपुर के सामाजिक कार्यकर्ता नागेश्वर सिंह बताते है कि पहली बार 2015 मे जब वो जंगल गए तो उन्हें गुफा में निवास करते एक परिवार देखा, उन्होने उसे गांव में चलने को कहा, पर वो नहीं माना, उसके बाद उन्होने प्रयास करके उक्त परिवार का राशन कार्ड बनवाया, दो किमी अंदर जंगल में रहने के कारण उनका पुत्र पढने नहीं जा पाता है। आज भी उक्त परिवार गुफा मे ही, अंधेरे में रह रहे है। मेरे लिए भी आश्चर्य की बात है।
आज हर परिवार के पास अपना घर है, गरीब परिवार भी किसी तरह गांव में अपने टूटे फूटे घर में निवास कर रहा है ऐसे समय में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसके पास एक इंच भी भूमि नही है। गॉव वालों के द्वारा बहिष्कार कर दिये जाने के बाद वह जंगल के गुफा में रहने को मजबूर है, वह भी ऐसे समय में जब सरकार गरीबों का पक्का मकान बनाकर देने की येाजना चला रही है।  जनप्रतिनिधियों ने भी कभी इस परिवार को समाज की मुख्यधारा से जोडने की दिशा मे कोई प्रयास नही किया। जंगल के गुफा में निवास करने के कारण शासन की किसी योजना का लाभ इस परिवार को नही मिल रहा है।

गुफा में कट रही परिवार की जिंदगी
कोरिया जिले के खडगवॉ ब्लाक अंतर्गत ग्राम दुग्गी देवनारायण पठारी अपनी पत्नी राजकुमारी तथा एक 6 वर्षीय पुत्र के साथ जंगल के गुफा में रह रहा है। इसकी वज़ह पूछे जाने पर देवनारायण ने बताया कि मै पहले ग्राम दुग्गी में रहता था, लेकिन हालात ऐसे बने की तीन साल तक जंगल में झोपडी बनाकर रहा। इसके बाद बीते 4 साल से गढपहाड के नीचे बने चट्टान की गुफा में अपनी ज़िंदगी काट रहा हूॅ। वज़ह पूछने पर उसने कहा कि गरीबी और बेरोजगारी ने ये हालत कर दी। जिस जगह पर यह परिवार रहता है उसे क्षेत्रीय ग्रामीण छातापखना कहते है।

ज़मीन थी पर वो भी गवाई
देवनारायण ने अपनी आप बीती बताते हुए कहा कि वह पहले ग्राम दुग्गी में रहता था, जहां उसकी पैतृक ज़मीन थी लेकिन वह विवादित होने के वज़ह से वो भी उससे छीन गई। गांव वालों ने एकतरफा फैसला करके उसकी ज़मीन भी हड़प ली और उसका बहिष्कार कर दिया। जिसके बाद ही उसका परिवार गांव छोड़ कर जंगलों में जिंदगी बिताने का दंश झेल रहा है।

बच्चे की पढाई की सता रही चिंता
देवनाराण पठारी को इस बात की चिंता नही है कि वह गुफा में जिंदगी काट रहा है बल्कि उसे इस बात का ज्यादा चिंता है कि उसका बच्चा पढाई नहीं कर पा रहा है। उसने बताया कि उसकी जिंदगी तो कट जायेगी लेकिन बच्चे का भविष्य क्या होगा। उसके पास तो घर भी नही है और न ही कमाने के लिए खेती की जमीन है। बच्चे के पढाई के लिए स्कूल भी दूर है, ऐसे मे मै क्या करू मुझे समझ नही आ रहा कि बच्चे व मेरे परिवार का भविष्य मेरे न रहने पर क्या होगा।

 

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