Exclusive : सारकेगुड़ा वासियों में न्याय की जगी आस…

कहा, न्याय तभी पूरा जब दोषी जवानों को जेल भेजा जाएगा

बस्तर। सारकेगुड़ा कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट का खुलासा होने से यहां के ग्रामीणों की आस जगी है। जांच रिपोर्ट आने के बाद यहां पहुंचे कुछ पत्रकारों से चर्चा में ग्रामीणों का कहना था कि न्याय तभी पूरा होगा जब दोषी जवानों को जेल भेजा जाएगा। गांव के लोगों ने इस घटना को सामूहिक जनसंहार बताते हुए कहा कि 28 जून 2012 को जवानों की गोलीबारी में 17 लोगों की मौत हुई थी जिनमें 5 बच्चे भी शामिल थे। जिन्हें नक्सली बताकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी और मुआवजा देकर मुंह बंद कराने का पुलिस अफसरों ने दबाव बनाया था। कमला काका इस गांव की पढ़ी लिखी महिला का नाम है जिसने 7 साल तक न्याय की लड़ाई लड़ी। फिलहाल वो गीदम में नर्स है।

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इस सामूहिक हत्याकांड के विरोध में सारकेगुड़ा के खुद्दार ग्रामीणों ने सभी सरकारी सुविधाओं को नकार दिया था। गांव के काका चेंटी और मदकाम सोमा को भी गोली लगी थी। पहले तो इन्हें नक्सल पीड़ित बताया 20 – 20 हजार का मुआवजा दिया गया और इनका रायपुर में इलाज कराया।

 

इलाज के दौरान इन्हें घायल अवस्था में 23 जुलाई 2012 को गिरफ्तार कर इन्हें जेल भेजा गया। चार साल जेल भुगतने के बाद मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायालय एनआईए के न्यायाधीश ने सबूतों और साक्ष्य के अभाव में बरी किया। सवाल यह है कि इनके जख्मों चार साल जिंदगी के पल जो जेल में कटे उसका न्याय कौन देगा।

जांच आयोग ने क्या कहा
बता दें कि बस्तर में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पुलिस-नक्सल मामलों से जुड़ी जिन पांच बड़ी घटनाओं की जांच के लिए विशेष न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया है, उनमें सबसे पहली जांच रिपोर्ट सारकेगुड़ा कांड की आई है। सारकेगुड़ा कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट जस्टिस वीके अग्रवाल आयोग ने पिछले माह 17 अक्टूबर को शासन के मुख्य सचिव को सौंपी थी। रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा बलों ने बैठक के सदस्यों पर एकतरफा हमला किया। इससे कई लोग मारे गए और घायल हो गए। बैठक के सदस्यों द्वारा कोई फायरिंग नहीं की गई। एक-दूसरे की गोलीबारी के कारण ही छह सुरक्षाकर्मियों को चोटें आईं। घटना गोलीबारी पर समाप्त नहीं हुई। सुरक्षा बलों ने उसके बाद ग्रामीणों के साथ मारपीट की, और अगली सुबह एक व्यक्ति को घर में घुस कर भी मार डाला।

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ग्रामीणों का कहना था कि वे अगले दिन के बीज पांडुम (बुवाई त्योहार) की तैयारी के लिए रात में एक खुले मैदान में बैठक कर रहे थे। सुरक्षा बलों ने उन्हें अचानक घेरा और बिना किसी चेतावनी के फायरिंग की। उन्होंने कहा कि गोलीबारी समाप्त होते ही सुरक्षा बलों ने उन्हें बेरहमी से राइफल बट्स और बूटों से पीटा और एक ग्रामीण को अगले दिन सुबह उसके घर में घुसकर मार डाला। जांच आयोग को यह प्रमाण नहीं मिले कि कोई मृतक या घायल ग्रामीण नक्सली था, या कि नक्सलियों ने बैठक में भाग लिया। रिपोर्ट के अनुसार घटना की पुलिस जांच में भी गड़बड़ी है।