देश विशेष : क्या है इस सरकारी स्कूल में, कि लौटने लगे हैं निजी स्कूल में गए छात्र

निजी स्कूलों को मात देता शासकीय प्राथमिक स्कूल मुड़पार

धमतरी। सुविधासम्पन्न निजी स्कूलों के इस दौर में कुछ सरकारी स्कूल भी ऐसे हैं जो अपने सीमित संसाधनों के बाद भी निजी स्कूलों को मात दे रहे हैं। पढ़ाई का वातावरण ऐसा कि निजी स्कूलों के छात्र लौटकर यहां भर्ती होने लगे हैं। दाखिला बढ़ने लगा है। शिक्षकों की मेहनत , स्कूल प्रबंधन की कोशिशें और पालकों के सहयोग, ने साबित कर दिया है कि बहुत कुछ हो सकता है सरकारी स्कूल में भी अगर ठान ले। बात हम कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के धमतरी ब्लाक के गांव मुड़पार के प्रायमरी स्कूल की। गांधी के स्वावलंबी स्कूल की कल्पना भी यहां साकार नजर आती है।

निजी स्कूलों के इस दौर में आम धरणा है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता वे ही अपने बच्चो को यहां पढ़ने भेजते हैं। यानि गांव के गरीब, मजदूर वर्ग के बच्चे। पर प्रचार-प्रसार से दूर कई स्कूल ऐसे भी हैं जो निजी स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं। न केवल दाखिला बढ़ रहा है, कभी इस स्कूल से निकलकर निजी स्कूल में पढ़ने गए छात्र लोट रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही संस्था अजीज प्रेमजी फाऊंडेशन ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि इसके पीछे स्कूल में हो रहे पढाई और शिक्षा-शिक्षण का वातावरण और साथ ही शिक्षकों, पालकों और स्कूल प्रबंधन समितियों का मेहनत शामिल है।

धमतरी से मात्र 5/6 किमी स्थित मुडपार का यह स्कूल शासकीय उन्नत प्राथमिक शाला है। सभी कक्षाओं में शिक्षण सामग्रियों का उपयोग करते शिक्षक, चाहे वह भाषा की हो, गणित की या पर्यावरण की, आपको दिखते मिलेंगे। सहायक शिक्षिका श्रीमती माहेश्वरी सिन्हा, सहायक शिक्षण सामग्रियों को दिखाते हुए बताया कि बच्चे किस तरह सीखते हैं। उन्हें अध्यापन में किस तरह सहायता मिलती है।

सहायक शिक्षक लीलाराम साहू कहते हैं “यहां के शिक्षक समर्पित हैं, हम टीएलएम का उपयोग करते हैं। आपस में चर्चा करते हैं और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए काम करते हैं।स्कूल में शिक्षा शिक्षण का वातावण बनाने में सभी शिक्षकों का सहयोग रहा है और इसमें जनभागीदारी भी।”

प्रधान पाठक, जीधनराम साहू कहते हैं “ यहाँ जनभागीदारी से दस हाईवा मिटटी डाली गई है जिस से यह मैदान समतल बना है. यहाँ हम किचन गार्डन भी बनाए हैं, .जिसका उपयोग बच्चों के मध्यान्ह भोजन में होता है।”

स्कूल प्रबंधन कमिटी के अध्यक्ष मेलाराम निषाद कहते हैं “यह संकुल में एक नंबर का स्कूल है। कई निजी स्कूलों के बच्चों ने यहां आकर दाखिला लिया है।”

इस स्कूल में 2016-17 में जहाँ 96 बच्चे थे वहां आज 131 बच्चे पढ़ रहे हैं. पिछले साल जहाँ प्राइवेट स्कूल से 5 बच्चे आये वहीँ इस साल और दो बच्चे आये हैं.स्कूल के वातावरण से बच्चे यहाँ खुश रहते हैं यह इसकी वजह भी है। वास्तव में यहां आकर आप इस स्कूल का माहौल देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।

भयमुक्त वातावरण में शिक्षा-शिक्षण से लेकर तमाम गतिविधियां न केवल कक्षा में बल्कि कक्षा के बाहर भी खिलखिलाते महकते देख सकते हैं। मैदान पर खेल में मग्न छात्र डोमन निषाद का आत्मविश्वास साफ झलकता है जब वह कहता है यहाँ हमें शिक्षा और खेल दोनों का अवसर मिलता है।

स्कूल में ही अपनी और अपने सहेलियों के बाल संवारती छात्राओं को देख आज सहज कल्पना कर सकते हैं कि वे स्कूल में किस तरह सीख रहे हैं। केवल पढ़ाई ही नहीं अपने आने वाले जीवन के उत्तरदायित्व को बखूबी संभालने का सहज तरीका कितने सलीके से आत्मसात कर रही हैं। लिहाजा, बढ़ते निजी स्कूलों के दौर में अपने सीमित संसाधनों, शिक्षकों की मेहनत और लगन, स्कूल प्रबंधन की सजगता और पालकों के सहयोग ने इस धारणा को बदल कर रख दिया है कि सरकारी स्कूल किसी भी मायने में कमतर नहीं। बच्चों के लिए बेहतर, भयमुक्त वातावरण तैयार कर सकते हैं जो हम सब चाहते हैं। और यही कारण है कि इस सरकारी स्कूल के प्रति सभी आकर्षित हो रहे हैं। और शायद यही वजह है कि अब इस गाँव के स्कूल में दर्ज संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इतना ही नहीं दीगर सरकारी स्कूलों के लिए मिशाल बनकर खड़ा है।