महाराष्ट्र से बंगाल तक पैदल सफर, हफ्ते भर में 450 किमी, अब ओडिशा सीमा में…

साइकिल पर निकल पड़े एक दर्जन युवक

रजिंदर खनूजा

पिथौरा। लॉकडाउन 2 खत्म ही नहीं हुआ कि लॉकडाउन 3 ने आगे अपने पखवाड़े भर  होने का हांका डलवा दिया। इधर मजदूरों का अपने दमखम पर पैदल अपने घरों की ओर निकल पड़ने का सिलसिला जारी है।भूखे -प्यासे इनके कदम धीरे-धीरे ही सही चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के ओडिशा की सरहद पर गांव बैतारी पहुंचे पश्चिम बंगाल के ये दो दर्जन मजदूर महाराष्ट्र के नागपुर से करीब हफ्ते भर पहले निकले थे।

नागपुर से करीब 1200 किमी के सफर में अब तक वे छत्तीसगढ़ पार करते 450 किमी ही तय कर पाए हैं यहां से वे आडिशा होते हुए दाखिल होंगे।

मजदूरों की हालत देख गांव के सरपंच और अन्य लोगों ने इनके खाने-पीने की व्यवस्था की और आराम करने के लिए जगह भी।

लॉकडाउन के कारण हर प्रदेश ने अपने जिले की सीमाएं सील कर दी हैं। बावजूद इसके साधन नही मिलने से मजदूरों का जत्था घर वापसी के लिए पैदल ही निकल रहे हैं। इन प्रवासी मजूदरों को संक्रमण के खतरे के साथ-साथ भूख से भी जूझना पड़ रहा है।

गुरुवार शाम ओडिशा की सरहद से लगे सरायपाली से गुजर रहे मजदूरों का जत्था जब ग्राम बैतारी पहुंचा तो सरपंच वासुदेव मांझी, सचिव संघ के जिलाध्यक्ष सुनील साहू व मां रूद्रेश्वरी क्रिकेट समिति सहित बैतारी के ग्रामीण उन्हें देख कर उनसे पूछताछ की। उनकी दुखदायी व्यथा सुनकर सभी ने मदद की और भोजन कराया।

ग्रामीणों के अनुसार पहले जत्थे में शामिल 22 महिला-पुरुष मजदूरी और राजमिस्त्री का कार्य करते हैं। वे पैदल ही पश्चिम बंगाल के लिए नागुपर से बीते हफ्ते निकले थे। इन दिनों में उन्हें गुरुवार शाम ही यहां भोजन नसीब हुआ।

मजदूरों ने बताया कि रास्ते में उन्होंने मकान निर्माण के औजार करनी, धमेला, फावड़े आदि वजन पकड़कर पैदल चलने में आ रही दिक्कतों के कारण फेंक दिए। कुछ जगह उन्हें खाने के लिए बिस्किट मिले जिन्हें वे खाकर पैदल चल रहे थे।

दूसरा जत्था रायपुर से साइकिल पर

वहीं, दूसरा जत्था इनके पहुंचने के कुछ देर बाद पहुंचा साइकल सवार इस जत्थे में 12 युवक बुधवार को ही रायपुर से पश्चिम बंगाल के लिए निकले थे। महासमुंद के पास रात्रि विश्राम मुर्रा खाकर किया। गुरुवार को बैतारी में रात में मिले भोजन के बाद वे आगे की सफर के लिए निकल पड़े। उस जत्थे के सभी की उम्र 25 वर्ष से कम ही थी।

मालिक निकले निर्दयी….

साइकिल सवार मजदूरों के जत्थे में शामिल एक मजदूर तुषार ने बताया कि लॉकडाउन के एक महीने में उनके सामने मकान का किराया चुकाने और भूख मिटाने की चिंता ने वापस उन्हें घर लौटने मजबूर कर दिया। वे रायपुर में बोरा सिलाई का काम कर रहे थे, जहां उनके मालिक ने किसी भी प्रकार की सहायता नहीं की। जिसके बाद वे सभी अपने-अपने घरों से बैंक खातों में पैसे मंगवाकर 4-5 हजार में एक-एक साइकिल खरीद कर खाने के लिए मुर्रा और बिस्कुट लिए रायपुर से बंगाल की सफर के लिए निकल पड़े।

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