भगवान परशुराम को क्यों कहा जाता है “योद्धावतार”

परशुराम जयंती पर विशेष....

 

भगवान परशुराम को “योद्धावतार” भी कहा जाता है। परशुराम सप्तचिरंजीवों में से एक है। अश्‍वत्थामा, बली, महर्षि व्यास, हनुमान, बिभीषण, कृपाचार्य तथा परशुराम ये सप्त चिरंजीव हैं। परशुराम ने काल पर विजय प्राप्त की है। इसलिए वे सप्तचिरंजीवों में से एक है।

प्रातःकाल उनका स्मरण करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। परशुराम जयंती पर पंडित मनोज शुक्ला का ये विशेष लेख, जिसमें उन्होंने भगवान परशुराम के अवतार, उनके कार्य और उनकी सिद्धियों को विभिन्न ग्रंथ, पुराणों और साहित्यों से सृजित किया है।

श्री विष्णु के छठे अवतार
सत्ययुग में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन ये श्रीविष्णु के 5 अवतार हुए। त्रेतायुग के प्रारंभ में महर्षि भृगु के गोत्र में जामदग्नेय कुल में महर्षि जमदग्नी तथा रेणुकामाता के घर श्रीविष्णु ने अपना छठा अवतार लिया । उनका नाम परशुराम था। भार्गवगोत्री होने के कारण उन्हें भार्गवराम भी कहा जाता है ।

काल तथा काम पर विजय प्राप्त करने वाले देवता
रत्नागिरी जनपद के चिपळूण के निकट लोटे गांव के महेंद्र पर्वत पर भगवान परशुराम का प्राचीन मंदिर है । वहां भगवान परशुराम के पदचिन्ह जिस शिला पर उभरे हैं, उस शिला का नित्य पूजन होता है । इस शिला के पीछे ३ मूर्तियों की स्थापना की गई है । मध्यभाग में भगवान परशुराम की बडी तथा सुंदर मूर्ति है । उसकी दाहिनी ओर कालदेवता तथा बाईं ओर कामदेवता की छोटी मूर्तियां हैं । वे दर्शाती हैं कि भार्गवराम ने काल तथा काम पर विजय प्राप्त किया है ।

अखंड ब्रह्मचारी तथा परमवैरागी
भगवान परशुराम ने कामवासना पर विजय प्राप्त की थी । इस कारण वे अखंड ब्रह्मचारी हैं । परशुराम में प्रचंड विरक्ति थी । इसीलिए उन्होंने पूरी पृथ्वी जीतकर भी कश्यपऋषि को उदारता से वह दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर एकांत में रहकर संन्यस्त जीवन व्यतीत किया ।

अपराजित योद्धा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का विनाश

तपस्या कर अर्जित तपोबल
हैहैय वंश के अधर्मी राजा महिष्मति नरेश कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने सहस्रों वर्ष कठोर तपस्या कर, भगवान दत्तात्रेयजी को प्रसन्न किया था तथा असीम बलशाली बनकर सहस्रों भुजाएं धारण करने का वरदान प्राप्त किया था । ऐसे कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का नाश करना संभव हो; इसके लिए उसके तपोबल की अपेक्षा अधिक तपोबल अर्जित करने हेतु परशुराम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की । कार्तवीर्य के तपोबल को परास्त करने के लिए, परशुराम ने उससे अधिक कठोर तपस्या कर, एक प्रकार से ब्राह्मतेज के शस्त्र से, कार्तवीर्य के पुण्यबल पर ही प्रहार कर उसे क्षीण कर दिया । इससे कार्तवीर्य की सहस्रों भुजाओं के माध्य

म से कार्यरत सूक्ष्म कर्मेंद्रियों की दिव्य शक्ति निष्प्रभ होने लगी तथा अधर्म का प्रतीक बन चुके कार्तवीर्य का सूक्ष्म से पराजित होना प्रारंभ हुआ । कार्तवीर्य को पराजित करने के लिए भगवान परशुराम द्वारा किया गया आध्यात्मिक स्तर का युद्ध अद्वितीय है ।

गोधन की चोरी करने वालों का विनाश हो, यह संकल्प कर, उसे पूर्ण करना
कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने ऋषि दंपति के विरोध को अनदेखा कर, जमदग्नी आश्रम से कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया । इस प्रकार उसने गोमाता का अपहरण किया । जब यह घटना हुई, तब परशुराम आश्रम में नहीं थे । वे घनघोर वन में कठोर तपस्या में व्यस्त थे । जब वे जमदग्नी के आश्रम में पहुंचे, तब उनको घटना ज्ञात हुई । कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के नियंत्रण सेे कामधेनु को मुक्त कर, गोमाता तथा गोधन की रक्षा करने हेतु, उन्होंने गोधन की चोरी करनेवालों के विनाश का संकल्प लिया । उनकी शापवाणी सत्य सिद्ध हुई; क्योंकि गोधन चुराने का अपराध करने से कार्तवीर्य का पुण्यक्षय हुआ । जमदग्नी ऋषि पर प्राणघातक आक्रमण करने से कार्तवीर्य के पुत्रों को भी पाप लगा । परशुराम ने कार्तवीर्य के कुल के विनाश करने का अपना संकल्प पूर्णकर गोमाता को मुक्त किया और आदरपूर्वक उसे पुनः जमदग्नी के आश्रम ले आए ।

परशु से स्थूल से वार करना
कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का पुण्यक्षय हो चुका था । आध्यात्मिक स्तर पर वह पूर्णतः पराजित हो चुका था, इसलिए स्थूल से उसका अंतकाल समीप आ गया । उसका अंतकाल समीप आते ही, भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन पर स्थूल से परशु से वार कर, उसकी सहस्र भुजाओं को काट डाला तथा उसके पश्‍चात उसका शिरच्छेद किया। इस प्रकार भगवान परशुराम ने क्षत्रियों के निर्दालन हेतु महाकालेश्‍वर शिवजी द्वारा प्रदान किए परशु का शस्त्र के रूप में उपयोग करना आरंभ किया ।

भगवान परशुराम द्वारा किए गए अपूर्व अवतार-कार्य तथा पराक्रम के प्रमुख उदाहरण
0 21 बार पृथ्वी परिक्रमा
भगवान परशुराम ने संपूर्ण पृथ्वी की २१ बार परिक्रमा की और पृथ्वी पर उन्मत्त बने अहंकारी तथा अधर्मी क्षत्रियों का नाश किया । इस प्रकार पृथ्वी परिक्रमा कर, उन्होंने पृथ्वी के भार को हलका किया तथा उसके साथ ही पृथ्वी परिक्रमा का पुण्य भी प्राप्त किया ।

0 अकेले युद्ध का सामर्थ्य
प्रजा का उत्पीडन कर संपूर्ण पृथ्वीपर ऊधम मचानेवाले क्षत्रियों की संख्या सहस्रों में थी । उनके पास लाखों अक्षौहिणी सेना का बल था । भगवान परशुराम नरदेह में साक्षात् श्रीमन्ननारायण ही थे । उसके कारण उनमें सहस्रो क्षत्रिय तथा लाखों की सेना के साथ अकेले युद्ध करने का अपूर्व सामर्थ्य था ।

0 दानवीर
एकछत्र सम्राट की भांति अखिल भूमि के अधिपति होते हुए भी, अश्‍वमेध यज्ञ के समय परशुराम ने यज्ञ के अध्वर्यू महर्षि कश्यप को संपूर्ण पृथ्वी दान की । इससे परशुराम कितने दानवीर थे, यह दिखाई देता है ।

0 नवसृष्टि का निर्माण करना
भगवान परशुराम ने केवल ३ कदमों में ही समुद्र को पीछे ढकेलकर क्षणार्ध में परशुराम भूमि का निर्माण किया तथा चिता से चित्पावन ब्राह्मणों की उत्पत्ति कर, परशुराम क्षेत्र की नई सृष्टि ही साकार की ।

0 क्षात्र तेज का उत्तम उपयोग
शत्रु के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र तेज का उत्तम उपयोग करने वाले श्रेष्ठतम योद्धा के उत्तम उदाहरण है भगवान परशुराम।

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।
इदं ब्राह्मम् इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥

अर्थ : जिसके मुख में 4 वेद, पीठ पर बाणों सहित धनुष्य है, वे परशुराम शाप देकर अथवा बाण से शत्रु का नाश करते हैं ।

परशुराम ने शास्त्रबल तथा शस्त्रबल अर्थात बाहुबल इन दोनों के संयोग से रिपुदमन किया । आध्यात्मिक परिभाषा में ज्ञानबल का अर्थ ब्राह्मतेज तथा बाहुबल का है अर्थ क्षात्रतेज। परशुराम ने ब्राह्मतेज के बल पर शाप देकर, अर्थात संकल्प से तथा क्षात्रतेज के बल पर परशु से वार कर, अर्थात प्रत्यक्ष प्रहार से शत्रु का नाश किया।

इस प्रकार भगवान परशुराम शत्रु के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र इन दोनों तेजों का उत्तम उपयोग करनेवाले श्रेष्ठतम योद्धा के उत्तम उदाहरण है।

                                                                                      -पं. मनोज शुक्ला