पत्तल मास्क पहन रहे आदिवासी

कोरोना के खिलाफ बस्तरिहा जुगाड़

रायपुर। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी क्षेत्र वाराणसी की जनता को संबोधित करते हुए कहा है कि कोरोना वायरस महामारी किसी के साथ भेदभाव नहीं करती, चाहे वह अमीर हो या गरीब हो। हर कोई इसकी जद में है और इससे बचने के तरह-तरह उपाय निकाल रहा है।

खासतौर पर हिंदुस्तानी जो जुगाड़ करने में मशहूर हैं। रसोई गैस के लिए जुगाड़, नौकरी के लिए जुगाड़, नेतागिरी के लिए जुगाड़, मुफ्त सिनेमा टिकिट के लिए जुगाड़ आदि।

दुनियाभर में कारोना का कहर जारी है, लोग दहशत में हैं। लोग अपने तरीके से अपनी सुरक्षा में लगे हुए हैं। मास्क और सेनेटाइजर दवा दुकानों में खत्म हो गए हैं। शहरी किसी तरह जुगाड़ कर मास्क हासिल कर ले रहे हैं, या फिर घरों में ही बना ले रहे हैं।

तब नक्सल समस्या से पिस रहा बस्तर का आदिवासी क्या करे? कहां से लाये मास्क-सेनेटाइजर, कहां से हासिल करे?

मिल भी गया तो दाम चुकाना भी उसके बस की बात नहीं। पर इन आदिवासियों ने इसका तोड़ निकाल लिया, अपने लिए एक जुगाड़ कर लिया। अपना खुद का मास्क और सेनेटाइजर बना लिया। मास्क सराई पेड़ के पत्ते से बनाया और हाथ धोने के लिए चूल्हे की राख।

ऐसी स्थिति उत्तर बस्तर के कांकेर जिले के सुदूर आदिवासी बाहुल्य आमाबेड़ा के ग्राम कुरुटोला की है। जहां न कोई संचार की व्यवस्था है कि देश में क्या हो रहा है वे जान सकें। लोगों से ही सुना है कि देश में कोरोना वायरस फैला है।

गांव के प्रमुख इसके बारे में बताते हैं कि इससे बचने के लिए मास्क व बार-बार हाथ धोना जरूरी है। लेकिन इस अंदुरनी इलाके में न कोई दवा दूकान है जहां से वे मास्क खरीद सकें। नजदीक में कोई अस्पताल भी नहीं है।

तब कोरोना से लड़ने के लिए देसी जुगाड़ अपनाया और यह अनोखा मास्क तैयार किया। पत्ते का मास्क बनाकर गांव के सभी लोग पहन रहे हैं।

इसकी रिपोर्ट हम तक देने वाले कांकेर के युवा पत्रकार तामेश्वर सिन्हा कहते हैं, “ सिर्फ इतना ही नहीं, इन्होंने अपने गांव को भी लाकडाउन कर रखा है। कोई भी अनजान व्यक्ति इस गांव में नहीं घुस सकता।“

ग्रामीणों का कहना है 31 मार्च तक वे अपने घर में ही रहेंगे। वैसे पत्तल पर भोजन परोसने की हमारी परंपरा सदियों से जारी है। दैनिक शौच निवृत्ति और बर्तन धोने में राख का इस्तेमाल होता रहा है।

कोरोना के खिलाफ यह मास्क कितना सुरक्षित है, राख कितना कारगर है इस पर देश टीवी ने शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय रायपुर के व्याख्याता और वर्तमान में छत्तीसगढ़ आयुर्वेद, यूनानी एवं प्राकृतिक चिकित्सा बोर्ड व राज्य होम्योपैथी बोर्ड के रजिस्ट्रार डा. संजय शुक्ला से बात की। उन्होंने कहा कि सुदूर वनांचल में आदिवासियों की यह सजगता अनुकरणीय है कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति कितने जागरूक हैं।

उनके इस इजाद की चिकित्सक बिरादरी भी तारीफ कर रहे हैं। पत्ते का चुनाव इस तरह किया और बनाया कि यह सर्जिकल मास्क से ज्यादा कारगर है। A-95 की तरह दिखने वाला यह मास्क सर्दी और बुखार और खांसी जैसी बीमारी का संक्रमण तो रोकेगा ही। पत्ते चुनते समय इसे पानी से साफ जरूर करें।

वे कहते हैं, आदिवासियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा  होती है। इनका खाना पान भी संतुलित होता है। फिर भी वे सजग हैं, शहरियों से ज्यादा।

बहरहाल, आज जब लोग घरों में रहने की अपील को धता बताते सड़क पर निकल रहे हैं। पुलिस को सख्ती बरतनी पड़ रही है। छिपकर रह रहे पढ़े लिखे संक्रमित खतरा बने हुए हैं।

ऐसे मौके पर अपने पास मौजूद संसाधनों से अपनी सुरक्षा का घेरा बना लेना बस्तर के इन आदिवासियों से सीखना होगा।

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