इनके रोम-रोम में राम, सांसों में भी राम

109 साल से चली आ रही जांजगीर के पीरदा में यह परंपरा

जांजगीर-चांपा | जिले के मालखरौदा ब्लॉक के पीरदा गांव में 3 नवंबर से शुरू रामनामियों के मेले का आज समापन हो गया। 109 साल से यह परंपरा चली आ रही है। रामनामी दलित समाज के लोग पूरे शरीर में नख से लेकर सिर तक राम नाम का गोदना (टैटू) लिखाते हैं। दिन की शुरआत भी राम नाम से ही होती है। अभिवादन का संबोधन भी राम-राम। यानि रोम-रोम में राम, सांसों में भी राम। राम के नाम को ही सब कुछ मानने वाला यह समाज अपने आप में अनूठा है। 3 दिनों तक चले इस मेले में दूर-दूर से इसके अनुयायी शामिल हुए।

समाज के प्रमुख रामप्यारे बताते हैं एक कथानुसार महानदी के इस पार से सन 1906 में राम-राम भक्त एक सामाजिक कार्य के लिए महानदी पार कर पतेरापाली दशकर्म में गए थे। उस समय महानदी में बाढ़ की स्थिति थी। 7 दिन से लगातार बारिश हो रही थी। इसके चलते महानदी उफान पर थी। जब राम नाम भक्त पतेरापाली से नदी के इस पार नाव में बैठकर आ रहे थे, तब नाव बीच महानदी में बहने लगी, नाविक भी नहीं संभाल पा रहे थे। तब राम-राम भक्तों ने बीच महानदी के धार में संकल्प लेते हुए कहा कि वे भजन मेला का आयोजन करेंगे। इसके बाद नाव नदी के किनारे इस पार आ गई। तब से ग्राम पिरदा में लगातार रामनामी बडे भजन मेला का आयोजन किया जाता है। तब से लगातार रामनामी भजन मेला को 109 वर्ष हो चुके है। कभी नदी के इस पार तो कभी नदी के उस पार हर साल रामनामी बडे भजन मेला का आयोजन होता है।

मेले की शुरूआत ग्राम पिरदा में वर्ष 1911 में हुई थी, तब से लगातार राम राम भक्तों द्वारा इसका आयोजन कर मेला लगाया जा रहा है। रामनामी भजन मेला में बडी संख्या में भक्त जन पहुंचकर जैतखाम की पूजा करते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं। इस अवसर पर रामनामी भक्तों ने रामनाम लिखे वस्त्र पहनकर व मोर पंख मुकुट धारण कर जयस्तंभ की परिक्रमा की और ध्वजारोहण किया।

समाज के प्रमुख रामप्यारे ने बताया कि पिरदा गांव में मेले का आयोजन 109 वर्ष पहले शुरू हुआ था, जो लगातार अब तक चल रहा है. हालांकि रामनामी की संख्या पहले से कम होती जा रही है, फिर भी रामनामियों की आस्था और मान्यता को बचाने के लिए समाज के लोग बड़ी शिद्दत से काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि युवा पीढ़ी की रुचि इस ओर लगातार घट रही है। इसका कारण उनका उच्च शिक्षा की ओर बढ़ना और नौकरी करना है।

इस समाज के सदस्यों में अब गोदना गुदवाना कम हो चला है। गांव में रहने वाला कम पढ़ा लिखा कोई एकाध जगह गुदवा लेता है। युवा तो गुदवा ही नहीं रहे हैं। इस समाज के एक युवक का कहना था कि सेना, सुरक्षा जैसे कुछ सरकारी सेवाओं में गोदना के कारण उनका चयन नहीं हो पाता था लिहाजा आज की पीढ़ी इसी कारण नहीं गुदवाती है। हालाकि फैशन या शौक के कारण या परंपरा पालन के नाम पर वे युवा गुदवा लेते हैं जो गांवों में रहते हैं या फिर सरकारी नौकरी नहीं हैं।