इस तरह तो जंगल का होगा सफाया, मिल रहा राजनीतिक संरक्षण

वन अधिकार पट्टे के लिए साल पेड़ों की अवैध कटाई

बैकुंठपुर । कोरिया जिले के मनेन्द्रगढ़ वनमंडल के जनकपुर परिक्षेत्र में साल पेड़ों की अवैध कटाई जारी है। हजारों काटे गए पेड़ों के पीछे कारण सिर्फ वन अधिकार पट्टा है। जिसके चलते ही जंगल में अतिक्रमण किया जाना बताया जा रहा है।ऐसा नहीं है कि इसकी खबर वन विभाग को नहीं है, परन्तु राजनीतिक संरक्षण के कारण अधिकारी भी कार्यवाही करने सामने नहीं आ रहे है।
इस संबंध में परिक्षत्राधिकारी चंद्रमणि तिवारी का कहना है कि अतिक्रमणकारियों पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी, मैं स्वयं मौके पर जाकर देखता हूं कि आखिर मामला क्या है।

वनो में हो रही है धड़ल्ले से कटाई
जानकारी के अनुसार मनेन्द्रगढ़ वनमंडल अंतर्गत जनकपुर परिक्षेत्र के नौढिया के साल के जंगलों की कटाई बीते दो माह से जारी है, ग्रामीणों की माने ने नौढिया के डुगलाडीह गांव से लगे जंगलों को इसलिए काटा जा रहा है ताकि वन अधिकार पट्टा मिल सके, अतिक्रमणधारियों ने हजारों की संख्या में पेड काट डाले है। आसपास के ग्रामीणों की माने तो इस तरह की अवैध कटाई काफी दिनों से जारी है, ऐसे लोगोे को वन अधिकार पट्टा मिलेगा ऐसा राजनैतिक दलों के द्वारा बताया जा रहा है। जिसके कारण जंगल साफ होते जा रहे है। अतिक्रमणधारियों का मानना है कि चाहे जहां कब्जा कर लो उन्हें उसका पट्टा मिल जाएगा, जबकि ऐसा नहीं है। 13 दिसंबर 2005 के तहत पहले काबिज को वन अधिकार कानून के अंतर्गत सभी प्रकार की वनभूमि पर यह अधिकार मिलेंगे, जैसे संरक्षित वन (रिजर्व फॉरेस्ट), नारंगी वन, बड़ा झाडु, सेंक्चुरी, नेशनल पार्क। कोई विवादास्पद भूमि जिस पर वन विभाग हक जता रहा हो, वहां भी अधिकार मिलेंगे।
                                                यह अधिकार सभी को मिलेंगे, लेकिन आदिवासियों को छोड़कर दूसरे समाज के लोगों को सबूत देना होगा कि वे तीन पीढ़ी यानी 75 वर्षों से वहां रहते हैं। परन्तु इसके लिए उन्हें कोई दो सबूत देने होंगे जिसमें किसी भी प्रकार का सरकारी कागज, रिकॉर्ड, नोटिस, पट्टा, पी.ओ.आर, कोर्ट कचहरी का कोई वैधानिक कागज या आदेश, परम्परा एवं रूढ़ि पर किए गए अध्ययन के तथ्य एवं रिपोर्ट, मतदाता पहचान-पत्र, मूल निवासी प्रमाण-पत्र, राशन कार्ड, पंचायत की टैक्स रसीद, बिजली का बिल। इधर, राजनैतिक दबाव ऐसा है कि हर किसी को पट्टा देने का चन विभाग पर दबाव है, ऐसे में ग्रामीण जिले भर के जंगलो की अवैध कटाई कर समतल जमीन बनाने में जुटे हुए है।

वन अधिकार कानून 2006
वर्ष 2006 में अनुसूचित जनजातियों और अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम 2006 संसद में पास हुआ। उसके बाद इसके नियम बनने में एक साल लगा और 31 दिसम्बर 2007 को इसके नियमों की सूचना केन्द्र सरकार द्वारा निकाली गई व 1 जनवरी 2008 को यह लागू हुआ। यह कानून भारत के सभी राज्यों के आदिवासी (अनुसूचित जनजातियों) और अन्य परम्परागत वन निवासी क्षेत्रों में लागू हुआ। इसमें 13 दिसम्बर 2005 से पहले वन भूमि पर काबिज लोगों को उस भूमि पर अधिकार और पट्टा मिलेगा। एक परिवार को अधिकतम 10 एकड़ का पट्टा मिलेगा। पट्टा पति-पत्नि दोनों के नाम पर होगा। वन निवासी अनु. जनजाति के सदस्यों को निवास या जीविकायापन हेतु स्वयं खेती करने के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक वन भूमि को जोतने और उसमें रहने का अधिकार। लघु वनोपज का संग्रहण, उसका उपयोग करने और बेचने का अधिकार। जंगल में मवेशी चराने का अधिकार।
                                                     जंगल क्षेत्र में पानी, सिंचाई, मछली पालन एवं पानी से अन्य उपज प्राप्त करने का अधिकार। जहां वन भूमि से लोगों को अवैधानिक तरीके से बिना पुनर्वास के हटा दिया गया हो, वहां उसी जमीन पर या दूसरी जमीन पर अधिकार। कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका वनवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो, किंतु जंगली जानवरों के शिकार का अधिकार नहीं होगा। जैव विविधता तथा सांस्कृतिक विविधता से संबंधित बौध्दिक सम्पदा और पारम्परिक ज्ञान का सामुदायिक अधिकार। यथावत पुनर्वास का अधिकार।