सरगुजा: विरोध में फंसकर रह न जाये लेमरू हाथी कोरीडोर परियोजना

विरोध करते  लामबंद ग्रामीणों को भरोसे में नहीं ले पा रहे सरकारी कारिंदे

सरगुजा। सरगुजा संभाग के सरगुजा जिले के उदयपुर एवं लखनपुर विकासखंण्ड में प्रदेश शासन की महत्वकांक्षी योजना लेमरू हाथी कोरीडोर परियोजना का विरोध जारी है। अच्छी मंशा से लाई गई यह योजना क्या विरोध में फंसकर रह जाएगी? जहाँ ग्रामीण अपने तर्क दे रहे हैं कि हाथियों का रहवास बनाये जाने से उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जायेगा| ग्रामीणों ने कई आशंकाएं जताई हैं| अब तक के अनुभवों से उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं हो रहा है| वहीँ सरकारी कारिंदे अपनी कार्यशेली से इनको भरोसा देने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं|

दो दिन पहले उदयपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत घटबर्रा के परोगिया गांव में एक बैठक हुई| बैठक में वहां उपस्थित सरपंच, उपसरपंच व ग्रामीणों ने वन विभाग पर आरोप लगाया कि ग्राम सभा को दरकिनार कर दबाव पूर्वक हस्ताक्षर कराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह ऐसा नहीं होने देंगे।

ग्रामीणों का यह भी कहना था कि लेमरू परियोजना को लेकर गांव में कुछ बाहरी तत्व आकर अपना डेरा जमा लिए हैं और ग्रामीणों को लगातार बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से ऐसे तत्वों को गांव से बाहर निकालने की भी मांग की है।

परोगिया गांव में हुई बैठक में सरपंच उप सरपंच सहित ग्रामीणों का कहना था कि सरकार अगर लेमरू प्रोजेक्ट लाती है तो यह क्षेत्र हाथी विचरण क्षेत्र हो जाएगा और ग्रामीणों के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो जाएगा।जिसके बाद ग्रामीण जंगल मे ना तो मवेशी चरा सकते हैं और ना ही ग्रामीणों का प्रमुख जीविका चलाने का संसाधन महुआ,लाख व अन्य संसाधनों का उपयोग कर पाएंगे। यही नहीं हाथी द्वारा नुकसान पहुंचाने पर उन्हें मुआवजा तक प्राप्त नहीं हो पाएगा। ग्रामीण अब इस परियोजना को लेकर पूरी तरह से लामबंद हो चुके हैं| बैठक में एकराय बनी कि  बृहद रूप से रैली व आंदोलन कर सरगुजा कलेक्टर से मिलकर प्रोजेक्ट नहीं लाने की मांग की जाये|

बता दें कि प्रदेश में हाथी-मानव संघर्ष को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लेमरू हाथी परियोजना की घोषणा की थी|  उस समय भी लोगों ने सभायें आयोजित कर इस परियोजना का विरोध किया था। इसी बीच करोना का संकट काल आया और यह परियोजना ठंडे बस्ते मे चली गई गया।

सरगुजा अंबिकापुर के उत्साही युवा पत्रकार अभिनव साहू बताते हैं कि अभी हाल ही में 1 अक्टूबर को पंचायत सचिवों को आवश्यक रूप से ग्राम सभा के आयोजित करने का आदेश मिला| वहीं वन विभाग को कहा गया कि वे ग्राम सभा में जाकर हाथी लेमरू परियोजना की जानकारी लोगों को दें |समझाइश दे कि उन्हें विस्थापित नहीं किया जाएगा सिर्फ हाथी के लिए गांव की सीमा में घेराव किया जाएगा। जैसे ही वन विभाग के कर्मचारियों ने गांव में आकर बताना शुरू किया लोग आक्रोशित होते चले गये और उन्होंने कहा कि हम सहमति का प्रस्ताव किसी भी हाल में नहीं देंगे|

लेमरू प्रोजेक्ट के लिए मतरिंगा, सितकलो, बुले, भकुरमा, पनगोती, बडे गांव, मरेया, कुडेली, बकोई, पेंण्डरखी, ,खूजी, शायर कुम्डेवा,जिवालिया बिनिया, अरगोती,ढोणा केसरा, पटकुरा, जैसे अनेक सीमावर्ती एंव पहाडी़ इलाकों में ग्राम सभा का आयोजन किया गया था।

सभी ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों ने एक स्वर में यही कहा कि हम किसी भी हाल में अपने क्षेत्र में इस परियोजना को लागू नहीं होने देगें। अंतिम सांस तक लड़ते रहेगें। गत 8 अक्टूबर को ग्राम पंचायत घाट बर्रा के परोगिया गांव में उक्त परियोजना को लेकर बैठक की गई जहां ग्रामीणों ने इसका पुरजोर विरोध किया है।

ग्रामीणों का तर्क

ग्रामीणों का यह भी कहना था कि इस इलाके में  कभी कभार कुछ हाथी आते हैं,और चले जाते है। परियोजना बनने के बाद सरकार पूरे प्रदेश के हाथियों को लाकर यहां छोड़ देगी| हाथी तार के एक घेरे को अपनी सीमा बना कर गांवों में दाखिल नहीं होंगे ऐसा संभव नहीं है|

ग्रामीणों का कहना था कि हमारे पास गाय,भैंस,बकरी जैसे पालतू मवेशी जिन्हे हम जंगल में ही चराते हैं इन हाथियों  के आने के बाद छीन जायेगा।इनके चारे की समस्या आ जाएगी|

कांग्रेस जिला अध्यक्ष का ग्रामीणों को समर्थन

लेमरू परियोजना को लेकर ग्रामीणों के उठते विरोध के स्वर के बाद सरगुजा कांग्रेस जिला अध्यक्ष राकेश गुप्ता का ग्रामीणों को समर्थन मिल चुका है। श्री गुप्ता ने ग्रामीणों की मांग सरकार तक पहुंचाने की बात कहते हुए उनके साथ खड़ा होना बताया है|

 

क्या कहते हैं वनमंत्री

छत्तीसगढ़ के वन मंत्री मोहम्मद अकबर का कहना है कि लेमरू एलिफेंट रिजर्व से किसी भी गांव का विस्थापन नहीं होगा। उन्होंने विस्थापन की आशंकाओं को सिरे से खारिज करते हुए बताया कि न तो कोई गांव विस्थापित होगा न ही किसी के निजी और सामूहिक वनाधिकार पर कोई प्रभाव पड़ेगा। एलिफेंट रिजर्व से मानव- हाथी संघर्ष की आशंका को भी उन्होंने निराधार बताया और कहा कि इसके विपरीत हाथी रिजर्व मानव-हाथी संघर्ष को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

 

 

लागू करने के तरीकों पर निर्भर

सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला इस मुद्दे पर फेसबुक पर लिखते हैं- सरकार की किसी भी नीति, योजना की सफलता और असफलता उसे लागू करने के तरीकों पर निर्भर करती हैं। कई बार अच्छी मंशा से लाई गई योजना भी जानकारी के अभाव में विरोध में फंस जाती हैं।

राज्य सरकार से हमने अलग अलग माध्यम से यह आग्रह किया था कि लेमरू हाथी रिजर्व परियोजना को लागू करने के पूर्व इसकी विस्तृत जानकारी ग्रामीणों के साथ सांझा किया जाए। जैसे परियोजना क्या है? विस्थापन होगा या नही ? जंगल जमीन पर ग्रामीणों के अधिकारों की क्या होगी ? हाथी से नुकसान की स्थिति में मुआवजा मिलेगा या नही? वन अधिकार कानून के तहत जंगल पर ग्रामसभाओं के प्रबंधन के अधिकार किस तरह होंगे?  आदि सवालो पर विस्तृत विचार विमर्श प्रभावित क्षेत्र की ग्रामसभाओं के साथ होना चाहिए।

पहले भरोसा जीते सरकार

ग्रामीणों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनके किसी भी तरह के अधिकार प्रभावित नही होंगे इसके बाद ग्रामसभा से परामर्श या सहमति की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिये थी।

यहां बिना किसी पूर्व जानकारी के ग्रामसभाओं को लेमरू हाथी रिजर्व बनाने प्रस्ताव पर सहमति देने 1 अक्टूबर को आदेशित कर दिया दिया गया। परिणामस्वरूप कई ग्रामसभाओं ने विरोध कर दिया। विरोध भी स्वाभाविक है, क्योंकि अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उधान के अनुभव लोगों के सामने है जहां वन्यप्राणी संरक्षण के नाम पर सभी अधिकारों को वन विभाग द्वारा प्रतिबंधित किया जाता हैं। लेमरू हाथी रिजर्व उससे अलग है ये बात सरकार को लोगो को बतानी चाहिए।

कोई अधिकृत दस्तावेज नहीं

वे लिखते हैं- मुझे भी कोई अधिकृत दस्तावेज इस रिजर्व को बनाने के प्रावधानों के संबंध में देखने नही मिला लेकिन जितनी जानकारी मिल पाई उसके अनुरूप- लेमरू हाथी रिजर्व वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम की धारा 36(A) के तहत एक लोक संरक्षित क्षेत्र होगा जिसमें जंगल का प्रवंधन समुदाय आधारित होकर हाथी के रहवास अनुरुप बेहतर किया जाएगा| जंगल मे इस तरह का प्लांटेशन किया जाए जिससे हाथी को खाने की उपलब्धता हो सके और वह गांव में भोजन की तलाश में न आए। आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों के जंगल जमीन पर अधिकार यथावत रहेंगे। वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया सतत जारी रहेगी और अधिकर यथावत बने रहेंगे।

 

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