शिक्षक की दीवानगी ऐसी, शतरंज पर लिखी एक दर्जन किताबें

3 हजार बच्चों को बिना फीस लिए दिया है प्रशिक्षण

पिथौरा। शतरंज के प्रति दीवानगी ऐसी कि पिथौरा के एक गांव के स्कूल में पदस्थ इस शिक्षक ने इस पर एक दर्जन किताबें लिख डालीं। वह भी अपने अध्यापन के बाद। कभी राजा-महाराजाओं, संपन्न लोंगों का खेल माने जाने वाले शतरंज को आम जनता से जोड़कर उसे लोकप्रिय बनाने में जुटा यह शिक्षक बच्चों को भी बिना फीस लिए सिखाते भी हैं। वे कहते हैं शतरंज के माध्यम से बच्चों की मानसिक क्षमता बढ़ाने एवम अपने जीवन में धोखे एवम छल से कैसे बचें सिखाते है। प्रत्येक रविवार को दोपहर 1 से 3 बजे तक निःशुल्क शतरंज की पाठशाला का आयोजन करते है।                          अब तक 3000 हजार से ज्यादा बच्चे इनसे शतरंज सीख चुके हैं। इतना ही नहीं प्रतिभागियों को हिस्सा लेने के लिए अपना वेतन खर्च करने से भी नहीं चूकते। कुछ नया करना हो तो जुनून जरूरी है। चाहे हालात कैसे हों। महासमुंद जिले के पिथौरा ब्लाक के एक स्कूल के शिक्षक ने जो बीड़ा उठाया है। दीगर शिक्षकों के लिए मिसाल है कि वे भी कुछ कर सकते हैं। पिथौरा के समीप के ग्राम लाखागढ़ निवासी हेमन्त खूंटे ने अब तक कोई एक दर्जन पुस्तकें शतरंज पर लिख चुके हैं।अब वे इनको प्रकाशित करना चाहते हैं। जानकारों का कहना है कि शायद वे प्रदेश के इकलौते ऐसे शतरंज खिलाड़ी एवम प्रशिक्षक है जिन्होंने शतरंज के सभी पक्षों पर अलग-अलग पुस्तकें लिखी हैं। उनकी तीन पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी है।अन्य 9 पुस्तकें अभी प्रकाशक के पास है। ग्राम काशीबहरा में शिक्षक पद पर कार्यरत हेमन्त खूंटे दिन भर ड्यूटी के बाद देर रात तक लेखन का काम ही करते रहे है।शतरंज के प्रति जुनून के कारण वे अपने घर में ना तो टीवी देखते और ना ही कभी कहीं घूमने जाते।

1997 से लिख रहे
हेमन्त खूंटे बताते है कि उन्होंने पहली बार 1993 में शतरंज के बारे में जाना।इसके बाद वे लगातार शतरंज खेलने में व्यस्त रहे।उनके खेल को देख प्रदेश के नामी खिलाड़ियों में भी उनकी चर्चा होती रहती थी।लिहाजा उन्होंने सन 1996 में विज्ञान सभा से जुड़ कर उसके बेनर तले ही शतरंज क्लब की स्थापना की।इस क्लब के माध्यम से उन्होंने क्षेत्र के बच्चों को शनिवार छुट्टी के बाद रविवार को उनके स्कूल में ही बुलाकर शतरंज सिखाया। फिर बच्चों में शतरंज के प्रति उत्सुकता देख कर उन्होंने 1097 में शतरंज की विभिन्न पक्षों को अक्षरों में ढालने का काम प्रारम्भ किया। नतीजा उन्होंने अलग अलग पक्षों की अब तक 12 किताबें लिख डाली।इतना ही नहीं श्री खूंटे ने अब तक प्रदेश स्तरीय 7 बार शतरंज प्रतियोगिताएं भी कराई है।

छ ग में प्रकाशक महंगे
खूंटे ने पुस्तको के प्रकाशन के लिए पहले प्रदेश के अनेक प्रिंटिंग प्रेस एवम प्रकाशकों से सम्पर्क किया।परन्तु यहां के प्रकाशकों की अत्यधिक कीमत ने उन्हें निराश कर दिया। पर अध्ययन के दौरान वे उन किताबों के प्रकाशकों से अपनी पुस्तक के प्रकाशन के बारे में जानकारी लेते रहते।इस बीच कर्नाटक के एक प्रकाशक उनकी पुस्तक अल्प डर पर प्रकाशित करने तैयार हो गए।उनकी पहली ही पुस्तक प्रकाशन के बाद मिले नतीजो से प्रकाशक संतुष्ठ हो गए और अब वे अत्यंत अल्प दर पर बाकी पुस्तकें प्रकाशित कर देश भर में मात्र लागत दर पर बिक्री के लिए उपलब्ध करवा रहे हैं।

मकसद जागरूक करना
हेमन्त खूंटे ने बताया कि वे मूलतः शिक्षक है और अपनी ड्यूटी भी समय से पूरी करते है।इसके बाद बचे समय का उपयोग वे शतरंज के माध्यम से बच्चों की मानसिक क्षमता बढ़ाने एवम अपने जीवन में धोखे एवम छल से कैसे बचें सिखाते है।वर्तमान में वे दिव्यांग सेवा समिति से जुड़े है।लाखागढ़ के पास साहू अस्पताल के एक सभागार में प्रत्येक रविवार को दोपहर 1 से 3 बजे तक निःशुल्क शतरंज की पाठशाला का आयोजन करते है।अब तक उन्होंने क्षेत्र के 3000 से अधिक बच्चो को शतरंज सीखा चुके है।इनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भी शामिल हुए है।उनका सपना है कि उनके सिखाये शतरंज खिलाड़ियों में कोई विश्व चैंपियन बने।इसके लिए वे अपने वेतन से कुछ राशि निंकालते है एवम कुछ राशि अपने शुभचिंतकों से शतरंज को आगे बढ़ने के लिए लेकर खर्च करते है।