बस्तर बीयर के लिए इंतजार खत्म…

यह है आदिवासियों के सेहत का राज

बस्तर। नवंबर आते ही ठंड शुरू हो गई और इसके साथ ही बस्तर बीयर के प्रेमियों का इंतजार भी खत्म होने वाला है। दरअसल ठंड आते ही सल्फी के झाड़ से रस निकलने लगता है। स्थानीय भाषा में इसे सुर कहा जाता है। इसके रस को हिलाने से बीयर की तरह झाग निकलता है साथ ही इसके सेवन से नशा भी होता है। इसी कारण से इसे बस्तर बीयर भी कहा जाता है। आदिवासियों के सेहत का राज इस पेड़ में ही छिपा है। सल्फी की महत्ता इसीसे आंकी जा सकती है कि बेटियों को दहेज के रुप में दिया जाता है।

सल्फी का पेड़ बस्तर के लिए विशेष महत्व रखता है। यह महुआ पेड़ की तरह ही अतिरिक्त आमदनी का जरिया है। आदिवासी अपने आंगन या खेतों की मेड़ पर पेड़ लगाते हैं। सल्फी का पेड़ 40 फीट तक ऊंचा हो सकता है और 9 से 10 साल के बाद सल्फी (रस) देने शुरू करता है। सुबह और शाम, दो बार सल्फी का रस निकाला जाता है। सल्फी पेड़ से रस निकलने का क्रम 4 से 5 माह तक बना रहता है। एक पेड़ से दिन भर में लगभग 50 लीटर तक सुर निकल जाता है।

सल्फी (वानस्पतिक नाम:Caryota urens / केरियोटा यूरेन्स)

ताड़ कुल का एक पुष्पधारी वृक्ष है। यह भारतीय उपमहाद्वीप तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का देशज है। इसको संस्कृत में ‘मोहकारी’ कहते हैं। मादक रस देने वाले इस वृक्ष को गोंडी बोली में ‘गोरगा’ कहा जाता है तो बस्तर के ही बास्तानार इलाके में ये ‘आकाश पानी’ के नाम से जाना जाता है।

              सल्फी का रंग दूध की तरह सफेद होता है, दूध से थोड़ा पतला जैसे किसी ने पानी मिला दिया हो। स्वाद में हल्का खट्टापन लिए मीठी होती है। इसका ताजा रस नशा नहीं करता, यह सेहत के लिए फायदेमंद है। वहीं बासी होने पर खमीर उठना शुरू हो जाता है और खट्टापन-कड़वापन बढ़ने लगता है, इसके सेवन से यह नशा देने का काम करता है।

सल्फी के फायदे
दिन की शुरुआत में ताजी सल्फी एक ऊर्जादायक पेय है। पेट संबंधी कई विकारों को खत्म करने का दावा यहां के आदिवासी करते हैं। लिहाजा सल्फी लें पर सीमित मात्रा में वह भी ताजी।