अमरावती से नुआपाड़ा तक का सफर साइकिल से तय करने मजबूर, ओडिशा के मजदुर

सरकारी मदद नहीं मिली, सामान साइकिल में लादकर निकले गृहग्राम की ओर

रायपुर। लॉकडाउन फेस 3 शुरू होने के बाद देशभर के अलग – अलग राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूर पैदल या साइकिल के सहारे ही अपने-अपने घरों की ओर जा रहे है। केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश के बाद कई राज्यों ने इन मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनें और बसें संचालित करने का निर्णय लिए हैं। इसके बावजूद प्रवासी मजदुर पैदल और साइकिल से अपने घर जाने को मजबूर हैं।

600 किलोमीटर का सफर साइकिल से

ऐसे ही महाराष्ट्र के अमरावती से ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के लिए निकले प्रवासी मजदूरों का एक जत्था राजधानी रायपुर से होकर गुजरी हैं। इस जत्थे में तकरीबन 10 लोग थे जो साइकिल से ही अपने निवास ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के लिए निकले हैं। जत्थे में शामिल युवाओं ने बताया की वे सभी 7 मई से अपना सामान साइकिल में बांधकर अमरावती से नुआपाड़ा के लिए रवाना हुए हैं।

खाने के हैं लाले

इस दौरान इनके पास खाने पिने की कोई व्यवस्था नहीं हैं। इनकी तकलीफ सुनकर लोग बिस्कुट या नमकीन पैकेट दे देते हैं। जिसकों खाकर ही ये रास्ते में अपने मंजिल की ओर बढ़ जाते हैं। इन प्रवासी मजदूरों ने बताया कि पुरे देश में लॉक डाउन हैं। बावजूद इसके इनकों कही भी नहीं रोका गया। साथ ही महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश करते समय किसी भी तरह का मेडिकल परिक्षण नहीं किया गया। जो अपने आप में एक बड़ी लापरवाही को दर्शाती हैं।

ओडिशा सरकार से नहीं मिली कोई मदद

इसके साथ ही ओडिशा सरकार के कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा होता हैं, की अपने राज्य के प्रवासी मजदूरों को वापिस लाने के लिए सिर्फ दावे करते नजर आ रहे हैं। सुविधा के नाम पर जमीनी सच्चाई ये हैं की प्रवासी मजदूरों को साइकिल का सहारा लेकर अमरावती से ओडिशा के नुआपाड़ा जाना पड़ रहा हैं।

मजदूरों ने बताया की नुआपाड़ा जाने के लिए आवेदन किए थे। जिसके तहत पंजीयन हुआ था। लेकिन नुआपाड़ा जाने के लिए निर्धारित तिथि की जानकारी नहीं मिल पा रही थी। जिसके चलते साइकिल पर ही ओडिशा के नुआपाड़ा जाने का निर्णय लेते हुए सामान साइकिल पर लादकर अपने गृहग्राम के लिए निकल पड़े।

गौरतलब हैं की महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या हो गई हैं। लिहाजा रेड जोन की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह फंसे प्रवासी मजदुर अपने – अपने घर जाने के लिए बेताब हैं।सरकार इनके लिए बस और ट्रैन की व्यवस्था करने की बात कहती हैं। लेकिन सरकारी दावों के उलट ज्यादातर लोग निजी जुगाड़ से ही अपने गंतव्य की ओर जाने को मजबूर हैं।

बहरहाल इन प्रवासी मजदूरों का इस तरह से पैदल या साइकिल से अपने घरों के लिए निकलना सरकारों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाती हैं। इसके साथ ही राज्य सरकारों के द्वारा प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के सभी जतन नाकाफी साबित हो रहे हैं। जो बेहद चिंताजनक बात हैं।