आजादी के 73 साल-’ट्रायल एंड एरर’ पद्धति देश के लिए खतरनाक 

क्या यह सब सिर्फ ब्यूरोक्रेसी और मिडिया का खेल है ?

 

• डाॅ. लखन चौधरी
आजादी के 72-73 सालों बाद यानि स्वतंत्रता के सातवें दशक और 21वीं सदी में देश की तमाम संस्थाएं, संगठन, समूह और सभी सरकारें (केंद्रीय, राज्य, स्थानीय) ‘ट्रायल एंड एरर’ पद्धति से चल रहे हैं। देश का सारा का सारा ’सिस्टम’, देश की सारी की सारी व्यवस्था ट्रायल एंड एरर (प्रयास एवं त्रुटि Trial and Error) सिस्टम से चलायी जा रही है। कहीं कोई ठोस नीतियां, दूरदर्शी योजनाएं एवं पुख्ता कार्यक्रम नजर नहीं आता है। यह देश के लिए बेहद खतरनाक है, साथ ही साथ यह देश के लिए भयानक अहितकर एवं हानिकारक भी है। फिर भी किसी को परवाह है, ऐसा लगता नहीं है। देश के जनप्रतिनिधियों, प्रशासकों, सरकारों को तो बिल्कुल नहीं। आने वाले समय में देश के लिए यह स्थिति घोर अराजकता, अव्यवस्था, अशांति, असंतोष का जनक एवं कारण दोनों बन सकती है। इसलिए इस पर गंभीर विमर्श की जरूरत है।
पिछले कुछेक महिनों एवं सालों से देश में कारोबार, व्यापार-व्यवसाय, उद्योग-धंधे, रोजगार, बेकारी एवं बेरोजगारी, बाजार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, भूखमरी, लाचारी, बेबसी, सामान्य जनजीवन, राजनीति, समाज, विचारधारा और भी बहुत कुछ आदि को लेकर जिस तरह की स्थितियां-परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वह संभलने, विचार करने, विमर्श करने का संकेत दे रही हैं। ये सभी मसले एवे मुद्दे हमें चेतावनी दे रहे हैं लेकिन हमारे सरकारों की कुम्भकर्णी निद्रा उन्हें जागने ही नहीं दे रही है।
कोविड-19 महामारी या संकट से निपटने, निकलने, उबरने, जूझने के मामले पर ही देख लिजिए। जब देश में सख्त तालाबंदी-लॉकडाउन की जरुरत है, तो पूरा खोल दिया गया और जब इसकी इतनी सख्त जरुरत नहीं थी, तब सख्ती बरती गई। जिस तरह से कोरोना का संक्रमण देश में लगातार बढ़ता जा रहा है, और महानगरों से मौतों की जिस तरह से खबरें आ रही हैं भयानक मंजर है।
देश के दिल्ली समेत कई महानगरों में मानवता कराह रही है और सरकारें मास्क-मास्क, सेनेटाईजर-सोशल डिस्टेंसिंग, पीपीई-अनलॉक 1, 2, 3, 4… खेल रही हैं। जब प्रवासियों को उनके घर पहुंचाने के लिए पुख्ता नियम, नीतियां, कानून, कायदे की जरुरत थी तब सरकारें लॉकडाउन 1, 2, 3, 4, 5…खेल रही थीं।
सवाल उठता है कि क्या यह सब सिर्फ ब्यूरोक्रेसी और मिडिया का खेल है ? क्या सिर्फ यही दोनों पूरे देश को अपने-अपने तरीके से गुमराह करते रहते हैं ? आम जनता एक कप चाय, एक टॉफी और तो और मात्र एक आश्वासन में बिक जाती है और बाद में रोते रहती है। ये क्या पूरा का पूरा खेल चल रहा है ? ’ट्रायल एंड एरर’ का। गलत-सही कुछ भी योजनाएं, नीतियां और कार्यक्रम बनाईये। टेक्स का, लोगों के खून-पसीने का पैसा पानी की तरह बर्बाद कर दिजीये और कुछ दिन बाद उसे सुधार के नाम पर बदल दिजीये। उसमें फिर नये प्रयोग किजीये और फिर पैसा लगाईये। यह काम तब तक चलने दिजीये जब तक तबादला ना हो जाए या सेवानिवृति ना हो जाए। मजाल है कोई आवाज उठाए, कोई बालबांका कर सके।
और कभी कोई आवाज उठ गई तो मुंह बंद करने में कितनी देर लगती है ? सब, सब कुछ मैनेज हो जाता है। धन्य है देश, देश की आमजनता, देश का बौद्धिक समाज, मिडिया, ब्यूरोक्रेसी और देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि ! सलाम है। चलने दिजीये ’ट्रायल एंड एरर’ का खेल। क्या फर्क पड़ता है, किसको फर्क पड़ता है।
प्रयास या त्रुटी अथवा प्रयत्न या भूल के सिद्धांत में थार्नडाइक यही तो बताने का प्रयास करते है कि किस प्रकार चूहे, बिल्ली, मुर्गी आदि बेजुबान पशु-पक्षी, जानवर, बच्चे प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखते हैं। जब व्यक्ति कोई कार्य सीखता है, तब उसके सामने एक विशेष स्थिति या उद्दीपक होता है, जो उसे विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित या उत्प्रेरित करता है।
इस प्रकार एक विशिष्ट उद्दीपक (Stimulus) का एक विशिष्ट अनुक्रिया (Response) से संबंध स्थापित हो जाता है तो उसे उद्दीपक अनुक्रिया संबंध कहते हैं। यही सीखना, अधिगम है। यह जीवनभर चलने वाली सतत प्रक्रिया है, और हमारे सरकारें भी इसी का प्रयोग, पालन, परिपालन कर रही हैं, करती रहती हैं। सरकार बनाना, सरकार चलाना, सरकार गिराना इस सिद्धांत से कमतर बिल्कुल नहीं है। आमजनता बेजुबान जानवर की तरह प्रयोग के लिए तैयार है। कुर्सी, रंगदारी, दबदबा, रसूख, सुख-सुविधाएं उद्दीपक हैं।
’ट्रायल एंड एरर’ मतलब ’प्रयास या प्रयत्न एवं भूल या त्रुटि’ यानि प्रयास में भूल या त्रुटि होने पर प्रयास को निरंतरता में जारी रखा जाए या प्रयास करते रहा जाए तो कुछ समय बाद सुधार आ ही जाएगा या आ ही जाता है। तात्पर्य यह है कि सरकार के मातहत या नुमाइंदे और अधिकारी कर्मचारी तथा ब्यूरोक्रेसी, जनप्रतिनिधि सब आपस में मिलजुलकर (अधिकांशतया जान-बूझकर और कुछेक मामलों में अनजाने में) ऐसी नीतियां, कार्य-योजनाएं, कार्यक्रम बनायेंगे या बनाते हैं जिसमें खामियां, गलतियां और त्रुटियां हों, होती हो और फिर उसको सुधारने का खेल सालों-साल चलता रहता है।
सरल शब्दों में तोड़ो और बनाओ। गलतियां करो और सीखो। बार-बार गलतियां करके सीखो। बार-बार गलतियां करते रहो और सीखते रहो। जनता सुधार, नवाचार के नाम से तमाशा देखते रहे। क्या फर्क पड़ता है ? चलता रहे यह कारोबार का खेल। सरकार में बने रहने और सरकार को बनाये रखने का खेल।
याद रख लीजिये कोरोना या कोविड-19 संकट, महामारी एवं त्रासदी अब भष्ट्राचार की तरह व्यवस्था ’सिस्टम’ में चिपक चुका है, पूरे सिस्टम को अपने कब्जे में ले रखा है जो अब जाने वाला ही नहीं है। ये देश में, सोच में, कार्यप्रणालियों में, विचारधाराओं में, अर्थव्यवस्था में, पर्यावरण में, प्रकृति में, लोगों के जेहन में और सरकार की फाईलों पर सालों-साल चिपका पड़ा रहेगा, फाइलों के भीतर बैठा रहेगा। दुनिया का तो स्पष्ट नहीं पर अब देश के आमजन को कोरोना एवं भष्ट्राचार के साथ ही जीना है, और इसी के साथ मरना है।
(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं)
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