पंजाब के बाद छत्तीसगढ़ में कृषि कानूनों पर टकराव : कितना जायज, कितनी जरूरी ?

छत्तीसगढ़ सरकार के इस निर्णय को किसानों के पक्ष में एक महत्वपूर्णं कदम माना जा रहा

पंजाब, छत्तीसगढ़ और केरल सरकार ने नये-नये कृषि विधेयक और कानून लाकर किसानों के हित एवं हक में महत्वपूर्णं निर्णय का बड़ा काम किया है। केरल सरकार सब्जियों का ’न्यूनतम समर्थन मूल्य’ लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। आज वास्तव में इस तरह के कानूनों की जरूरत है जिससे किसानों को उत्पाद का एक उचित एवं वाजिब मूल्य मिल सके, और किसानों को सीधा फायदा पहुंचे। मोदी सरकार को इस दिशा में काम करने की दरकार है

•डाॅ. लखन चौधरी

कृषि कानूनों को लेकर पिछले दिनों देश में जो हल्ला मचा हुआ था, बहस छिड़ी हुई थी, सड़कों पर प्रदर्शन एवं आंदोलन हो रहे थे; समर्थन एवं विरोध का यह बवाल एवं सवाल अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। पंजाब-हरियाणा में केन्द्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ सड़कों, रेल पटरियों पर प्रदर्शन लगातार जारी है।

पंजाब के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपने राज्य के किसानों के हित में ’कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक’ पारित कर दिया है। अब आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि इन राज्यों के नये कृषि कानूनों का रास्ता कितना आसान होगा ? इनकी वैधानिकता को लेकर क्या होगा ? और यदि इनका रास्ता साफ हो गया तो इससे किसानों को कितना फायदा होगा ?

कृषि, राज्य का विषय होने के बावजूद केन्द्र सरकार जिस तरह से कानूनों को थोप रही है। समवर्ती सूची के विषयों पर लगातार नये-नये कानून बना रही है, इससे तय है कि आगे टकराव की स्थितियां आने वाली हैं। बहरहाल विधानसभा के विशेष सत्र में छत्तीसगढ़ सरकार ने ’कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक’ के द्वारा राज्य के किसानों के हित में एक बड़ा काम और एक बड़ा निर्णय किया है।

पंजाब के बाद छत्तीसगढ़ सरकार के इस निर्णय को किसानों के पक्ष में एक महत्वपूर्णं कदम एवं पहल माना जा रहा है। कहा जा रहा है राज्य के कृषि उपज मंडियों और किसानों के लिए जो नया विधेयक लाया गया है; इस समय न केवल इसकी जरूरत थी, बल्कि राज्य के छोटे, मध्यम, सीमांत एवं गरीब किसानों के लिए यह उपयोगी साबित हो सकता है।

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उठाया जा रहा मसला कि केंद्र सरकार नये कृषि कानूनों के माध्यम से देश की कृषि उपज मंडियों को वालमार्ट बनाकर अडानी-अंबानी को देना चाहती है ? अंबानी-अडानी जब बाजार का उतार चढ़ाव तय करेंगे तो छोटे, मध्यम, सीमांत एवं गरीब किसान कहां जाएंगे ? सही एवं वाजिब लगता है।

सरकार का वास्तव में यह लोकतांत्रिक दायित्व है कि सरकार उसके राज्य के किसानों के हक में कानून बनाकर काम करे, जिससे किसानों का लाभ हो। छत्तीसगढ़ सरकार का स्पष्ट कहना है कि राज्य केंद्र के कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा है, बल्कि राज्य का यह कानून किसानों की मदद के लिए है।

छत्तीसगढ़ सरकार का तर्क है कि केंद्र का कृषि कानून देश के बड़े उद्योगपतियों, पूंजीपतियों एवं कार्पोरेट घरानों के लिए है जिसका आधार आर्थिक है, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार के नये कृषि विधेयक का आधार किसानों के हितों का संरक्षण करना है; तार्किक एवं प्रासंगिक लगता है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रस्तुत विधेयक में सात संशोधन लाये हैं। सरकार ने इस विधेयक में ’डीम्ड मंडी’ को परिभाषित किया है। ’कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक’ के खण्ड 3 में हुए संशोधन के अनुसार सरकार द्वारा निजी मंडियों को ’समकक्ष मंडी’ डीम्ड मंडी घोषित किया जाएगा।

राज्य के बाहर से आने वाले अनाज को लेकर नए कानून में प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार राज्य सरकार के अधिसूचित अधिकारी को मंडी की जांच का अधिकार दिया गया है। निरीक्षण में जब्ती का अधिकार दिया गया है, अधिकारियों को भंडारण की तलाशी का अधिकार होगा, वाद दायर करने का अधिकार मंडी समिति और अधिकारियों को होगा। न्यायालय के अधिकार को परिभाषित कर इन सभी बिंदुओं के लिए धारा 49 में प्रावधान किया गया है।

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक में स्पष्ट किया कि कोई भी संशोधन केंद्र के कानून के खिलाफ नहीं है। राज्य सरकार अपने संवैधानिक दायरे में रहते हुए यह कानून लेकर आई है, जिससे राज्य के किसानों को सीधा लाभ होगा। सरकार की मंशा है कि इस विधेयक से राज्य की मंडियां मजबूत हो सकंेगी, किसानों के उत्पाद को सही दाम मिल सकेगा।

छत्तीसगढ़ सरकार के मंडी संशोधन विधेयक में जो सात संशोधन लाये गए हैं, वे इस प्रकार हैं:-
1- निजी मंडियों को समकक्ष या डीम्ड मंडी घोषित किया जाएगा।
2- राज्य सरकार के अधिसूचित अधिकारी को मंडी की जांच का अधिकार होगा।
3- अनाज की आवाजाही निरीक्षण में जब्ती का अधिकार होगा।
4- निजी मंडियों में अधिकारियों को भंडारण की तलाशी का अधिकार होगा।
5- मंडी समिति और अधिकारियों पर वाद दायर करने का अधिकार।
6- इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन भुगतान संचालन जैसे कार्य राज्य सरकार के बने नियम से होंगे।
7- जानकारी छुपाने और गलत जानकारी देने पर 3 माह की सजा या 5 हजार जुर्माना का प्रावधान है, तथा दूसरी बार गलत जानकारी देने एवं जानकारी छुपाने पर छह माह की सजा और 10 हजार जुर्माना का प्रावधान किया गया है।

इधर सरकार के इस नये संशोधन विधेयक को विपक्ष ने विशुद्ध राजनीतिक एजेन्डा बताया है। विपक्ष का कहना है कि नये कृषि कानून में स्पष्ट है कि किसान मंडी के बाहर भी अपनी उपज बेच सकते हैं, और इसके लिए उन्हें मंडी शुल्क नहीं लगेगा। लिमिट के बाद का धान कहां बिकता है ? केंद्र के कानून में किसान व्यापारी के साथ अग्रीमेंट कर सकता है लेकिन यह अनिवार्य, मेंडेटरी नहीं है, यदि किसान नहीं चाहेगा तो कोई एग्रीमेंट नहीं कर सकता।

विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस के घोषणा पत्र के पेज नम्बर 17 से 21 तक में यह वादा था कि कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन करेगी जिसमें अंतरराज्यीय व्यापार के प्रतिबंध समाप्त हो जाए, इसलिए कांग्रेस भ्रम फैला रही है। देश में वातावरण बनाया गया एवं जा रहा है कि एमएसपी बन्द हो जाएगी वास्तविकता ऐसा नहीं है। एमएसपी पर खरीदी जारी रहेगी, किसानों को उपज बेचने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी।

राज्य की भाजपा इकाई का कहना है कि 2004 से 2014 तक केंद्र में यूपीए सरकार थी, कृषि मंत्रालय का बजट सिर्फ 12 हजार करोड़ का था, जो मोदी सरकार के आने के बाद बढ़कर 1 लाख 64 हजार करोड़ का हो गया है। पीएम किसान योजना के जरिये किसानों की आय सहायता योजना शुरू की गई है, जिसके तहत 92 हजार करोड़ रुपये किसानों के खाते में पहुंच चुके हैं, एवं किसानों की ऋण की सीमा बढ़ाई गई है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार केवल दिखावा एवं किसानों के साथ छलावा कर रही है।

केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं करने को लेकर बार-बार सफाई दे रही है। इसके बावजूद देश के किसान विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह एक बड़ा सवाल है। ’गांव-कनेक्शन’ के एक सर्वे के अनुसार इस समय देश का हर दूसरा किसान केन्द्र के कृषि कानूनों का विरोधी है, देश के 52 प्रतिशत किसान केन्द्र के नये कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं तो क्यों ?

क्या यह आशंका निराधार है कि मंडियों से बाहर जाकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य कैसे, कब तक मिलता रहेगा ? क्या निजी कंपनियां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर एग्रीमेंट करेंगी ? क्या गांरटी है कि कंपनियां से बीच में एग्रीमेंट, करार निरस्त-रद्द हो जाने की स्थिति में किसानों को न्याय मिल सकेगा ? किसान दूसरी कंपनी के साथ करार कर सकेंगे ? अपने बुरे अनुभव के बाद किसान बीच में करार तोड़ सकेंगे ? और खुले बाजार का रूख कर सकेंगे ? क्या यह आशंका निराधार है कि देश के बड़े कार्पोरेट घरानों के काले धन को समायोजित करने के लिए कृषि को कार्पोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है ?

केन्द्र सरकार सारे कृषि उत्पादों का अनिवार्य न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित क्यों नहीं करती है ? केन्द्र सरकार स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने से भाग क्यों रही है ? सरकार तमाम कृषि उत्पादों का एक ’न्यूनतम बाजार मूल्य’ तय क्यों नहीं करती है ? छत्तीसगढ़ सरकार की तरह मोदी सरकार धान का समर्थन-खरीद मूल्य 2,500 रूपया प्रति क्विंटल क्यों नहीं करती ? छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि सरकार के इस नये विधेयक से कृषि उत्पादों की भंडारण क्षमता पर भी लगाम लगाया जा सकेगा जिससे महंगाई से राहत मिलेगी।

(लेखक; हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग, छत्तीसगढ़ में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)

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