दुनिया में कोरोना के इस संक्रमण काल में कोरोनिल और बाबा रामदेव

डॉ. लखन चौधरी के विचार

डॉ. लखन चौधरी

कोरोना कालखण्ड रोज नये-नये अनुभव एवं नई-नई कहानियां लेकर आ रहा है। जाहिर है इन नये अनुभवों एवं नई कहानियों से नये कारनामें बनेंगे। इधर भारतवर्ष की बात करते हैं तो यहां हर गांव-शहर और नगरों में करामाती साधुओं, बाबाओं की फौज मिल जायेगी, इनकी कहीं कोई कमी नहीं है।

देश का उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम या मध्य कोई राज्य इनसे अछूता या बचा नहीं है। लाखों की संख्या में बाबागण देश के करोड़ों श्रद्धालुओं, भक्तों की समस्याओं, कठिनाईयों का समाधान निकाल रहे हैं। एक अरब से उपर की जनसंख्या वाले देश में करोड़ों श्रद्धालुओं, भक्तों के हिसाब से लाखों बाबा कम ही लगतें हैं।

यहां तो हर परिवार के लिए एक बाबा चाहिए। आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक ना-जाने कितनी तरह की समस्याएं एवं कठिनाईयां इस देश से जाने, भागने का नाम ही नहीं लेती है। लेकिन हमारे इन करामाती बाबाओं के पास सब का समाधान, ईलाज एवं उपाय है। पर पिछले कुछ बरसों से इन बाबाओं ने जिस तरह से जनता के प्रति विश्वास खोया है उसे सब जान रहे हैं, इसलिए इन पर विस्तार से चर्चा, परिचर्चा करना फिलहाल गैर-जरूरी है।

अब कोरोना संकट, कोविड महामारी या कोविड-19 त्रासदी को पर आएं। इस समय पूरी दुनिया इसकी चपेट में है। आज की तारीख में दुनियाभर में लगभग एक करोड़ लोग इसके संक्रमण का शिकार हो चुके हैं, लगभग पांच लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

विभिन्न देशों में कोरोना के ईलाज के लिए 120 तरह की वैक्सीन पर काम चल रहा है, मगर अभी तक सफलता किसी को नहीं मिली है। इधर हमारे बाबा रामदेव का दावा है कि उन्होंने इसका रामबाण ईलाज ढ़ूंढ़ लिया है। पतंजलि द्वारा तैयार की गई दवा कोरोनील कोरोना के खिलाफ कारगर है। इसके साथ ही वे  सुर्खियों और सवालों के घेरे में आ गए। साथ ही सरकारों के निशाने पर ।

उत्तराखण्ड सहित केन्द्र सरकार ने ही दवा के दावों की पुष्टि के नाम पर कोरोनिल के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है, और इधर बाबा एवं आयुर्वेदप्रेमी उनके अनुयायी एवं प्रशंसक सोशल मीडिया पर कूद पड़े हैं। वहीं कोरोना, कोरोनिल दवा और दावों को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसे जंग छिड़ गई है, मानो कि जैसे कोरोनील, कोरोना को भारत सहित दुनियाभर से खत्म कर ही दम लेगी।

पूरी दुनिया आज भी कोरोना महामारी एवं संकट से बदहाल है। अमरीका जैसा विकसित देश पस्त हो चुका है। दुनिया के बड़े-बड़े फार्मा कंपनियों के प्रयास को अभी तक सफलता कैसे नहीं मिल सकी है ? जब उत्तराखण्ड सरकार खूद कह रही है कि पतंजलि को इम्यूनिटी बूस्टर, कफ एवं बुखार ठीक करने की दवा बनाने का लायसेंस दिया गया था, तो कोरोना की दवा कैसे बना सकते हैं ?

सवाल खड़ा होना इसलिए जायज एवं स्वाभाविक है कि सर्दी-खांसी एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा के लायसेंस पर बाबा ने कोरोना की दवा का नाम कैसे दे दिया ? दूसरा सवाल बाबा की सरकार में इतनी दखल एवं घुसपैठ होने के बावजूद बाबा को सरकार के सामने क्यों खड़ा किया जा रहा है ?

दरअसल में रामदेव बाबा ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था और जनमानस की भावनात्मक कमजोरी का उपयोग करते हुए कम समय में अधिक प्रसिद्धि हासिल की। लगभग दो-ढाई दशक की लंबी अपार लोकप्रियता को बाबा ने कारोबार एवं व्यापार के माध्यम से खूब भुनाया। खूब पैसा कमाया।

उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें राजनीति में स्थापित होने के लिए बाध्य किया लेकिन वहां सफल नहीं हुए और कारोबार भी चौपट हो गया। अंततः बाबा पुनर्जीवन और पुनर्वास तथा पुनर्स्थापन के लिए अपने आप को प्रासंगिक करने में लगे हैं। लेकिन इसमें मुश्किलें बहुत हैं, अब यह आसान नहीं है।

यह सही है कि बाबा रामदेव लगभग आरंभ से दक्षिणपंथियों के प्रायोजित कार्यक्रम थे, अन्यथा योग और आयुर्वेद तो भारत में आदिकाल से प्रसिद्ध है। स्वदेशी के नाम से बाबा को माध्यम बनाकर पूंजीपतियों ने खूब धन कूटा है। बाबा का दावा और दवा यदि इतनी ही कारगर है तो कुछेक महीने पहले उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण एलोपैथी के सहारे अपनी जान बचाने के लिए एम्स में क्यों भर्ती हुए थे ?

खबर है कि बाबा ने स्वयं अपने घुटनों का ईलाज जर्मनी में जाकर कराया है ? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबा यदि इतने जनसेवक थे, हैं तो उनके उत्पाद और सामान इतने महगे क्यों होते हैं ? जन सरोकार का क्या और कौन सा बड़ा काम किया है बाबा ने जिससे समाज के अन्तिम पंक्ति के करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव आया है ?

बाबा रामदेव ने समय का फायदा उठाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। एक  बाबा ने विदेशों में जमा कालेधन को लाने की मुहिम चलाने की बात छेड़कर पूरे देश में सनसनी मचा दी थी। चूंकि देश में कालेधन का मुद्दा हमेशा से सुर्खियों में रहा है, इसलिए मोदी जी ने तत्काल लपकते हुए इसे अपना एजेंडा बना लिया और सत्ता में आने में यह मुद्दा बड़ा सहायक सिद्ध हुआ।

भष्ट्राचार के विरूद्ध अन्ना हजारे एवं केजरीवाल के आंदोलन में साथ देकर बाबा रामदेव ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं। बाबा ने देश में पेट्रोल-डीजल सस्ता करने के मुद्दे को भी भुनाया और देश के आमजन के मन में एक विश्वास जगाया था कि बाबा सचमुच जन सरोकार के मसले को लेकर सरकार से दो-चार करके जनमानस को महंगाई, कालाधान जैसे ज्वलंत समस्याओं से छुटकारा दिलवा सकते हैं। लेकिन समय के साथ ये सभी बातें जुमला साबित हुईं।

आयुर्वेद एवं योग को लेकर भी बाबा ने खूब लोकप्रियता हासिल की और खूब धन कमाया। यह जानते हुए भी कि आयुर्वेद एवं योग भारत की प्राचीनतम परम्परा एवं धरोहर है, लोगों ने बाबा का बहुत साथ निभाया और देखते ही देखते बाबा ने राजनीति में भी अपना भाग्य आजमाने की महात्वाकांक्षा पाल ली।   उस वक्त देशभर में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी । बाबा के आयुर्वेद एवं योग की लोकप्रियता ने देश के एलोपैथी डाक्टरों की नींद उड़ा दी और बाबा के अनुयायियों के अनुसार बाबा के विरूद्ध कई तरह के षड़यंत्र भी हुए। पर कालांतर में धीरे-धीरे बाबा का प्रभाव कम होता चला गया । सरकार में भी बाबा की पूछपरख कम होती चली गई इससे बाबा हाशिए पर आ गए।

अब एक लंबे समय के बाद कोरोनिल ने जैसे बाबा को नये पंख, नई जान देकर नये उड़ान के लिए तैयार कर दिया है। क्या बाबा फिर एक बार अपनी पुरानी जमीन पाना चाहते हैं?  क्या बाबा अपनी पुरानी छवि को बरकरार रखते हुए अपना प्रभाव एवं परिणाम दिखाने में फिट बैठ पायेंगे ? सवाल स्वाभाविक है क्योंकि बाबा ने जिस तरह से अपने पैकेज की ब्रांडिग की थी, करते हैं या कर रहे हैं उससे तो यही दिख रहा है ?

बाबा के प्रयोग पर सरकार का सवाल उठाना सही इसलिए है क्योंकि यदि सरकार आसानी से बाबा की बात पर मोहर लगाकर उन्हें लायसेंस दे देती है तो विपक्ष के साथ पूरी दुनियाभर में हल्ला मचना तय है। दुनिया में जब कोई नई वेक्सीन, दवा बनती है तो सैकड़ों, हजारों, लाखों पशु-पक्षियों एवं जानवरों तथा लोगों पर सैकड़ों, हजारों, लाखों बार क्लीनिकल ट्रायल होता या किया जाता है। एक लंबे समय तक इसका प्रयोग चलता है, और जब पुख्ता प्रमाण के साथ सफलता हासिल होती है तब वह बाजार में आती है।

लिहाजा इतने कम समय में बाबा ने इतनी बड़ी ईजाद की है तो सवाल उठना या उठाना स्वाभाविक और जायज क्यों नहीं है ? जब देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या पांच लाख को पार कर चुकी है और वैज्ञानिकों के अनुसार आगामी नवम्बर में इसका पीक आना अनुमानित है, तो आमजनता में इस दवा के प्रति उत्सुकता बढ़ना भी स्वाभाविक है। वहीं उनके अनुयायियों का सरकारों के प्रति आक्रोश भी।

खैर आने वाला समय बताएगा कि  बाबा के इस दवा एवं दावों को समाज, सरकार, बाजार और दुनिया में  कितना प्रतिसाद मिलता है। चूंकि इस समय कोरोना से निपटने को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है, इसलिए बहुत बड़े वर्ग की जिज्ञासा भी है कि बाबा की दवा कितनी सही साबित होती है और कब आमजन के लिए बाजार में आती है।

यदि सचमुच में बाबा की दवा एवं दावे कारगर सिद्ध होते हैं, तो यह समाज एवं देश-दुनिया के एक बहुत बड़ा वरदान सिद्ध हो सकता है। देखना है कि क्या कोरोना कालखण्ड और कोरोनिल उन्हें एक बार फिर प्रतिस्थापित करती है ?

(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं) 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति desh tv उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार desh tv के नहीं हैं, तथा desh tv उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.