गिरती-घटती जीडीपी, सिकुड़ता रोजगार और टूटती उम्मीदें

अर्थव्यवस्था की हालत बहुत नाजुक एवं चिंताजनक-डाॅ.लखन चौधरी

वेब डेस्क | नोटबंदी के झटकों से देश उबरा भी नहीं था और कोरोना की मार ने देश की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। कोरोना संकट की जबर्दस्त और बेदम मार से देश की अर्थव्यवस्था हिल गई है, राज्य सरकारें और राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं हिल गई हैं। बाजार में मांग नहीं होने के कारण देश में चैतरफा बेरोजगारी का आलम है। जीडीपी, विकासदर, रोजगार, बाजार में मांग, निवेश आदि बुनियादि मसले अब देश की आमजनता को बुरी तरह से घेरने एवं परेशान करने लगे हैं। आम आदमी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है।

कोरोना की मार और नोटबंदी की वजह से देश का मध्यमवर्ग कम से कम दस साल पीछे चला गया है। चंद अमीरों एवं उद्योगपतियों को छोड़कर शेष की हालत बहुत अच्छी नहीं रह गई है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगधंधे अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। खुदरा कारोबार और व्यवसाय बाजार में मांग के अभाव तथा चंद कारोबारी घरानों के एकाधिकार के कारण तबाह हो गया है। असंगठित क्षेत्र चारों खाने चित्त है। बेतरतीब जीएसटी की मार ने जहां कोरोबार एवं व्यवसाय जगत की कमर तोड़ कर रख दी है, वहीं यह राज्य सरकारों अर्थव्यवस्थाओं को भी खोखला कर दिया है। -•डाॅ. लखन चौधरी•

 

देश का युवावर्ग हताश, निराश, चिंतित और बेचैन है, क्योंकि अब उनके बेहतर एवं उज्जवल भविष्य एवं कैरियर की उम्मीदें टूटते नजर आ रहे हैं। युवापीढ़ी में आज बेकारी, बेबसी, लाचारी का आलम इस कदर हावी है कि देश का बहुसंख्यक युवावर्ग लगातार तनाव एवं अवसाद में जा रहा है। इसके बावजूद सरकार के झूठे दावे, अहंकार एवं नासमझी ने देश के सामने सवाल खड़ा तो किया है कि क्या सचमुच अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब नहीं है ? जैसा कि सरकार दावा कर रही है। जीडीपी, विकासदर, रोजगार, बाजार में मांग, निवेश आदि बुनियादि मसले सरकार को परेशान क्यों नहीं कर रहे हैं ? रोजगार कहां है ? जीडीपी लगातार क्यों गिर रही है ? आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम लगातार अपना प्रभाव दिखाने में असफल क्यों हो रहे हैं या अपना प्रभाव क्यों नही दिखा पा रहे हैं ?

अप्रैल से जून 2020 की तिमाही में देश का सकल घरेलु उत्पाद जो जीडीपी के नाम से जाना जाता है, 24 प्रतिशत नीचे चला गया है, या कहें कि इस तिमाही में देश की जीडीपी में 24 प्रतिशत की कमी आई है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में देश में रोजगार के अवसर और कम होंगे, घटेंगे। लोगों की प्रतिव्यक्ति आय या आमदनी कम होगी, घटेगी। देश में बेरोजगारी और बढ़ेगी। इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि बाजार में मांग और कम होगी, और घटेगी। उत्पादन और घटेगा, उत्पादकों का मुनाफा घटेगा इससे निवेश घटेगा, इसके कारण रोजगार के अवसर और कम होंगे। बेरोजगारी और बढ़ेगी यानि अर्थव्यवस्था की स्थिति और खराब होगी। मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में कई तिमाईयों तक यह समस्या या संकट जारी रहने वाली है।

दरअसल में अर्थव्यवस्था में यह प्रक्रिया एक साइकल (चक्र) के रूप में काम करता है, और देश की सारी चीजों को प्रभावित करता रहता है। इससे समूचा जनमानस प्रभावित होता है। लोगों की प्रतिव्यक्ति आय या आमदनी कम होने, घटने से लोगों का रहन-सहन, खान-पान, जीवनस्तर, उनकी जीवन की गुणात्मकता प्रभावित होती है। एक परिवार में यदि एक व्यक्ति की नौकरी छिनती है, या परिवार में एक व्यक्ति की नौकरी लगती है, तो इससे केवल वह परिवार ही प्रभावित नहीं होता है, बल्कि उस परिवार की आर्थिक स्थिति पूरे बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। जीडीपी, विकासदर, अर्थव्यवस्था का इसलिए आम जनमानस के लिए सार्थक महत्व होता है।

जीडीपी की इस ऋणात्मक बढ़ोतरी या जीडीपी में आई भारी कमी को लेकर इस समय देश में जो बवाल मचा हुआ है, उस पर चर्चा, परिचर्चा, विमर्श, संवाद होना स्वाभाविक है, लेकिन जीडीपी के आंकड़ों को लेकर सरकार की बेफिक्री अधिक चिंता एवं दुर्भाग्य की बात है। जीडीपी के आंकड़े जारी हुए पूरे एक सप्ताह हो चुके हैं, परंतु प्रधानमंत्री की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आना बताता है कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर सरकार कितनी गंभीर है ? इससे यह भी पता चलता है कि सरकार को देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य एवं कैरियर को लेकर कितनी चिंता है ? क्योंकि जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध सबसे पहले रोजगार एवं आजीविका से होता है। जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध युवाओं के भविष्य एवं कैरियर से होता है। जीडीपी का सीधा और प्रत्यक्ष संबंध जनमानस के जीवनस्तर की गुणात्मकता से होता है।

आजकल जीडीपी को लेकर लोगों में जागरूकता मीडिया के कारण कुछ अधिक दिखती है, लेकिन यहां जीडीपी को लेकर सतही जानकारी ही परोसी जाती है। जीडीपी के असल मुद्दों को या तो जानबूझकर छोड़ दिया जाता है या जीडीपी के असली तथ्यात्मक मसलों को लेकर जनमानस को गुमराह किया जाता रहता है। वास्तव में जीडीपी का संबंध केवल रोजगार, विकासदर, बाजार की मांग, निवेश जैसे आर्थिक मुद्दों भर से ही नहीं होता है, बल्कि इसका प्रत्यक्ष संबंध देश के सामाजिक विकास और वहां की जनमानस की वास्तविक खुशहाली, सम्पन्नता, संवृद्धि, तरक्की, प्रगति से होती है।

सकल घरेलु उत्पाद यानि जीडीपी किसी देश की अर्थव्यवस्था के विशेषकर आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादि माप, मापदंड या पैमाना होता है। प्रमुख रूप से किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार मूल्य को सकल घरेलु उत्पाद यानि जीडीपी कहा जाता है। इसके अंतर्गत उस अवधि के आयात-निर्यात समायोजित होते हैं। इसी से देश की विकासदर का अंदाजा या अनुमान लगाया जाता है कि आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था की सेहत किस तरह रहने वाली है ? रोजगार की स्थिति कैसी रहने वाली है ? बाजार की हालत कैसी रहने वाली है ? विकास दर कैसी रहने वाली है ?

सकल घरेलु उत्पाद यानि हमारी जीडीपी का मसला इस समय इसलिए अधिक चर्चा में है, क्योंकि इस समय यह दुनिया में सर्वाधिक गिरावट ऋणात्मक 24 प्रतिशत के साथ देश की पिछली 40 साल की सबसे बड़ी गिरावट है। नोटबंदी के बाद इस समय देश में बेराजगारी को लेकर पिछली 45 सालों की सबसे बड़ी बेरोजगारी की मार अर्थव्यवस्था में वैसे भी पहले से मौजूद है। ऐसे समय में सकल घरेलु उत्पाद यानि जीडीपी में मात्र एक तिमाही में ही 24 प्रतिशत की गिरावट भारी चिंता एवं बड़ी चुनौती को दशार्ती है। इसके पहले तिमाही यानि जनवरी-मार्च 2020 में भी जीडीपी में 3-4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी की छाया है।

स्पष्ट है कि हमारी अर्थव्यवस्था की हालत इस समय बहुत नाजुक एवं चिंताजनक है, इसलिए सरकार द्वारा इसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। इससे निपटने, उबरने के लिए ठोस उपाय की आवश्यकता है, जिससे बाजार एवं अर्थव्यवस्था को सुस्ती एवं मंदी से तत्काल निकाला जा सके। जब बाजार में मांग बढ़ेगी तभी अर्थव्यवस्था की हालत एवं हालात सुधरेंगे, तभी देश की आर्थिक स्थितियां एवं परिस्थितियां सुधरेंगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, गरीबी, बेरोजगारी, असमानता आदि चिंताएं एवं चुनौतियां देश में पहले से ही खराब अवस्था में है। जीडीपी में भारी कमी आने से विकासदर और कम होगी जिससे इन चुनौतियों के और विकराल होने की संभावनाएं कई गुंना तक बढ़ सकती हैं। इसलिए सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अपना प्रदर्शन सुधारने की जरूरत है।

(लेखक; हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग, छत्तीसगढ़ में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)

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