देश टीवी विशेष : “शराब बिक्री पर घिरी सरकार”

दुर्ग विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक डाॅ. लखन चौधरी के विचार

 

COVID-19 महामारी, संकट और त्रासदी से निपटने, निकलने या उबरने से अधिक चिंता एवं चुनौती इस समय कुछ नहीं है, और कुछ नहीं होना चाहिए। लेकिन यह बात देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों के समझ में शायद नहीं आ रही है। लगता है, शायद लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए जनप्रतिनिधियों की सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गई है। अन्यथा कोरोना से लड़ने के बजाय शराब बेचने पर अपनी ताकत नहीं लगाते।

कितनी दुर्भाग्य एवं चिंता की बात है कि अब देश एवं राज्यों के नागरिकों, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों को कोरोना वायरस से लड़ने के साथ-साथ अपनी चुनी हुई सरकारों से भी लड़ना पड़ रहा है।

मतदान करते समय शायद यह बात लोगों के दिमाग में नहीं आई होगी, मगर याद रहे ! अगली बार लोग जरूर याद रखेंगे। इस बार जनता निर्णायक मूड में लग रही है। सरकारों को निर्णय करना है कि शराबबिक्री जारी रखना है या शराबबंदी जारी रखना है। अब सरकारों को समझना है कि कोरोना वायरस से लड़ना है, या आमजन के मन में पनप रहे सरकारों के प्रति आक्रोश रूपी वायरस से लड़ना है।

क्या राजस्व, आमदनी, कमाई, आय, प्राप्तियां ही सब कुछ है? क्या आर्थिक विकास ही, विकास का पैमाना होता है? क्या अर्थव्यवस्था की चिंता ही सब कुछ है ? क्या जनता के सेहत, स्वास्थ्य, तबाही, बर्बादी की चिंता सरकारों की नहीं है? क्या सरकारें एवं जनप्रतिनिधि केवल चुनाव और वोट के समय ही जनता के सुख-दुख के भागीदार होंगे ?

शर्म तो हमको भी आनी चाहिए क्योंकि हमने ही इन जनमत विरोधी जनप्रतिनिधियों को अपना नुमाइंदा या प्रतिनिधि बनाकर भेजा जो है। दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक को समाप्त हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं, और सरकार भूल गई कि ’प्रजामत’ ही ’राजधर्म’ होती है। मगर जनता की याददाश्त इस बार कमजोर नहीं है।

जनता को सरकार से यह पूछने का समय आ गया है कि सरकार किसके लिए है? सरकार किसके लिए चलाई जा रही है? सरकार किसके लिए बनाई गई है ? सरकार की नीतियां, योजनाएं, कार्यक्रम किसके लिए होते हैं जिन दिन जनता यह सवाल करना सीख जायेगी, उस दिन देश में शराबबंदी होकर रहेगी। जनता को यह सवाल क्यों नहीं उठाना चाहिए ? क्या अब समय आ गया है ? विचार कीजिए।

छत्तीसगढ़ सहित भारत सरकार का राजस्व घाटे की भरपाई के लिए शराब बेचने का निर्णय निंदनीय है। अब यह निर्णय सरकार के लिए भारी पड़ने वाला है। पहले ही दिन से देशभर के शराब दुकानों में जिस तरह की भीड़ उमड़ रही, टूट पड़ी है, उससे पिछले दो महिने से चले आ रहे सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की धज्जियां उड़ गईं हैं। पूरा देश शर्मशार हो गया है।

दुनिया देखकर हैरत में और हैरान होगी कि वाह क्या भारत है, जहां रामायण धारावाहिक के समापन एवं शराब दुकानें खोलने के आरंभ की की टाईमिंग का इंतजार किया जा रहा था। इतना सब होने के बावजूद लगता नहीं है कि सरकारें शराब को लेकर अपना निर्णय बदलेंगीे, फिर भी ना जाने क्यों इस पर देशभर में राजनीति तेज होती जा रही है ? बल्कि कई धार्मिक, सामाजिक और महिला संगठनों, समाज के बुद्धिजीवियों, प्रबुद्ध लोगों, पत्रकारों, मीडिया घरानों ने जोरदार, जमकर मोर्चा खोल दिया है।

देश-राज्य में वैसे भी पहले से ही दिनोंदिन बढ़ती नशाखोरी एवं धुम्रपान के कारण सामाजिक वातावरण विषाक्त है। ऐसे में देशभर की सभी सरकारों को शराबबिक्री या शराबबंदी पर कोई एक निर्णय लेना चाहिए।

छत्तीसगढ़ के कई सामाजिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं मीडिया सहित प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि राज्य में पिछले एक दशक में शराबखोरी की आदत एवं इसकी बिक्री दोगुनी से अधिक हो चुकी है।

चूंकि सरकारों को शराब से हजारों करोड़ रूपये का राजस्व मिलता है, इसलिए सरकारें हर हाल में इसे जारी रखना चाहते हैं। लेकिन इसके कारण आत्महत्या, हिंसा, अपराध, दुष्कर्म और सड़क दुर्घटनाएं सहित असामाजिक कृत्य एवं समाजविरोधी गतिविधियां कितनी होती हैं ? पारिवारिक एवं सामाजिक माहौल कितना खराब हो रहा है ?

कोरोना संकट के दौर में सरकार के शराब बेचने के निर्णय ने सबको हतप्रभ कर दिया है। सरकार का यह निर्णय हैरान और परेशान करने वाला है, जहां सरकार को कोरोना संकट से लड़ना है वहां जनता से लड़ने का माहौल बना दिया है।

सवाल उठता है कि क्या सरकारें सिर्फ राजस्व बढ़ाने या राजस्व घाटे की भरपाई के लिए ही शराब बेचने का निर्णय ले रही हैं ? देश में विभिन्न राज्य सरकारों को उनके कुल राजस्व का लगभग 15 से 30 प्रतिशत राजस्व शराबबिक्री से आता है।

छत्तीसगढ़ के कुल राजस्व प्राप्ति में शराबबिक्री से मात्र 05 प्रतिशत राजस्व का ही योगदान है। ऐसी स्थिति में शराबबिक्री केवल सरकार के राजस्व से जुड़ा मामला एवं मसला नहीं है,अपितु यह सरकार की नीति, नियत पर सवाल खड़ा करती है।

मात्र 5-6 प्रतिशत के राजस्व के लिए राज्य में शराबबंदी नहीं करना विचारणीय है। इससे कई गुना अधिक राजस्व का खर्च तो शराब के कारण होने वाली दुर्घटनाओं, अपराधों एवं अराजकताओं के रोकथाम में हो जाते हैं।

फिर सरकार यह निर्णय करने में इतनी बेबस क्यों दिख्ती है ? आखिर इसका मूल कारण क्या है ? अब जनता को यह सवाल सरकार से पूछनी चाहिए।

दरअसल में शराबबिक्री हर एक व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्कृति और हर एक के जीवन से जुड़ा मामला एवं मसला है, जिसका सीधा और प्रत्यक्ष संबंध केवल एक व्यक्ति या उसके परिवार भर से नहीं होता बल्कि पूरे समाज और राज्य तथा देश से होता है। इसलिए अब इस मसले पर सरकारों एवं जनप्रतिनिधियों को गंभीरता के साथ विमर्श एवं चिंतन करना होगा। उन्हें केवल सरकार एवं राजस्व की चिंता नहीं करनी है, बल्कि समाज, संस्कृति एवं जनसरोकार की चिंता पहले करनी है।

दुर्भाग्य है कि आज भी हमारे सरकार एवं जनप्रतिनिधियों में इस तरह की सोच, समझ एवं विचारधारा अभी तक विकसित नहीं हो सकी है। सरकार और जनप्रतिनिधी इस मसले पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और भूमिका पहले समझें अन्यथा सरकार जायेगी साथ में बचाखुचा सम्मान भी चला जायेगा।

अब इसके लिए सरकार एवं जनप्रतिनिधियों को अपनी मानसिकता और मनोवृत्ति में बदलाव लाने की आवश्यकता है, और यह सिद्ध करने का समय भी कि प्रजामत या जनमत ही राजधर्म है।

यही भारत की संस्कृति है, यही छत्तीसगढ़ की संस्कृति भी है। छत्तीसगढ सरकार राम वनगमन मार्ग पर विकास का एजेंडा स्थगित कर पहले राज्य में शराबबंदी करे तभी छत्तीसगढ को भगवान राम के ननिहाल होने का गौरव मिल सकेगा।

                                                                                                                                                       – डाॅ. लखन चौधरी

(लेखक, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक हैं)

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