सेहत: बीमा कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता कितनी खतरनाक ?

बीमा एक त्वरित समाधान के तौर पर लोगों को विकल्प उपलब्ध करा रहा है।क्या सभी समस्याओं का समाधान ’बीमा’ है?)

आजकल बाजारवाद और विज्ञापनवाद के दौर में लोगों में यह मानसिकता घर करती जा रही है, या लोगों के मन में यह बात बैठाई जा रही है कि सेहत की  समस्या के लिए बीमा योजना लेकर निश्चिन्त रहा जा सकता है। किसी भी तरह की दुर्घटना, आगजनी, चोरी, डकैती, अवर्षा, सूखा, बाढ़ अथवा अन्य कोई भी दूसरी बीमारी या आशंकाओं के लिए बीमा एक त्वरित समाधान के तौर पर लोगों को विकल्प उपलब्ध करा रहा है। लेकिन क्या इन सभी समस्याओं का समाधान ’बीमा’   है?

-डा. लखन चौधरी

कोरोना कालखण्ड से बमुशिकल निकले हैं या निकल रहे हैं। कोरोना की त्रासदियों से निकलने, उबरने का प्रयास कर ही रहे हैं, और उबरने की दिशा में जोर आजमाईस चल ही रही है, इसी बीच सेहत एवं स्वास्थ्य को लेकर लोगों की चिंताएं लगातार बढ़ने लगी हैं। इस समय मौसमी सर्दी-जुकाम, खांसी, दमा-अस्थमा, एलर्जी आदि परेशानियों से लोगबाग त्रस्त हैं।

सर्दी के मौसम में सर्दी गायब है। दिसम्बर-जनवरी महिने में इस तरह का मौसम निश्चित तौर पर चिंता का कारण तो है, पर चिंतन की ओर भी ले जाता है कि आखिरकार इसके पीछे का कारण क्या है ? तापमान सामान्य से चार-पांच डिग्री उपर होना प्रकृति के साथ-साथ इंसानों के लिए भी ठीक नहीं है।

चौंकाने वाली खबर यह है कि छत्तीसगढ़ में पिछले साल के इन्हीं दिनों-महिनों की तुलना में इस बार का न्यूनतम तापमान लगभग दोगुना है, और यही इन सभी परेशानियों का कारण है।

वैसे तो जलवायु एवं मौसम का बदलना जिस तरह प्रकृति की एक आवश्यक प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया है। इसी तरह समय, मौसम के साथ-साथ लोगों की जीवनशैली में बदलाव आना भी प्रकृति का एक अनिवार्य नियम है। इधर पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय बदलाव के कारण प्रकृति के मिजाज में तेजी के साथ बदलाव एवं परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।

इसका सीधा प्रभाव लोगों की जीवनशैली में परिलक्षित हो रहा है, और इसका असर लोगों की सेहत एवं स्वास्थ्य पर स्पष्ट रूप से दिखने लगता है। पिछले कुछ समय से देखने को मिल रहा है कि लोगों की बजट का सबसे बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज में खर्च होने लगा है। इसके कारण जहां एक ओर लोगों के अन्य खर्चों पर इसका असर पड़ रहा है, वहीं इसका सीधा प्रभाव रहन-सहन एवं जीवनशैली पर भी दिखने लगा है।

आजकल सबसे ताज्जुब की बात यह देखने को मिल रही है कि लोग-बाग अपनी हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए बीमा कंपनियों पर आवश्यकता से अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। हर संक्रमण काल में आजकल अस्थमा, डेंगू, मलेरिया, पीलिया, खांसी जैसी खतरनाक वायरल बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगा है। देश में रोजाना दर्जनों लोगों की मौतें हो रहीं हैं।

बार-बार इस तरह की जानलेवा बीमारियों के फैलने से सवाल उठता है कि आखिर इस तरह की घटनाएं लगातार होती क्यों रहती हैं ? इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के लिए क्या सिर्फ मौसमी एवं जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार हैं ? क्या लोगों में व्यक्तिगत सेहत एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता एवं चेतना है ? या इसका अभाव है ? अथवा सेहत एवं स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही एवं अज्ञानता है ? क्या इस तरह की बीमारियों के लिए जीवनशैली में आया बदलाव जिम्मेदार नहीं है ?

जब तक इन तथ्यों की पड़ताल नहीं की जायेगी या नहीं होगी तब तक समस्या के जड़ तक पहुंचना मुश्किल है। आजकल बाजारवाद और विज्ञापनवाद के दौर में लोगों में यह मानसिकता घर करती जा रही है, या लोगों के मन में यह बात बैठाई जा रही है कि किसी भी बीमारी या समस्या के लिए बीमा योजना लेकर निश्चिंत रहा जा सकता है।

किसी भी तरह की दुर्घटना, आगजनी, चोरी, डकैती, अवर्षा, सूखा, बाढ़ अथवा अन्य कोई भी दूसरी बीमारी या आशंकाओं के लिए बीमा एक त्वरित समाधान के तौर पर लोगों को विकल्प उपलब्ध करा रहा है। लेकिन क्या इन सभी समस्याओं का समाधान ’बीमा’ में है ? क्या बीमा पाॅलिसी लेना इनका समाधान है ?

आज यह गंभीरता से सोचने, विचारने एवं चिंतन करने की आवश्यकता है। बीमा की पाॅलिसी लेकर बेपरवाह हो जाना, बीमा के भरोसे रहना समाधान नहीं है। बीमा पर आवश्यकता से अधिक निर्भरता न केवल घातक, खतरनाक है बल्कि जानलेवा भी हो सकती है, क्योंकि बीमा लेने के बाद लोगबाग ऐसे निश्च्ंिात हो जाते हैं जैसे अब उन्होंने अमृत ले लिया है, तथा अब उन्हें कोई चिंता, डर, भय या फिक्र नहीं है। आज इस तरह की मानसिकता एवं प्रवृत्तियों से बचने की जरूरत है।

देश में अब अच्छी सेहत और स्वास्थ्य के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बड़े-बड़े कार्पोरेट्स एवं औद्योगिक घरानों की बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियों पर लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है। निहायत निजी एवं वैयक्तिक सेहत और स्वास्थ्य के लिए लोगों का बीमा कंपनियों की बीमा योजनाओं पर बढ़ती निर्भरता निहायत ही मूर्खतापूर्णं ही कही जा सकती है।

आजकल बीमा कंपनियों का कारोबार खूब फलने-फूलने लगा है। अब तो कोरोना जैसी वैश्विक महामारियों से भी बचने के लिए बीमा कंपनियों ने लोगों को गुमराह करना आरंभ कर दिया है, और बाजार में धड़ल्ले से बीमा पाॅलिसी बिकने लगी है।

दरअसल, व्यक्तियों की अच्छी सेहत और स्वास्थ्य का मसला उस व्यक्ति के निजी आदतों, खान-पान, रहन-सहन और उनकी जीवनशैली पर निर्भर करता है, ना कि बीमा कंपनियों की योजनाओं पर। लेकिन आज लोगों ने यह मान लिया है कि अच्छी सेहत और स्वास्थ्य के लिए बीमा योजनाएं अधिक जरूरी है।

बीमा कंपनियों की स्वास्थ्य बीमा योजनाएं लेने के बाद लोगों को लगता है कि चूंकि अब उनके पास अच्छी से अच्छी बीमा योजना है, इसलिए डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है। खान-पान, रहन-सहन और जीवनशैली की मनमनियों पर कोई रोक-टोक एवं लगाम की जरूरत नहीं है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि बीमारियां रूकने का नाम नहीं ले रही हैं।

अच्छी सेहत और स्वास्थ्य के संबंध में समय-समय पर किये गये शोध निष्कर्षों से भी यह साफ एवं स्पष्ट है कि सेहत एवं स्वास्थ्य का सीधा संबंध व्यक्ति की जीवनशैली से जुड़ी आदतों, साफ-सफाई एवं स्वच्छता से होता है। आज व्यस्ततम जीवनशैली की आपाधापी का बहाना बनाकर लोग सेहत एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से बुरी एवं गलत आदतों को छोड़ना नहीं चाहते हैं, जिसके कारण बहुत ही कम उम्र में तरह-तरह की नई-नई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।

व्यस्ततम कामकाज एवं जीवनशैली का बहाना बनाकर प्रकृति एवं प्राकृतिक जीवनशैली के विपरीत अपनी आदतों को बिगाड़कर ना केवल अपनी सेहत एवं स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि अपनी आमदनी का भारीभरकम हिस्सा खर्च कर इसकी आर्थिक कीमत भी चुका रहे हैं।

याद रहे, अच्छी सेहत और स्वास्थ्य के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने एवं बनाये रखने के लिए बीमा योजनाओं पर निर्भरता बढ़ाना बेहद घातक एवं खतरनाक है। इन पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय अपनी आदतों को सुधारकर जीवनशैली सुधारना अधिक श्रेयस्कर एवं हितकारी है। लोग इस सच्चाई को जितना जल्दी समझ जायेगें उतना ही यह हितकारी रहेगा, अन्यथा स्वास्थ्य की कीमत आर्थिक रूप से भारी पड़ेगी। निष्कर्ष यह है कि कोरोना इत्यादि जानलेवा प्राकृतिक घातक बीमारियों से स्वयं को एवं अपने परिवार को बचाने के लिए बीमा पाॅलिसियों पर निर्भरता के बजाय प्राकृतिक एवं अनुशासित जीवनशैली अपनाने में अधिक बेहतरी है।

(लेखक; अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकर हैं) 

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