पश्चिम बंगाल में अब होबे ‘घर वापसी’ का खेला,सकते में भाजपा

कृष्णमोहन झा की कलम से

वेब डेस्क | हाल में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की प्रचंड विजय के बाद भाजपा अब जब सदन में प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो रही है तब सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने उसे एक और गहरा झटका दे दिया है। चार साल पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कार्यशैली से नाराज़ होकर भाजपा में शामिल हुए मुकुल राय फिर से तृणमूल कांग्रेस के खेमे में लौट गए हैं। 

मुकुल राय को भाजपा में अपनी उपेक्षा की पीड़ा सताने लगी लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि मुकुल राय ने भाजपा से चार साल का रिश्ता तोड़कर अपनी पुरानी पार्टी में लौट जाने का फैसला तब किया जब कि चुनाव के पहले ही भाजपा में शामिल हुए में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी को भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया। पार्टी के इस फैसले के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए मुकुल राय ने शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई भाजपा विधायक दल की बैठक में भाग भी नहीं लिया था। बताया जाता है कि मुकुल राय ने नवनिर्वाचित विधानसभा में विपक्ष का नेता पद पाने की उम्मीद पाल रखी थी। लेकिन भाजपा ने जब शुभेंदु अधिकारी को विपक्ष का नेता बना दिया तो मुकुल राय ने वापस तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने में ही अपनी भलाई देखी।

दरअसल इसके संकेत भी कुछ दिन पूर्व उनके पुत्र शुभ्रांशु राय द्वारा भाजपा को दी गई इस  नसीहत  से मिल चुके थे कि उसे राज्य में  लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत से जनता का भरोसा जीतने वाली ‌ तृणमूल कांग्रेस की आलोचना करने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए।  यहां यह भी उल्लेखनीय है कि  पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित विधान सभा में भाजपा विधायक दल के अध्यक्ष पद के लिए  शुभेंदु अधिकारी का चयन तो एक तात्कालिक कारण है ही लेकिन मुकुल राय अपने पुराने घर में वापसी करने के लिए पिछले एक साल किसी उचित अवसर की तलाश में थे। इसीलिए हाल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी  प्रचार के दौरान वे तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध टिप्पणी करने से भी बचते रहे। मुकुल राय को यह टीस भी सता रही थी कि विगत दिनों जब उनकी पत्नी का अस्पताल में इलाज चल रहा था तब भाजपा के किसी नेता ने उन्हें एक फोन तक नहीं किया जबकि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने स्वयं अस्पताल जाकर उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस तरह लगातार एक के बाद एक कई कारण जुड़ते गए और अंततः मुकुल राय ने अपने पुराने घर लौट जाने का विकल्प चुन लिया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कहते हुए  उन्हें क्षमा भी कर दिया है कि ‘मुकुल घर का लड़का है, घर ही वापस आया है, उसे धमकाकर भाजपा में ले गए थे।’ अब यह सवाल भी उठने लगे हैं कि अगर भाजपा शुभेंदु अधिकारी की जगह उन्हें राज्य विधानसभा में पार्टी विधायक दल के नेता पद से नवाज देती तब भी क्या वे भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में लौट आने का विकल्प चुनना पसंद करते। अभी भी उन्हें यह आशंका तो सता ही रही होगी कि पश्चिम बंगाल में अतीत में हुए सारदा और नारदा घोटाले की सीबीआई जांच की आंच उन्हें फिर परेशान कर सकती है, जो कि चार साल पहले उनके भाजपा में शामिल होने के बाद धीमी पड़ गई थी। कारण चाहे जो भी हो लेकिन मुकुल राय जैसे कद्दावर नेता का वापस तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने का फैसला भाजपा के लिए बड़ा झटका है वह भी तब जबकि  मुकुल राय हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा उम्मीदवार के रूप में  कृष्ण नगर सीट से चुनाव भी जीत चुके थे।

शुभेंदु अधिकारी विधानसभा के अंदर  विपक्ष के नेता के रूप में ममता सरकार के लिए कोई बडी चुनौती पेश करने में कितने सफल होंगे यह तो आने वाले समय ही बताएगा, परंतु अभी तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए उन  नेताओं की मान-मनौव्वल कैसे करें जो पुनः तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

भाजपा ने इन विधानसभा चुनावों में 200 पार का नारा देकर पहली बार राज्य की सत्ता में आने का जो सुनहरा स्वप्न संजोया था उसे साकार कर लेने में अगर पार्टी सफल हो गई होती तो चुनाव के पहले भाजपा में आए तृणमूल कांग्रेस के पुराने नेताओं को किसी पद से नवाज कर संतुष्ट किया जा सकता था परंतु राज्य की सत्ता में तृणमूल कांग्रेस की शानदार वापसी से भाजपा की सारी योजना पर पानी फिर गया। अब पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष भले ही यह दावा करें कि मुकुल राय के वापस तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो जाने से भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ेगा परंतु राजनीतिक पंडितों की राय में मुकुल राय का पुराने घर में लौट जाने का फैसला तृणमूल कांग्रेस की ताकत में इजाफा करेगा। यही कारण है कि ममता बनर्जी ने उन्हें खुशी खुशी क्षमादान दे दिया है। इतना ही नहीं अभी से यह संभावनाएं  भी व्यक्त की जाने लगी हैं कि ममता बनर्जी उन्हें तृणमूल कांग्रेस की टिकट पर राज्य सभा भी भेज सकती हैं।

अब भाजपा की चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि मुकुल राय ने फिर से तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया बल्कि उसे अब यह आशंका सताने लगी है कि विधानसभा चुनाव के पहले तृणमूल कांग्रेस के जिन नेताओं को भाजपा में शामिल होने के लिए राजी कर लिया था उनमें से कई नेताओं के मन में मुकुल राय का अनुकरण करने का विचार आ सकता है। गौरतलब है कि मुकुल राय से  पहले राज्य की एक पूर्व विधायक सोनाली घोष भी भाजपा छोड़ कर वापस तृणमूल कांग्रेस में आने के लिए ममता दीदी से माफी मांग चुकी हैं। वे तो यहां तक कह चुकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के बाद उनकी हालत जल बिन मछली जैसी हो गई है। ममता बनर्जी के इस बयान ने  भी भाजपा की बेचैनी बढ़ा दी है कि  राज्य में भाजपा के कम से कम 35 नवनिर्वाचित विधायक  उनके संपर्क में हैं और तृणमूल कांग्रेस में लौटने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। विधानसभा चुनावों के पहले तृणमूल कांग्रेस के लगभग इतने ही तत्कालीन विधायकों को भाजपा अपने खेमे में लाने में सफल हो गई थी। इतना तो तय माना जाना चाहिए कि अगर इन विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में भाजपा सत्ता में आने में सफल हो गई होती तो उसके उन विधायकों का पार्टी से मोहभंग नहीं हुआ होता जो अपने पुराने घर तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने के लिए छटपटा रहे हैं। भाजपा के सामने धर्म संकट यह है कि  वह इस दल-बदल के लिए ममता बनर्जी की आलोचना करने का साहस  भी नहीं जुटा पा रही है क्योंकि इस खेल की शुरुआत उसी ने की थी।

दरअसल उसे तो अब चिंता सताने लगी है कि क्या तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में वह 2019 जैसी ऐतिहासिक सफलता अर्जित करने में सफल हो पाएगी जब उसने राज्य की 42 में से 18 लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लिया था जबकि2014के लोकसभा चुनावों में 34 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस मात्र  22 सीटें जीत पाई थी। दरअसल 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 18 सीटों पर अपनी विजय से उत्साहित भाजपा को यह भरोसा हो गया था कि वह 2021में होने वाले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में सफल हो जाएगी परंतु चुनाव परिणामों की घोषणा ने उसे स्तब्ध कर दिया।2019 के लोकसभा चुनावों में जिन 18 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी उसके अंतर्गत आने वाली 124 सीटों पर इस बार तृणमूल कांग्रेस ने बाजी पलट दी इसीलिए भाजपा के अनेक नवनिर्वाचित  विधायक समय रहते भूल सुधार कर लेने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं। राज्य में चुनाव बाद भड़की हिंसा से भी क ई स्थानों पर  कार्यकर्ताओं में डर का माहौल बना हुआ है।  पार्टी कार्यकर्ता चाहते हैं कि भाजपा के जो दिग्गज नेता राज्य में चुनाव प्रचार के लिए यहां आए थे उन्हें  इस वक्त भी उनका मनोबल बनाए रखने के लिए प्रदेश में ही अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहना चाहिए।  विधानसभा चुनावों में भाजपा का सुनहरा स्वप्न बिखर जाने से हताश भाजपा के निष्ठावान नेता अब यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रचार अभियान में दूसरे प्रदेशों के नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपना पार्टी को भारी पड़ गया । ममता बनर्जी ने इन चुनावों को स्थानीय बनाम बाहरी का रूप देकर मां माटी और मानुष के नारे  को और प्रभावी बना दिया ।

बहरहाल ममता बनर्जी लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाल चुकी हैं । अब  वे भी वही खेेेेल रही हैं जो भाजपा ने चुनावों के पहले खेेला था। ममता बनर्जी का यह नया खेला भाजपा को हक्का बक्का होकर मूकदर्शक बने रहने के लिए  विवश कर रहा है । भाजपा को शायद यह उम्मीद रही होगी कि कर्नाटक और मध्यप्रदेश में उसने जिस रणनीति से  सत्ता में आने में सफलता हासिल की थी उसमें  हो वही रणनीति उसे पश्चिम बंगाल में भी सत्ता की दहलीज तक पहुंचा देगी परंतु शायद उसे यह अंदेशा नहीं रहा होगा पश्चिम बंगाल का हवा पानी दूसरे प्रदेशों से अलग है। बहरहाल, पश्चिम बंगाल में ममता  दीदी  ने चुनावों के बाद जो नया खेला शुरू किया है उसमें भी उनकी जीत तय दिखाई दे रही है । इस सबके बीच  किसी भी राजनीतिक दल को  यह सवाल विचलित नहीं करता कि क्या हमारे देश में सिद्धांतों और मूल्यों की राजनीति के दिन लद चुके हैं।

(लेखक,  कृष्णमोहन झा वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनितिक विश्लेषक हैं)

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