बिहार विधानसभा चुनाव के मायने, जीत और उठते सवाल दर सवाल

आरजेडी की भीड़ का वोट में तब्दील नहीं हो पाने के पीछे का गणित क्या है ?

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब आने वाले पांच वर्षों 2025 तक बिहार सरकार की बागडोर या कमान किसके एवं किनके हाथों रहेगी यह तय हो चुका है, लेकिन यह चुनाव अपने पीछे दर्जनों प्रकार का, बल्कि सैकड़ों तरह का सवाल छोड़ गया है।
-डाॅ. लखन चौधरी
बिहार चुनाव में इस बार जो प्रमुख बातें उभरकर सामने आई हैं उसमें पहला तो यह कि बिहार में भाजपा की पिछले बार के मुकाबले बड़ी जीत के पीछे क्या वजहें हैं ? कौन सा फेक्टर भाजपा के लिए काम कर गया ? दूसरा इस बार के चुनाव में वामदलों का प्रदर्शन उत्साहजनक है, तो इसके पीछे का माजरा क्या है ? तीसरी बड़ी बात जो कि पहली बड़ी बात हो सकती है, यह है कि चुनाव रैलियों में आरजेडी की भीड़ का वोट में तब्दील नहीं हो पाने के पीछे का गणित क्या है ?
क्या इस बिहार विधानसभा चुनाव से तय हो गया है कि अब बिहार में पांच साल तक एनडीए की सरकार रहेगी ? क्या नीतिश कुमार पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे ? क्या नीतिश कुमार एनडीए में बने रहेंगे ? भाजपा, नीतिश कुमार को कब तक मुख्यमंत्री बनाये रखेगी ? आने वाले समय में जब भाजपा नीतिश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल करने लगेगी, क्या तब भी नीतिश कुमार एनडीए में बने रहेंगे ?
जेडीयू से बड़ी जीत के बाद क्या भाजपा के लोग नीतिश कुमार को स्वीकार करेंगे ? कब तक करेंगे ? क्यों करेंगे ? क्यों करना चाहिए ? कब तक करना चाहिए ? क्या अब बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए ? जब बिहार के मतदाताओं ने भाजपा पर इतना बड़ा विश्वास जताया है तो नेतृत्व भी भाजपा को क्यों नहीं मिलना चाहिए ? क्या यह जनादेश का उल्लंघन नही होगा ?
दूसरी तरफ महागठबंधन क्या इस चुनाव परिणाम को आसानी से स्वीकार कर लेगी ? जैसा कि सुनने को आ रहा है कि तेजस्वी ने आंदोलन की बात कही है। क्या अब बिहार में जोड़-तोड़ नहीं होंगे ? क्या आरजेडी इस चुनाव परिणाम को लेकर चुपचाप बैठ जायेगी ? क्या आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में व्यापक बदलाव एवं परिवर्तन की उम्मीद बंधती है ?
क्या इस चुनाव में जैसा कि कहा जा रहा है कि ओवैसी, मायावती एवं चिराग ने भाजपा को बड़ी बढ़त या जीत दिलाई है ? कई लोगों का कहना है कि कांग्रेस से गठबंधन की वजह से उत्तरप्रदेश की तरह आरजेडी को नुकसान उठाना पड़ा है ? क्या इस चुनाव में वास्तव में ओवैसी, मायावती एवं चिराग वोटकटवा पार्टी साबित हुए हैं ? और आने चुनावों में इसी तरह अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचाते रहेंगे ?
क्या इस चुनाव से यह साफ हो गया है कि भाजपा का जनाधार एवं उसकी नीतियों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों की लोकप्रियता पहले की तरह अभी भी बरकरार है ?  क्या वास्तव में बिहार की महिला मतदाताओं ने भाजपा को बड़ी बढ़त एवं जीत दिलाई है ? क्या तेजस्वी को अपने परिवार के कारण इस चुनाव में सीटें कम मिली हैं ? क्या परिवारवाद के कारण तेजस्वी को हार का सामना करना पड़ा है ? क्या तेजस्वी के प्रचार में जो जनसैलाब उमड़़ा था, वह एक तरह का भ्रम था ?
आखिर यह जनसैलाब वोट में तब्दील क्यों, कैसे नहीं हो सका ? रैलियों की भीड़ वोट में बदल क्यों नहीं सकी ? इस चुनाव में तेजस्वी ने देश के बौद्धिक एवं आम जनमानस दोनों का जिस तरह ध्यान आकर्षित किया है, क्या वास्तव में यह तेजस्वी की छवि बदलने में मददगार होगा ? क्या तेजस्वी आने वाले वक्त में अपने पिता के जंगलराज के दाग को धो पायेंगे ?
राजनीति में जब चुनावी मुद्दों की बात करते हैं तो महत्वपूर्णं बात सामने आती है कि क्या इस चुनाव में भाजपा ने कोई वाजिब चुनावी मुद्दा उठाया था, जिससे उसे अधिक वोट एवं सीटें मिलीं ? क्या केवल एंटी इनकमबैंसी ही जेडीयू की सीटें कम होने के लिए जिम्मेदार है ? क्या तेजस्वी या आरजेडी ने इस चुनाव में कोई वाजिब चुनावी मुद्दा उठाया था ?
वामदलों के बेहतर प्रदर्शन के पीछे कौन से कारण हैं ? क्या देश में वामदलों के पुर्नउद्धार का समय आ रहा है ? क्या बिहार की मतदाताओं ने इस चुनाव में लोकतांत्रिक जागरूकता का परिचय दिया है ? क्या बिहार की मतदाताओं से देश जैसा उम्मीद कर रहा था, इस चुनाव में वह हुआ है ? फिर कौन से कारण रहे हैं जिनके दम, बल पर एनडीए को सत्ता वापस मिली है ?
लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का मजबूत होना कितना महत्वपूर्णं हेाता है ? क्या देश में विपक्ष को जानबूझकर खत्म किया जा रहा है ? क्या यह लक्षण लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत नहीं है ? मोदी की राजनीति क्या उनकी व्यक्तिगत छवि के कारण लगातार सफल होती जा रही है ? या मोदी कूटनीतिक रणनीति बनाकर विपक्ष या विरोधी दलों को घेरने में माहिर हैं ? जिनके कारण उनकी जीत सुनिश्चित बनती जा रही है ?
क्या देश में इस समय मोदी की लोकप्रियता के पीछे उनका काम है ? या देश के बहुसंख्यक जनमानस का विश्वास है ? क्या मोदी ने लोकतंत्र के सबसे आवश्यक आधार स्तंभ ’विपक्ष’ को जानबूझकर खत्म करते हुए राजनीति करने एवं सत्ता पर बने रहने के अनैतिक रास्ते का चुनाव नहीं किया है ? 
क्या बिहार चुनाव में वोट, विकास के नाम पर पड़े हैं ? बिहार चुनाव के बाद एकाएक चीन सीमा विवाद का निपटारा क्या स्वाभाविक है ? बिहार चुनाव के चार-छह महिने पहले चीन सीमा विवाद का मसला जिस तरह से लाया गया था क्या यह वास्तविक था ? कोरोनाकाल में बिहार में जिस तरह से दिहाड़ी प्रवासी मजदूरों का पलायन एक राष्ट्रीय समस्या एवं चिंता बनकर उभरी थी, वह मुद्दा कहां गायब हो गया ?
कोरोना कालखंड में नीतिश कुमार का गैर-जिम्मेदाराना नेतृत्व जिस तरह से चर्चा में आया था, क्या वह मसला इस चुनाव में सही ढ़ंग से सामने आ पाया ? क्या इस समय बिहार सहित पूरे देश में बेरोजगारी का मसला युवाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या नहीं है ? फिर भी इस चुनाव में वोट, इस मुद्दे के लिए क्यों नहीं पड़े ?
आज देश में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आज भी देश में वोट, विकास के लिए नहीं बल्कि जांत-पांत, धर्म-संप्रदाय, मंदिर-मस्जिद के नाम पर पड़ते हैं, पड़ रहे हैं; तो फिर विकास, रोजगार, पलायन चुनाव का मुद्दा क्यों होगा ? या ये मसले क्यों मायने रखेंगे ? जब देश में राजनीति रोजी-रोटी, रोजगार-आजीविका, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे बुनियादि मसलों के लिए न होकर गैर-जरूरी मसलों के लिए होंगे, जिनसे वोट मिलते हों तो विकास क्यों होगा ? जब देश में आज भी जीवन के आवश्यक बुनियादि मसलें चुनाव या राजनीति का असली एजेंडा या मुद्दा नहीं बन पा रही हैं तो फिर विकास की बात क्यों हो ? क्यों की जानी चाहिए ?
जब वोट केवल भावनात्मक मुद्दों पर पड़ते हैं तो चुनाव का एजेंडा विकास, प्रगति, तरक्की, रोजगार, जीवन स्तर में सुधार क्यों हो ? जब देश में बेकारी, बेरोजगारी, असमानता जैसे ज्वलंत मसलों से जनमानस को कोई फर्क नहीं पड़ता है तो फिर देश में चुनाव की जरूरत ही क्यों है ? जब देश में एक ही तरह की राजनीति; केवल चुनाव जीतने की होनी, करनी है तो फिर लोकतंत्र में विपक्ष की जरूरत ही क्यों है ? बिहार चुनाव के बहाने विमर्श की दरकार बनती है।
(लेखक; अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं) 
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