नई शिक्षा नीति 2020 : रिफार्म कम, शिगूफा अधिक

स्वशासी के नाम पर उच्च शिक्षण संस्थानों का निजीकरण एवं बाजारीकरण बढ़ेगा

-डाॅ. लखन चौधरी
इस समय देश की शिक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव, परिवर्तन और बड़ी सुधार की आवश्यकता है, जिसे आजकल ’रिफार्म’ कहा जाता है। ऐसा बदलाव, परिवर्तन एवं सुधार जिससे पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था बदल जाये। सबसे पहली जरूरत इस समय देश को रोजगारपरक व्यावहारिक एवं व्यावसायिक शिक्षा की जरूरत है, जिससे देश के करोड़ों बेरोजगार नौजवानों को नौकरी, कैरियर में बेहतर अवसर और साथ में स्वरोजगार दे सके।

इस समय दूसरी बड़ी जरूरत ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है जिसमें ऐसी गुणात्मकता हो जो दुनिया के साथ कदमताल मिलाकर चलने का आधार, माद्दा एवं साहस पैदा कर सके। तीसरी सबसे प्रमुख बात इस समय देश को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जिससे ज्ञानार्जन, विद्यार्जन की मूल भावना बनी रही। जो इंसान की इंसानियत को खत्म होने से रोके, बचाए, और इस समय देश को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जिसमें देश के विशाल जन सैलाब (मानव) को संसाधन के रूप में तब्दील करते हुए एक ऐसे ’मानव संसाधन’ का निर्माण कर सके, जिससे हमारी जनसंख्या समस्या, दायित्व न होकर संपत्ति, संसाधन बन जाए।

लगभग साढ़े तीन दशक के लंबे अंतराल, 34 वर्ष के बाद निश्चित तौर पर आज देश की शिक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव एवं सुधार की आवश्यकता अनिवार्य है। पाठ्यक्रमों, पढ़ाने के तौर-तरीकों के साथ शिक्षकों की सोच, विचारधारा, मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है।

शिक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था में आधुनिक टेक्नोलाॅजी के भरपूर उपयोग को समाहित करते हुए हमें अपनी योग्यता, दक्षता एवं कार्यकुशलता को प्रदर्शित करने का समय है। लेकिन इसके नाम पर केवल नई शिक्षा नीति ले आने से कुछ होने वाला नहीं है। विभाग का नाम ’मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ से बदलकर केवल ’शिक्षा विभाग’ कर देने से कुछ बदलने वाला नहीं है। दुर्भाग्य से सरकार इसे ही बदलाव, परिवर्तन, सुधार और रिफार्म मान रही है।

नई शिक्षा नीति 2020, जो अभी लागू नहीं हुआ है और 2023 के पहले इसके लागू होने की संभावना भी बहुत कम है, में नाम बदलने के अतिरिक्त ठोस, नया, सार्थक कुछ भी नहीं है, जिससे देश के करोड़ों विद्यार्थियों का कोई भला हो सके, अपितु इस नीति की सबसे बड़ी खामी यह है कि सरकार देश की 138 करोड़ जनता (मानव) को ’संसाधन’ ही नहीं मान रही है। जबकि सरकार देश की इस विशाल जनसंख्या को संसाधन के रूप में तब्दील करते हुए सामाजिक एवं आर्थिक विकास, प्रगति, उन्नति एवं संवृद्धि के शिखर पर पहुंचा कर भारत को दुनिया का सिरमौर बना सकता है।

चीन ने यही किया है। चीन ने अपनी विशाल जनसंख्या को संसाधन, संपत्ति, संपदा, अवसर (Assets) के रूप में उपयोग करते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगधंधे एवं कारोबार (MSME) यानि उद्यमशीलता का ऐसा साम्राज्य खड़ा किया है कि आज पूरी दुनिया उसका मुकाबला करने में नाकाम साबित हो रही है। चीन की इसी समझदारी का नतीजा है कि आज चीन दुनिया को पूरी तरह अपने आर्थिक कब्जे में ले रखा है। अमेरिका के लाख विरोध एवं प्रयास के बावजूद यूरोप एवं अमेरिका मिलकर भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।

 

चीन ने अपनी विशाल आबादी को दायित्व, जिम्मेदारी, आर्थिक दायित्व एवं जिम्मेदारी (Liability) बनने से न केवल बचाया, रोका अपितु इस विशाल आबादी को संसाधन, संपत्ति, परिसंपत्तियां (Assets) के रूप में तब्दील कर लिया है, और दुनिया को ललकार रहा है। कोरोना वायरस को पूरी दुनिया में फैलाने को लेकर अमेरिका सहित पूरी दुनिया कसमसाकर रह जा रही हैं, लेकिन चीन का कोई बालबांका नहीं कर पा रहा है।

भारत अपनी विशाल आबादी को संसाधन, संपत्ति, संपदा के तौर पर इस्तेमाल या उपयोग क्यों नहीं कर सकता, जबकि भारत में चीन के मुकाबले अधिक संभावनाएं हैं ? नई शिक्षा नीति में उन्हीं पुरानी चीजों, व्यवस्थाओं, नीतियों को तोड़मरोड़ कर, आगेपीछे कर फिर से लये रंगरूप में नये नामकरण के साथ, नये मंत्रालय के साथ पेश किया जा रहा है। क्या इससे व्यवस्था में अपेक्षित, प्रभावकारी सुधार एवं परिणाम आ जायेंगे या आ पायेंगे ?

5+3+3+4 इसमें नया क्या है ? आज तीन वर्ष में बच्चा स्कूल में भर्ती हो ही रहा है। 5वीं एवं 8वीं की परीक्षाएं कई वर्षों से लगभग खत्म ही हैं, 10वीं, 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं इसमें भी यथावत हैं। 18 वर्ष में स्कूली शिक्षा पूरी हो ही रही है। चार वर्षीय स्नातक कोर्स बीएड, स्नातक आनर्स आदि केन्द्रीय संस्थानों में चल ही रहे हैं। एमफिल को लेकर बंद होने की बातें कई वर्षों से चल रही है। बिना एमफिल के पी-एचडी करने की व्यवस्था पहले से ही है। फिर नया है ?

कहा जा रहा है कि इस नीति के लागू होने के बाद देश की 3000 से कम विद्यार्थियों एवं नामांकन वाली हजारों संस्थाओं का मर्जर कर दिया जायेगा। शहरों के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के लिए मातृभाषा फार्मूला अनिवार्य नहीं होगी। बल्कि, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नैक आदि कई नियामक संस्थाओं को बंद करने जैसी व्यवस्थाओं से सरकारी नियंत्रण में कमी आनी तय है। संस्थाओं की मान्यता, ग्रेडेशन, रैंकिग जैसी चीजें केवल आनलाइन पेपरवर्क के द्वारा ही हो जायेंगी। क्या इससे खपलेबाजी एवं गोलमाल नहीं बढ़ेगा?

विश्वविद्यालयों को ग्रेडिंग के आधार बांटने से ग्रामीण क्षेत्रों के राज्यों के विद्यार्थियों के साथ अन्याय होना तय है। ग्रेडिंग एवं स्वशासी दर्जा का आधार वित्तीय स्वायत्तता नहीं अपितु सेल्फ फायनेंसिग सिस्टम होने शिक्षा और महंगी होगी, और शिक्षा का नीजिकरण एवं बाजारीकरण बढ़ेगा। साफ है कि स्वशासी के नाम पर उच्च शिक्षण संस्थानों का निजीकरण एवं बाजारीकरण बढ़ेगा, जहां ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाएं दम तोड़ देंगी।

फिर अच्छा क्या है ? इतना सब होने के बाद शिक्षा की गुणवत्ता की देखरेख की जिम्मेदारी राज्यों की होगी, मतलब वही ढाक के तीन पात। राज्जीय शिक्षा बोर्डों, विश्वविद्यालयों की स्थिति पहले से ही बदतर है। शिक्षा पर खर्च में जीडीपी के मात्र डेढ़ फीसदी की वृद्धि की गई है, जबकि इतनी बड़ी आबादी के लिए इस समय जीडीपी की कम से कम 10 प्रतिशत राशि खर्च करने की जरूरत है। लगता है सरकार का इरादा इस समय कोरोना से लड़ने और देश की स्वास्थ्य सेवाओं एवं सुविधाओं, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को दुरूस्त करने के बजाय उससे जनमानस का ध्यान हटाने के लिए नई-नई शिगूफाएं छोड़ने में अधिक है।

नोटबंदी से कालाधन निकलने या निकालने और योजना आयोग का नाम बदल कर नीति आयोग करके विकास, प्रगति, उन्नति एवं तरक्की की नई इबारत गढ़ने जैसे मंसूबों की हवा निकलने के बाद, नई शिक्षा नीति 2020 खोदी पहाड़ निकली चूहिया साबित न हो जाए। नई शिक्षा नीति देश के करोड़ों विद्यार्थियों के लिए कहीं मात्र झूनझूना न बन जाए, इसलिए इसे लागू करने के पहले इस पर गंभीर और व्यापक विमर्श की दरकार है।

(लेखक; हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग, छत्तीसगढ़ में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं) 

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