ऑनलाइन पढ़ाई-परीक्षाएं, दो तिहाई वंचित विद्यार्थी चिंतित, तनाव में

-डा. लखन चौधरी

छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश का बमुश्किल एक-तिहाई विद्यार्थी वर्ग इस समय कोविड-19 संकट के कारण घर से ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन पद्धति का लाभ ले पा रहा है, और देश का दो-तिहाई विद्यार्थी समुदाय इस सुविधा एवं व्यवस्था से वंचित अपने कैरियर की बर्बादी की आशंका से चिंतित और तनाव में है।

आधुनिक, विकसित भारत का यह स्याह पक्ष शिक्षा एवं ज्ञानार्जन की पद्धति एवं व्यवस्था की असमानता एवं विषमता को और धार देकर बढ़ाने का काम कर रहा है। क्या यह विडम्बना नहीं कि इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में हमारी सरकारें देश के सभी विद्यार्थियों को आजादी के सात दशक बाद भी एक समान शिक्षा उपलब्ध कराने में नाकाम हैं, असफल हो रही हैं ? एक समान शिक्षा पद्धति लागू करने में विफल रही हैं ?

क्या यह मात्र सरकारों की विफलता है ? क्या यह महज हमारे सिस्टम या व्यवस्था की विफलता है ? या क्या यह हमारी लोकतंत्र की असफलता है ? क्या यह हमारे जनप्रतिनिधियों की नाकामी एवं उदासीनता नहीं है ? जिन्हें हम अपना प्रतिनिधि बनाकर हमारा प्रतिनिधितत्व करने के लिए भेजते हैं, परंतु वे हमारे मसलों एवं समस्याओं को न कभी समझते हैं, न कभी उठाते हैं, न कभी उठाना चाहते हैं, इसके बावजूद हम उन्हें लगातार बगैर कोई सवाल-जवाब किए भेजते ही रहते हैं। शायद यह हमारी ही अव्यवस्था, असफलता, नाकामी या खामी है ? जिस पर हम सोचना भी नहीं चाहते हैं।

स्कूलों से लेकर महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों तक सभी शिक्षण संस्थाएं आनलाइन अध्ययन-अध्यापन एवं परीक्षाओं के संचालन में लगे हुए हैं। निजी एवं सरकारी सभी अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने ढ़ंग से इस आनलाइन व्यवस्था को अंजाम दे रहे हैं, मगर देशभर के दो-तिहाई से अधिक विद्यार्थियों के लिए यह व्यवस्था एक तरह से अभिशाप बन रही है। अध्ययन-अध्यापन एवं परीक्षा का यह तरीका देश के करोड़ों गरीब, निर्धन, ग्रामीण, कस्बाई और मध्यमवर्गीय परिवारों के विद्यार्थियों के लिए महंगी कोचिंग शिक्षा की तरह श्राप साबित हो रहा है। दुर्भाग्य एवं चिंता की बात यह है कि बाकायदा सरकारों के सलाह, सुझाव एवं परामर्श पर यह काम हो रहा है, और हमारे पालक, जनप्रतिनिधि चुपचाप तमाशा देख रहे हैं।

ग्रामीण, कस्बाई, शहरी, नगरीय एवं महानगरीय सभी जगह ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन धड़ल्ले से जारी है। अब यह व्यवस्था व्यवसाय एवं कारोबार का शक्ल अख्तियार कर चुका है। बहुत बड़ा व्यवसाय एवं कारोबार, जहां रोज करोड़ों का वारा-न्यारा हो रहा है। महंगे कोचिंग संस्थानों की तरह ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन सेंटर खुल रहे, खुल गये एवं बड़े पैमाने पर खोले जा रहे हैं, और फीस की मोटी रकम वसूल की जा रही है। डाटा का खेल अलग चल रहा है। नेटवर्क कंपनियां लगातार डाटा वाउचर की स्कीम, वेलिडीटी बदल रही हैं। कुल मिलाकर ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन अब व्यवसाय एवं कारोबार के रूप में बड़े पैमाने पर संचालित होने लगा है।

चूंकि कोरोना वायरस के संक्रमण का प्रकोप लगातार द्रुत गति से बढ़ता जा रहा है, इसलिए स्कूल-काॅलेजों को खोलने की हिम्मत जुटा पाना असंभव होता जा रहा है, अंततः ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन सेंटर्स का ही सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन इस सुविधा का लाभ सभी वर्ग के विद्यार्थियों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। मुश्किल से देश के एक-तिहाई विद्यार्थियों को इस सुविधा का लाभ मिल पा रहा है। शहरों में यह आंकड़ा कुछ अधिक हो सकता है, लेकिन फिर भी 40-45 प्रतिशत से अधिक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह बहुत ही कम 7-10 प्रतिशत से भी नीचे बैठता है, जबकि देश की बहुसंख्यक दो-तिहाई से अधिक आबादी आज भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत है।

वायरस संक्रमण के बहुत तेजी से बढ़ने के कारण शिक्षण संस्थाएं नहीं खुल पा रही हैं, जिसके चलते सभी शिक्षण संस्थानों के बंद रहने के कारण माता-पिता एवं पालकगण चिंतित हैं। जिनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं वे भी और जिनके पास यह सुविधा नहीं होने के कारण वंचित हैं वे भी। ऑनलाइन पढ़ने वाले बच्चों की अलग तरह की समस्याएं आ रही हैं, इनकी दिनचर्या पूरी तरह बदल गई है। ये बच्चे गैजेट एडिक्ट, जिद्दी एवं जीवन के प्रति बेपरवाह हो रहे हैं। जो बच्चे ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन से दूर हैं, उनके पालक परेशान हैं।

कई पालकों की तो यह शिकायत भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह की सुविधाओं के अभाव एवं कोरोना संक्रमण के कारण घर से बाहर निकलने की मनाही के चलते बच्चे दिनभर घर में रहकर बिगड़ने लगे हैं। दिनचर्या पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है, और पढ़ाई-लिखाई तो दूर की बात बच्चों का सामान्य व्यक्तित्व का जो विकास होना चाहिए वह भी बाधित हो रहा है, नहीं हो पा रहा है। समय प्रबंधन, व्यवस्थित दिनचर्या, बातचीत का ढ़ंग जैसी सामान्य व्यक्तित्व विकास की बातों से भी बच्चों को वंचित होना पड़ रहा है।

क्या यह कोरोना कालखण्ड का अभिशाप है, जो अधिकांशतः गरीब, ग्रामीण, कस्बाई एवं मध्यमवर्गीय परिवार, समाज एवं समुदाय के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है ? इधर सरकारें कोरोना कालखण्ड को भी अवसर के रूप में भुनाने में लगीं हैं। कोरोना को लेकर भी आम जनमानस का ध्रवीकरण लगातार जारी है। दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे राजनीतिक दलों एवं सरकारों को देश के दो-तिहाई बच्चों के कैरियर, भविष्य एवं जीवन को लेकर कोई गंभीर चिंता नहीं है। अध्ययन-अध्यापन को लेकर सरकारें केवल खाना-पूर्ति में लगीं हैं। ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन के नाम पर आडियो-विडियो लेक्चर, स्टडी मेटेरियल इत्यादि सामग्रियों की व्यवस्था कर सरकारें अपने कर्तव्य से छुटकारा नहीं पा सकती हैं। ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन की इन सुविधाओं का जो विद्यार्थी उपयोग नहीं कर सकते, जिनके पास इनके उपयोग करने के साधन सुविधाएं नहीं हैं या जो इन साधन-सुविधाओं को अफोर्ड नहीं कर सकते हैं, उनके बारे में सरकारों के पास कोई योजना नहीं है।

छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, झारखण्ड सहित देश के कई राज्यों के अंदरूनी इलाकों से खबरें आ रही हैं कि बच्चों के लिए स्मार्ट मोबाइल फोन लेने, खरीदने हेतु पालकों एवं अभिभावकों को अपने जानवर, गाय, बकरियां तक बेचनी पड़ रही हैं। जिन गरीब पालकों के पास खेती करने के लिए पैसे नहीं हैं, वे यदि इस तरह करने लगे तो स्थितियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन यदि पालक ऑनलाइन पढ़ाई के साधनों की व्यवस्था नहीं करते हैं, तो उनके बच्चे इससे वंचित हो जायेंगे, यह भी एक भय है। यह डर भी उन्हें सताने लगा है, ओर बच्चों की जिद भी तो रहती ही है।

कुल मिलाकर पालक विवश, मजबूर हैं, और सरकारें निश्चिंत। इसका फायदा मोबाइल कंपनियां, नेटवर्क कंपनियां, ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन संटर्स चलाने वाले उठा रहे हैं। ऑनलाइन लर्निंग एवं एजुकेशन के लिए नये-नये सेंटर्स, पार्लर्स खुलने लगें हैं। अब महानगरों में कोचिंग संस्थानों के इतर पढ़ाई-लिखाई के लिए ब्यूटी पार्लर, स्पा सेंटर्स के तर्ज पर नालेज सेंटर्स, नालेज स्पा पार्लर्स जैसी धारणाएं विकसित होने लगी हैं, जो कि शिक्षा के लिए दुर्भाग्यपूर्णं स्थिति का आगाज है।

कोरोना संकट के बारे में जिस तरह की खबरें आ रही हैं, इससे तो लगता है आने वाले कई महीनों तक यह संकट समाप्त होने वाला नहीं है। तक क्या ऐसी स्थिति में शिक्षण संस्थाएं इसी तरह बंद रहेंगी या चलेंगी ? या इसी तरह चलायी जायेंगी ? क्या इसी तरह विद्या, शिक्षा, ज्ञान, सीख, समझ, हुनर, दक्षता, निपुणता, व्यक्तित्व विकास का पाठ पढ़ाया जायेगा ? दरअसल में स्कूल-कालेज, विद्यालय-महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाएं केवल विद्या, ज्ञान या शिक्षा का ही केन्द्र नहीं होते हैं, अपितु यही वह संस्थान, जगह या स्रोत होते हैं जहां बच्चों एवं विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का विकास होता है। जहां उनके समग्र दिनचर्या, जीवनचर्या का विकास होता है। जहां इनके संपूर्णं व्यक्तित्व, कृतित्व का विकास होता है। ऐसे में इनको इससे वंचित होना पड़ रहा है, तो इसकी भरपाई कहां से, कैसे हो पायेगी या कैसे की जायेगी ? यह सबसे महत्वपूर्णं सवाल है।

(लेखक; हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग, छत्तीसगढ़ में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)

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