सकारात्मक सोच की मुहिम और टीका उत्सव से लेकर सेवा सप्ताह तक की पटकथा

सुशील आनंद शुक्ला की कलम से

वेब डेस्क | कोरोना के दूसरे लहर के भीषण प्रकोप के गलगभग एक पखवाड़े बाद भाजपा और संघ के बौद्धिक रणनीतिकारों ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमो के पटल पर एक  मुहिम की शुरुआत की जिसका नाम दिया सकारात्म सोच ।निश्चित तौर पर सकारात्मकता अच्छी चीज है,जीवन मे बेहतर करने के लिए सकारात्मक होना और परिस्थितियों के बारे में आशावादी दृष्टिकोण जरूरी है।देश मे महामारी के वर्तमान  संकट के समय  सकारात्मक सोच को जिस दृष्टिकोण में प्रस्तुत किया जा रहा उस नीयत पर सवाल खड़ा हो रहा है। 

जब किसी के परिजन की कोरोना से दवा और इलाज न मिलने के कारण मौत हुई हो ।जब किसी को अपने माँ बाप भाई बहन पुत्र को ले कर अस्पताल दर अस्पताल बेड के लिए भटकने के बाद भी बेड न मिला हो और आंखों के सामने बिना इलाज के तड़फते हुए परिजन की मौत का मंजर हो तब उससे आशावादी दृष्टिकोण की बात करना न सिर्फ बेमानी है ,अमानवीय भी है। सकारात्मक सोच की मुहिम चलाने वाले यही कर रहे हैं।जब देश के आधा दर्जन राज्यो में ऑक्सीजन की कमी हो ।राजधानी दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए हाईकोर्ट को लगातार केंद्र के अधिकारियों को फटकार लगानी पड़ी हो ।जब बत्रा हॉस्पिटल जैसे प्रख्यात चिकित्सा संस्थान के निदेशक यह कहे कि उनके पास सिर्फ दो घण्टे की ऑक्सीजन बची है।जब गंगा में अनगिनित शव बहाने की मजबूरिया हो  उस समय  सकारात्मकता की विचार गोष्ठियां जले पर नमक छिड़कने से ज्यादा भीभत्स और क्रूर लग रही थी।

प्रधानमंत्री ने  घोषणा किया 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिको को टीका लगाया जाएगा ।इस घोषणा के पहले किसी भी प्रकार का होमवर्क नही किया किया गया ।इतने बड़े पैमाने पर टीके कहा से आएंगे ? देश मे टीको की कुल उत्पादन क्षमता कितनी है ?टीकाकरण  के लिए आतुर सभी लोगो के लिए वैक्सीन कैसे और कब मिलेगा कोई कार्य योजना नही । इन सारे सवालों के बीच वेक्सिनेशन की घोषणा के साथ मोदी जी ने टीका उत्सव मनाने की घोषणा भी कर दी ।प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार भाजपाई देश भर मे नाच गा कर टीका उत्सव मनाने लगे लेकिन यह उत्सव भी औपचारिकता मात्र बन कर रह गया क्योंकि वैक्सीन के अभाव में देश के अधिकांश राज्यो में टीकाकरण नही शुरू हो पाया  जहाँ शुरू भी हो गया वह भी दो चार दिनों में बन्द हो गया।

टीकाकरण के बारे में केंद्र सरकार से  सुप्रीम कोर्ट के सवाल और कोर्ट दी गयी दलीलों के साथ कोर्ट की टिप्पणियां मोदी सरकार की टीकाकरण नीति और नीयत दोनों  को कटघरे में खड़ा करते है। ऑक्सीजन की कमी से ले कर टीकाकरण के मामले में देश के विभिन्न राज्यो के हाईकोर्ट से कर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा  को जितनी फटकार पिछले कुछ दिनों में मोदी सरकार को लगाई गई  आजादी के बाद शायद ही किसी भी सरकार को कोर्ट में इतनी नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा होगा। इतनी छीछालेदर और विफलता  के बाद भी यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओ  और नेताओ को देश भर के गांव गांव में जा कर मोदी सरकार की उपलब्धियां बताने भेज रही तो यह भाजपा नेतृव की 2004 वाली फील गुड और इंडिया शाइनिंग वाले मुगालते की पुनरावृत्ति है या फिर सब कुछ जानने समझने के बाद भी मोदी सरकार की विफलता पर पर्दा डालने की संघ और भाजपा की कोशिश।

कृत्रिम माया जाल बुनकर हकीकत से ध्यान भटकाने की प्रयोगधर्मिता में भाजपा और उसके पितृ संगठन को महारथ हासिल है ।अबकी बार फील गुड की नौटंकी भाजपा को भारी पड़ने वाली है ।इस बार किसी पाकिस्तान बंगला देश या चीन से राष्ट्र को खतरा दिखा के देशभक्ति के भयादोहन की गुंजाइश नही है ।इस बार देश के लोगो ने महामारी के दंश को खुद सहा है ।बीमारी का कहर व्यक्तिगत है । ऐसे में किसी राष्ट्रवाद की घुट्टी के सहारे सच को झुठलाने की कोशिशें कामयाब नही होगी

(लेखक सुशील आनंद शुक्ला , प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता है )

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