कोरोना घरबंदी बच्चों को गैजेट एडिक्ट, जिद्दी और बेपरवाह बना रहा

गैजेट एडिक्शन बच्चों, युवाओं में मनोविकार पैदा कर रहा है। राजस्थान के डाॅक्टरों के इस रिसर्च पर देश टीवी  ने पिछले दिनों बाकायदा एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। निष्कर्ष यह है कि देश के 65 प्रतिशत बच्चे गैजेट एडिक्ट बन चुके हैं

डाॅ. लखन चौधरी

कोरोना लाॅकडाउन अब अनलाॅक होने लगा है बल्कि लगभग पूरी तरह अनलाॅक हो चुका है, लेकिन इस संकट के संक्रमण की दर एवं गति स्थिर होने, कम होने या रूकने के बजाय और तेजी के साथ बढ़ने लगी है। अब तो भारत में इसकी गति इतनी तेजी से बढ़ रही है, या बढ़ने लगी है कि अब महज तीन दिनों में ही लाख का आंकड़ा पार होने लगा है। ऐसे में सभी शैक्षणिक संस्थाएं बंद पड़ी हैं, और सभी स्कूली बच्चे, किशोर-युवा एवं महाविद्यालयीन सभी विद्यार्थीगण घर पर ही, घर से ही आनलाईन लर्निंग या ई-एजुकेशन में व्यस्त हैं। शिक्षा, पढ़ाई-लिखाई, कोचिंग, अध्ययन-अध्यापन सब अब इलेक्ट्राॅनिक डिवाइस या गैजेट के माध्यम से घर से, घर पर होने लगा है।

सचमुच कोरोना वायरस ने अब शिक्षा की जगह ई-एजुकेशन और आनलाईन एजुकेशन को वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता एवं जरूरत बना दिया है। शिक्षा की यह प्रणाली भले ही ’प्रत्यक्ष कक्षा पद्धति’ की भरपाई नहीं कर सकती है, लेकिन वक्त की भयावहता ने इसे स्वीकार करने के लिए सभी को विवश तो कर ही दिया है। अब धड़ल्ले से, घर से शिक्षा, पढ़ाई-लिखाई, कोचिंग, अध्ययन-अध्यापन जारी है, बल्कि सरपट जारी है। अब शिक्षा एवं लर्निंग का महत्वपूर्णं माध्यम एवं जरीया शिक्षक, स्कूल-काॅलेज, लाॅयब्रेरी नहीं इंटरनेट, मोबाईल, टेबलेट, लैपटाप, कम्प्युटर आदि गैजेट और इलेक्ट्राॅनिक उपकरणें हैं।

दैनिक कामकाज से लेकर समूची दिनचर्या तक सब कुछ आनलाईन होने के कारण लोगों की जिंदगी में कई तरह के मनोवैज्ञानिक परिवर्तन एवं बदलावों की बातें जोरों से होने लगी है। छोटे-छोटे बच्चों में भी गैजेट की बेहद बुरी लत आम बात हो गई है। लंबे समय तक घर पर रहने की वजह से बच्चों एवं विद्यार्थियों की आदतों में भारी बदलाव एवं परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इंटरनेट, मोबाईल, टेबलेट, लैपटाप, कम्प्युटर आदि गैजेट और इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों की ये आदतें अब खतरनाक नशे की सी आदतों (एडिक्शन) के रूप में तब्दील होने लगी हैं।

इस कोरोना कालखण्ड में स्कूली बच्चों के साथ-साथ महाविद्यालयिन विद्यार्थियों एवं युवाओं में भी गैजेट एडिक्शन खूब बढ़ा है, और जमकर बढ़ रहा है। जून महिने के अंतिम सप्ताह में आई एक महत्वपूर्णं सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार दो-तिहाई से अधिक बच्चे माबाईल, टेबलेट, लैपटाॅप, कम्प्युटर आदि आधुनिक गैजेट, डिवाइस के पंजे में बुरी तरह जकड़े दिख रहे हैं।

पिछले दिनों राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक निजी अस्पताल के डाॅक्टरों ने लाॅकडाउन पीरियड में बच्चों की इन्हीं आदत-व्यवहारों में बदलाव एवं परिवर्तन के संबंधों और दिनचर्या को लेकर एक महत्वपूर्णं सर्वेक्षण किया है। इस अध्ययन से यह बात सामने आई है कि देश के 65 प्रतिशत से अधिक यानि दो-तिहाई बच्चे गैजेट या इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों के अत्यधिक अभ्यस्त हो रहेे हैं। विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे, किशोर इन इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों से आधे घंटे भी अलग या दूर नहीं हो पा रहे हैं।

पालक एवं अभिभावक यदि इस संबंध में हस्तक्षेप करते हैं तो बच्चे रोना-धोना कर रहे हैं। चूंकि आनलाईन पढ़ाई करना है, इसलिए पालकगण विवश हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बच्चे अपना मानसिक संतुलन खोते जा रहे हैं। बात-बात पर लड़ने-झगड़ने, नाराज होने, गुस्सा होने-करने जैसी आदतें बच्चों को बिगाड़ने लगी है, और पालकों-अभिभावकों से नाराजगी के चलते बच्चे चिड़चिड़ेपन के शिकार हो रहे हैं।

राजस्थान के डाक्टरों के इस सर्वेक्षण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, गंगानगर, भीलवाड़ा, सीकर, चुरू, अलवर, हनुमानगढ, नागौर, भरतपुर सहित दिल्ली, कोलकाता, मुबंई, आगरा, लखनऊ, चडीगढ़ के बच्चों को सम्मिलित किया गया था। कई-कई घंटे आनलाईन कक्षाओं में व्यस्त रहने के बाद बच्चे घंटों सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, जिसके कारण बच्चों को रात में नींद नहीं आने की समस्याएं एवं शिकायतें तेजी से बढ़ रही है।

कोरोना लाॅकडाउन के कारण पिछले तीन-चार महीनों से विशेषकर बच्चों एवं स्कूल-काॅलेज जाने वाले युवाओं के लिए चूंकि रातदिन का मतलब नहीं रह गया है, इसलिए सोने-उठने की दिनचर्या अव्यवस्थित होकर रह गई है। दोपहर तक उठने के बाद दिनभर आनलाईन कक्षाओं में व्यस्त रहना; फिर देर रात तक, बल्कि रात-रात भर सोशल मीडिया पर लगे रहना दिनचर्या बन गई है।

 

इसका नतीजा अनिद्रा, थकान, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द के साथ छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा एवं क्रोध करना जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं हैं। इन कारणों से अब जहां वे स्वयं हैरान हो रहे हैं, वहीं उनके माता-पिता एवं अभिभावक भी बेहद परेशान हो रहे हैं। इस तरह की अव्यवस्थित एवं बोझिल दिनचर्या के कारण आनलाईन कक्षाओं एवं सोशल मीडिया पर अधिक व्यस्त रहने वाले बच्चों का स्वभाव जिद्दी, क्रोधी भी होता जा रहा है।

देर रात तक जागने के कारण रात में तमाम तरह के फास्टफूड, मैगी, स्नेक्स आदि खान-पान एवं दिन में दोपहर तक उठने, जागने जैसी दिनचर्या के कारण बच्चों, युवाओं की वजन बढ़ने की शिकायतें आ रही है। पढ़ाई-लिखाई, कैरियर, आगे का भविष्य जैसे मसलों को लेकर जर्बदस्त अनिश्चितता भी बच्चों, किशोरों, युवाओं के साथ समाज में मनोविकार पैदा कर रहा है। कुल मिलाकर जीवन के प्रति अनिश्चितता, अस्थिरता एवं जीवनचर्या की अव्यवस्था बच्चों, युवाओं एवं लोगों को एक तरह से बेपरवाह, लापरवाह बना रहा है।

इन सभी कारणों, प्रभावों एवं घटनाओं का परिणाम एवं प्रभाव देश के बच्चों एवं युवाओं के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास पर पड़ना स्वाभाविक है, जो कि अंततः अहितकारी, अनुपयोगी एवं चिंताजनक है। इन स्थितियों, परिस्थितियों पर अब गंभीरतापूर्वक विमर्श एवं चिंतन करने का वक्त है। साथ ही साथ स्कूल-काॅलेज एवं सभी शिक्षा, शिक्षण संस्थाओं को सामान्य स्थिति में लाना बेहद जरूरी एवं आवश्यक है, जिससे देश के नौनिहाल अपने जीवन के प्रति निराश, हताश, दिशाभ्रमित, कुण्ठित, लापरवाह एवं बेपरवाह होने से बच सकें।

(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं)