उद्यमिता विकास एवं विकेन्द्रीयकरण के बिना कैसी आत्मनिर्भरता ?

-डाॅ. लखन चौधरी

आजकल भारत, आत्मनिर्भर भारत बनने के लिए, आत्मनिर्भरता की दिशा में चलने लगा है। चारों तरफ आत्मनिर्भरता की बयार बह रही है। आत्मनिर्भरता के नारे, ढोल-नगाड़े बज रहे हैं। आत्मनिर्भरता के विज्ञापनों से आत्मनिर्भर बनने की संकल्पना सरकारी जुबान पर सिर चढ़कर बोलने लगा है।

कई नवदंपतियों ने अपनी संतानों के नाम तक ’आत्मनिर्भर’ रख दिए या लिए हैं। देखना है कि आत्मनिर्भर महोदय आने वाले दिनों में क्या रंग लाते हैं। अब तो बस आत्मनिर्भर की चाल, और आत्मनिर्भरता के करतब देखने बाकि है। इंतजार है कि आत्मनिर्भर कब किशोर, युवा एवं जवान होता है, और कब देश की भूखमरी, गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई दूर होती है ?

आमजन का जीवन सम्मानजनक कैसे, कब होगा ? क्या आत्मनिर्भरता आ जाने से सामान्य जनजीवन सम्मानजनक हो जाता है ? क्या आत्मनिर्भरता विकास एवं प्रगति की निशानी और उन्नति एवं संवृद्धि का सूचक है ?

सपने; आत्मनिर्भर होने के सपने, आत्मनिर्भरता के सपने, रोजगार के सपने, व्यापार-व्यवसाय, कारोबार, उद्योगधंधांे एवं अर्थव्यवस्था के हालात सुधरने के सपने लोग देखने लगे हैं। देश के करोड़ों जनमानस अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने के सपने देखने लगे हैं। आखिरकार देश का हर कोई आत्मनिर्भर बनना चाहता है।

देश का प्रत्येक नागरिक आत्मनिर्भर होना चाहता है। हर भारतवासी आत्मनिर्भरता का स्वाद चखना चाहता है। आत्मनिर्भरता का सपना आखिर क्यों ना देखें ? देश की स्वतंत्रता को 72-73 वर्ष हो गए तो आत्मनिर्भरता तो आनी ही चाहिए। आत्मनिर्भर तो होना ही चाहिए। जीवन सम्मानजनक तो होना ही चाहिए।

सवाल उठता है कि आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भरता क्या है ? क्या आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भरता बिल्कुल नई, पहली, अलग अवधारणा है ? जिसके बारे में आज तक के पूर्ववर्ती सरकारों ने सोचा नहीं था या जानते नहीं थे ? और यदि जानते थे तो फिर इस पर काम क्यों नहीं किया ?

आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भरता की परिभाषा क्या है ? आत्मनिर्भरता कैसे आती है ? भारत आत्मनिर्भर कब, कैसे बनेगा ? अभी तक इस दिशा में प्रयास हुए या नहीं हुए ? यदि हुए तो क्या, कैसे, किस तरह के प्रयास हुए हैं ?

आखिरकार आजादी के इन सात दशकों में या 72-73 सालों में भारत आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया ? और आत्मनिर्भरता क्यों नहीं आई ?

आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भरता की स्वावलंबन और परावलंबन के रूप में व्याख्या करते हुए हिन्दी के महान निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि ’यदि किसी व्यक्ति को समाज से मिलने वाला सहयोग आवश्यकता से अधिक हो जाता है तो वह दूसरों पर निर्भर रहने का आदि हो जाता है। दूसरों पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है, और यह उसकी परतंत्रता का कारण भी बनती है।

दूसरों पर निर्भर होकर या रहकर व्यक्ति अपने जीवन के सुखों का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता है।’ इसलिए कहा जाता है कि ’पराधीन सपनेंहु सुख नाहीं’ वास्तव में स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनने की प्रेरणा देती है।

महान कवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी ’साकेत’ में ’उर्मिला-लक्ष्मण’ संवाद के माध्यम से स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता के बारे में लिखा है कि ’यह पापपूर्णं परावलंबन चूर्णं होकर दूर हो, फिर स्वावलंबन का हमें प्रिय पुण्य पाठ पढ़ाइए।’

इस प्रकार आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भरता की सरल परिभाषा या व्याख्या यह है कि ’किसी भी वस्तु, कार्य, जरूरत या आवश्यकता के लिए स्वयं पर निर्भर होना या रहना।’ तात्पर्य यह है कि आत्मनिर्भरता से ही विकास, प्रगति, उन्नति एवं सवंद्धि आती है। इस तरह तो पशु-पक्षी, जानवर सभी जीव-जंतु आत्मनिर्भर होते हैं।

कहा जाता है कि मनुष्य सुख की चाहत में यथेष्ठ परिश्रम से बचने के लिए दूसरों पर निर्भर होता जाता है और आत्मनिर्भरता की भावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार पर-निर्भरता बढ़ती जाती है। व्यक्तिगत स्वावलंबन की यही भावना राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भरता बनती है। देश की भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा है कि ’एक राष्ट की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में है, दूसरों से उधार लेकर काम चलाने में नहीं।

स्पष्ट है कि आत्मनिर्भरता वैचारिक एवं स्वाभाविक रूप से भी मनुष्य एवं देश को मजबूत, ताकतवर एवं शक्तिशाली बनाती है। आत्मनिर्भरता से ही सृजनात्मकता के विकास को अवसर मिलता है। आत्मनिर्भरता से ही सर्जनात्मकता, सृजनशीलता का विकास होता है।

महात्मा गांधी भी आत्मनिर्भरता या आर्थिक स्वायत्तता को राजनीतिक स्वाधीनता की कुंजी मानते थे। आर्थिक गुलामी से बचने का तरीका आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता का अर्थ राजतंत्र पर निर्भरता नहीं है, या नहीं होनी चाहिए। भारत जैसे देश में बहुसंख्यकों की आत्मनिर्भरता का आधार ’संसाधनों एवं अवसरों के समान वितरण के दर्शन एवं आचरण से ही संभव है। बहुसंख्यक जनता को राजतंत्र पर निर्भर कर देना आत्मनिर्भरता का अधूरा प्रयोग ही हुआ एवं होगा।’

आर्थिक आत्मनिर्भरता और एक देश या राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भरता की अवधारणा एक भावना से अधिक एक तथ्यात्मक, नीतिगत सोच, दृष्टिकोण एवं अवधारणा होती है। इसका अर्थ है कि आर्थिक वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन, उत्पादकता में निर्भरता; भौतिक वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन, उत्पादकता में निर्भरता; रक्षात्मक एवं सुरक्षात्मक वस्तुओं, अस्त्र-शस्त्रों, औजारों, हथियारों के उत्पादन में निर्भरता।
हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता में आत्मनिर्भरता को प्राप्त कर लिया है, इसके बावजूद समय-समय पर बहुत से खाद्यान्नों का आयात करना पड़ता है। आज देश ने लगभग सभी आर्थिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित करते हुए देश के नागरिकों की आवश्यकता एवं जरूरत के अनुसार उत्पादन एवं उत्पादकता के मामले पर आत्मनिर्भरता अर्जित कर लिया है, इसके बावजूद हमें बहुत सी चीजों के लिए दूसरे देशों पर आश्रित रहना पड़ता है।

दूसरें देशों से बहुत सी वस्तुएं एवं सेवाएं आयात करनी पड़ती हैं। इसका एक कारण यह होता है कि हम यदि दूसरे देशों से आयात नहीं करेंगे और केवल निर्यात की सोचेंगे तो हमारे देश से कोई दूसरा देश क्यों एवं कब तक आयात करेगा ?

इसका दूसरा महत्वपूर्णं कारण यह है कि हमारे देश में जिन वस्तुओं एवं सेवाओं की उत्पादन लागतें, अन्य देशों से तुलनात्मक रूप से अधिक हैं या अधिक होती हैं उनका उत्पादन करने के बजाय आयात करना अधिक सही, उचित है, एवं लाभकारी होता है, या आर्थिक दृष्टि से भी लाभदायक माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विभिन्न सिद्धांतों में भी इस बात के प्रमाण हैं, फिर प्रत्येक वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन की आवश्यकता या जरूरत क्यों है ? जब आयात फायदेमंद हो तो आयात किया जाना या करना चाहिए। फिर आत्मनिर्भरता की अवधारणा का क्या ? क्या यह आत्मनिर्भरता की अवधारणा के विपरीत है ?

वैश्विकरण के इस युग में जब आज पूरी दुनिया एक गांव में तब्दील हो चुकी है, तब आत्मनिर्भरता की अवधारणा कितनी सही, उपयुक्त एवं उपयोगी है ? यह भी एक बड़ा सवाल है।

आत्मनिर्भरता की इन विभिन्न विचारों को जानने, समझने के बाद अब बड़ा और महत्वपूर्णं सवाल कि आत्मनिर्भरता कैसे आयेगी ? या कैसे आती है ? आत्मनिर्भरता के उपकरण क्या हैं या क्या होते हैं ? उपर की बातों से अधिक जानना एवं समझना यह जरूरी है कि क्या आत्मनिर्भरता की प्राप्ति या आत्मनिर्भर होना संभव है ?

आज दुनिया का कोई देश आत्मनिर्भर है ? वास्तविकता यह है कि आज दुनिया का कोई भी देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है, जिसके दुनिया के अन्यान्य देशों के साथ आयात-निर्यात के संबंध नहीं हैं। दुनिया की कोई भी देश की अर्थव्यवस्था आज बंद अर्थव्यवस्था नहीं रह गई है। फिर इस विचारधारा के मायने क्या हैं ? इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्थाओं की आत्मनिर्भरता महज एक जुमलेबाजी है ?

निःसंदेह आत्मनिर्भरता का राग अलापना आज एक जुमलेबाजी से बढ़कर कुछ नहीं है। आत्मनिर्भरता, आज केवल एक राजनीतिक एजेंडा है। एक ऐसा एजेंडा जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। केवल वोटबैंक के लिए लोगों का ध्रवीकरण करना इसका एकमात्र लक्ष्य एवं उद्देश्य है। इसलिए देखिए जिन अवधारणाओं को महज वोटबैंक के लिए एवं लोगों का ध्रवीकरण करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है या किया गया, उनका हश्र कभी भी अच्छा नहीं रहा है।

’विकास’ का भी यही हश्र हुआ। सरकारों ने विकास के लिए कितना अभियान चलाया लेकिन देश आज भी विकास की राह देख रहा है। सरकारी फाईलों में विकास देश के सुदूर इलाकों तक में पहुंच गया है, लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। विकास की यही विडंबना है, और यही हश्र आत्मनिर्भरता का होना है। आत्मनिर्भरता केवल जुमलेबाजी बनकर रह जाएगी।

इससे अधिक महत्वपूर्णं आत्मनिर्भरता के उपकरणों के विकास पर ध्यान देने एवं ध्यान केन्द्रित करने की है। आत्मनिर्भरता का सबसे पहला मूलमंत्र ’उद्यमिता’ उद्यमवृत्ति या उद्यमशीलता का विकास करना होता है। जब तक कोई भी देश, राज्य उद्यमवृत्ति या उद्यमशीलता विकास को प्रेरित, प्रोत्साहित, पल्लवित एवं विकसित नहीं करेगी तब तक आर्थिक आत्मनिर्भरता असंभव है।

आर्थिक विकास एवं प्रगति के लिए उद्यमी एक अनिवार्य घटक एवं उद्यमिता विकास एक अनिवार्य घटना होती है। किसी भी क्षेत्र, राज्य या देश में प्राकृतिक, भौतिक और मानवीय साधनों, संसाधनों एवं सुविधाओं की बहुतायत सुलभता एवं उपलब्धता होने के बावजूद उद्यमी तथा उद्यमिता के अभाव में इनका उपयोग आर्थिक विकास के लिए नहीं हो पाता है। जबकि उद्यमी तथा उद्यमिता की भावना साधनों, संसाधनों एवं सुविधाओं की कमी या अनुपलब्धता के बावजूद विकास एवं प्रगति के सपने को साकार कर देते हैं या साकार कर सकते हैं।

उड़ीसा, छत्तीसगढ़ का बस्तर एवं बिहार-झारखण्ड का छोटा नागपुर का पठार का उदाहरण देख लीजिए। यहां सारे बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत-प्रचुर उपलब्धता के बावजूद विकास अपनी पहली अवस्था पर ही है। साफ है कि उद्यमी तथा उद्यमिता के विकास के बिना विकास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती है। यदि किसी कारण से कुछ समय के लिए आगे बढ़ भी गई तो स्थायी नहीं रह सकती है। इसलिए उद्यमियों एवं उद्यमिता का विकास आत्मनिर्भरता का पहला मूलमंत्र है।

आत्मनिर्भरता का दूसरा महत्वपूर्णं उपकरण विकेन्द्रीयकरण है। आर्थिक एवं औद्योगिक गतिविधियों, कार्य-व्यवसायों, उद्योगधंधों आदि का विकेन्द्रीयकरण करके आर्थिक एवं औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाया जाता है, इससे देश में आत्मनिर्भरता बढ़ती है। आर्थिक एवं औद्योगिक गतिविधियों के विकेन्द्रीयकरण से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, इससे लोगों की आमदनी बढ़ती है।

लोगों की आय बढ़ने से उनकी क्रयशक्ति बढ़ती है जो बाद में बाजार में मांग उत्पन्न करने में सहायक होती है। इससे अंततः अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ता है और अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता के रास्ते में तेजी के साथ आगे बढ़ने लगती है। स्पष्ट है कि आर्थिक एवं औद्योगिक कार्य गतिविधियों का राज्यों, जिलों, विकासखण्डों, ग्राम पंचायतों आदि निचले स्तर तक विकेन्द्रीयकरण किया जाना अनिवार्य है।

कोविड-19 महामारी और संकट से उपजी 2020 की भीषण आर्थिक मंदी ने आज दुनियाभर की सरकारों को 1930 की महामंदी की याद दिला दी है। सरकारें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सुस्ती एवं मंदी से निकालने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणाएं कर चुकी हैं। भारत सरकार भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है और आत्मनिर्भरता के नारे के साथ अर्थव्यवस्था को सुस्ती एवं मंदी से निकालने का दांव अपना रही है, लेकिन उद्यमिता एवं विकेन्द्रीयकरण की अवधारणाओं की महत्ता से अनभिज्ञ दिखती है।

सरकार को यह जानना एवं समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता, उद्यमिता विकास एवं विकेन्द्रीयकरण के रास्ते से ही आती है, या कहें कि उद्यमिता विकास एवं विकेन्द्रीयकरण के बिना आत्मनिर्भरता असंभव है। इसलिए देश में एक ऐसी कार्य-संस्कृति, आर्थिक वातावरण एवं उद्यमियों का विश्वास अर्जित एवं निर्मित करने की आवश्यकता है, जिसमें आर्थिक कार्य-व्यवसाय एवं गतिविधियां स्वमेव फल-फूल सकें तभी सही मायने में आत्मनिर्भरता आयेगी। तभी वास्तव में भारत, आत्मनिर्भर भारत बन सकेगा केवल जुमलेबाजी से आत्मनिर्भरता आने वाली नहीं है।

(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं) 

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