’वर्क एंड लर्न फ्राम होम’ से निजता भंग होने का खतरा बढ़ा

अकेलापन, अवसाद एवं आत्महत्याएं दुखद और चिंतनीय

-डॉ. लखन चौधरी

कोविड-19 महामारी से बचने, निकलने, निपटने एवं उबरने के लिए जहां दुनियाभर में तमाम तरह के फौरी राहत उपाय जारी हैं। इस बीच कोरोना वायरस के संक्रमण से तत्काल फैलाव एवं इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए पिछले तीन-चार महीनों से अधिकांश   घर पर रहकर ही कामकाज कर रहे है। सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं, संगठनों, कंपनियों, औद्योगिक घरानों ने घर से हो सकने वाले सभी कामकाज को घर से निपटाने की अनुमति दे रखी है।

हालांकि अब दुनियाभर में  अधिकांश क्षेत्रों  में कामकाज सामान्य होने लगा है। फिर भी अभी भी बहुत से कार्यक्षेत्र एवं कामकाज ऐसे हैं जहां  घर पर रहकर ही सम्पन्न हो रहे हैं। दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं लगभग खुल चुकी हैं, एवं खोली जा रही हैं, लेकिन  स्कूल, कालेज, कोचिंग आदि शैक्षणिक संस्थान; मूवीटाॅकिज, मल्टीफ्लेक्स-थियेटर, जिम इत्यादि भीड़-भाड़ वाली जगहें अभी भी बंद हैं। सरकारें इन सार्वजनिक जगहों को खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं, इधर लोग घर में रहकर निरसता का अनुभव करने लगे हैं।

क्या लॉकडाउन के पालन के लिए अपनायी गई व्यवस्थाओं से अब लोगों का मोहभंग होने लगा है ? क्या घर पर रहकर लगातार काम करने से लोगों की जीवनचर्या में बोरियत आ रही है ? क्या दो-तीन महीने के ’ लॉकडाउन’ से ही लोगों को उबन, घुटन होने लगी है ? क्या इन व्यवस्थाओं से लोगों की निजता भंग होने लगी है ? सरकारों के लिए भी ’लॉकडाउन’ की यह व्यवस्था हानिकारक सिद्ध हुई है, लिहाजा अब लगभग सभी बंद संस्थान, कारोबार, कामकाज एवं कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे खुलने लगे हैं।

विशेष इलाकों एवं विशेष घटनाओं को छोड़कर अब लॉकडाउन की व्यवस्था वापसी के कगार पर है। हालांकि कोरोना के डर एवं दहशत का माहौल अभी बरकरार है। इसके लिए तमाम तरह के उपायों को अंजाम दिया गया, एवं दिया जा रहा है। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए काम करने के नये तरीके ईजाद किए गए और घर से ही काम-काज को निपटाया गया और अभी भी ’वर्क फ्रॉम होम’ व्यवस्था से घर से, घर पर काम पूरा किया जा रहा है। इसी तरह स्कूल-कॉलेजों पर अध्ययन-अध्यापन भी लगभग ठप हो जाने की स्थिति में ’लर्न फ्राम होम’ व्यवस्था अनपायी गई।

’वर्क फ्रॉम होम’ यानि घर से कार्यालयीन कामकाज की जिम्मेदारी पूरा करना या कार्यालयीन कामकाज को घर से निपटाना और ’लर्न फ्राम होम’ यानि घर से पढ़ाई-लिखाई एवं अध्ययन-अध्यापन के कामकाज को पूरा करना अब लोगों के व्यक्तिगत जीवन के लिए कठिनाईयां पैदा करने लगा है।

घर की चारदीवारी के भीतर रहकर काम करने से लोगों में कई तरह की मानसिक भ्रांतियां पनपने लगीं हैं। तरह-तरह के मनोविकारों का शिकार होने की खबरें आने लगीं हैं। कुल मिलाकर यह प्रवृत्ति या पद्धति लोगों के लिए अब मुसीबत का कारण बनता दिख रहा है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार देश-दुनिया के 82 प्रतिशत लोग इस समय इस पद्धति से उब चुके हैं, नाखुश हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इससे लोगों की पर्सनल लाईफ खत्म हो रही है। इसके कारण लोगों की व्यक्तिगत जिन्दगी में नाखुशी, कुण्ठा, बोरियत, बेचैनी एवं अशांति उत्पन्न होने लगी है। लोगों में अवसाद एवं तनाव का स्तर बढ़ रहा है।

ऑनलाइन जीवन एवं इससे उपजी जीवनशैली के कारण समाज में मनोविकार तेजी से बढ़ रहा है। सैकड़ों लोगों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने की शिकायतें आ चुकी हैं। भारत में भी कई नामचीन हस्तियों ने अपनी जिंदगी समाप्त कर ली है।

अनुमान है कि इस वर्ष 2020 के अंत तक देश-दुनिया के एक-तिहाई लोग इस तरह के मनोविकार से जुझते मिलेंगे। अपने आसपास भी नजर उठाकर देखने से लगता है कि लोगों में एक अजीब तरह की निराशा, एक नई तरह की हताशा, कुण्ठा देखी जा रही है। भले ही इसका कारण अलग-अलग स्तर, वर्ग एवं समुदाय के लिए अलग-अलग हो सकता है।

इस हताशा, निराशा, अवसाद का कारण किसी के लिए आर्थिक संकट या वित्तीय परेशानी हो सकती है, तो किसी के लिए अकेलापन वाली अवस्था भी हो सकती है। किसी के लिए नौकरी जाने, छिनने जैसा रोजगार संकट हो सकती है, तो किसी के लिए कोराबारी एवं व्यावसायिक चिंताएं हो सकती हैं। किसी के शादी-ब्याह नहीं हो पाने जैसी चिंताएं हैं, तो किसी के दूर घर-परिवार के लोगों से नहीं मिल पाने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

चूंकि इस कोरोना कालखण्ड में महीनों तक कार्यालय, शिक्षण संस्थान, दुकानें, कारोबार, उद्योगधंधे सहित तमाम तरह की गतिविधियां बंद होने के कारण लोगों को घर पर ही एक तरह से कैद होकर रहना पड़ा है, इसलिए तरह-तरह की चिंताएं, समस्याएं, कठिनाईयां लोगों के बीच आई हैं।

दुनिया में इस तरह का मसला या मामला चूंकि एक बहुत ही लंबे अंतराल 1918-20, पूरी एक सदी बाद आया है इसलिए लोगों को अधिक दिक्कतें आ रही हैं एवं अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ा है। एक नई तरह की जिंदगी, एक नये तरह का अनुभव जो लोगों के सामान्य जीवनचर्या का सोचा समझा भाग बिल्कुल नहीं है या नहीं था, इसलिए जीवन में असहजता आना स्वाभाविक है।

इसके बावजूद अब इन मसलों पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है कि आखिरकार ’वर्क फ्रॉम होम’ एवं ’लर्न फ्राम होम’ को कब तक जारी रखना है ? स्थितियों, परिस्थितियों को सामान्य करते हुए व्यवस्थाओं को कब तक पूर्ववत बहाल करना है ?

अकेलापन, अवसाद एवं आत्महत्याएं निश्चित ही बहुत दुखद और चिंतनीय होती हैं, और भविष्य के लिए चुनौतीपूर्णं भी होने, बनने जा रही हैं, क्योंकि इससे हमारी युवापीढ़ी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इसलिए अब ’वर्क फ्रॉम होम’ एवं’ लर्न फ्राम होम’ कार्यपद्धतियों पर विराम लगाते हुए पर्याप्त सावधानी एवं सुरक्षा के साथ कार्यक्षेत्रों को पूर्ववत खोला जाना चाहिए। स्थितियों, परिस्थितियों को यथाशीघ्र सामान्य करते हुए जीवनशैली एवं जीवनचर्या को पूर्ववत किया जाना चाहिए।

(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं) 

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