विश्व जनसंख्या दिवस विशेषः क्या कोरोना संकट प्रकृति का संतुलनकारी उपाय है ?

छत्तीसगढ़ में महिलाओं की कुल प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय औसत कुल प्रजनन दर 2.1 से अधिक बनी हुई है।

महिला शिक्षा एवं चेतना में भारी बढ़ोतरी देश की जनसंख्या वृद्धि-दर को तेजी के साथ रोकने में सहायक हो रही है, यही कारण है कि पांच दक्षिणी राज्यों सहित देश के 13-14 प्रमुख राज्यों की आबादी में तेजी से गिरावट के संकेत आ रहे हैं

-डाॅ. लखन चौधरी

कोविड-19 संकट की वैश्विक भयावहता के बीच विश्व जनसंख्या दिवस की यादों ने कोरोना महामारी के संदर्भ में एक बार फिर जनसंख्या नियत्रंण के प्राकृतिक या कुदरती उपायों की स्मृतियां ताजा कर दीं हैं। कोरोना संकट, कहीं प्रकृति का जनसंख्या संतुलनकारी उपाय तो नहीं है ? निश्चित रूप से यह जनसंख्या संतुलन का कुदरती तरीका है। अब तो माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत से लेकर तमाम जनसंख्या शास्त्रियों के जनांकिकीय अध्ययनों की प्रासंगिकता सिद्ध होने लगी हैं।

जनसंख्या की विकरालता को प्रकृति स्वमेव नियंत्रित करने में सक्षम है। प्रकृति अपने तरीकों एवं उपायों से जनसंख्या पर संतुलन (जनसंख्या वृद्धि एवं कमी, दोनों स्थितियों में) स्थापित करने, करते रहने या संतुलन बनाये रखने के लिए समय-समय पर अपने प्राकृतिक तरीके आजमाती रहती है, इसके बावजूद प्रकृति को खूबसूरत बनाये रखने या बनाने का महत्वपूर्णं दायित्व मनुष्यों का है, मनुष्यों के लिए है एवं समूची मानवता के लिए है। विश्व जनसंख्या दिवस का यह भी एक संदेश है।

प्रकृति को खूबसूरत एवं रहने लायक बनाये रखने की इसी अवधारणा को ध्याने में रखकर दुनियाभर की सरकारों के संघ, संयुक्त राष्ट्र संघ ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के अंतर्गत 11 जुलाई 1989 को पहली बार जनसंख्या के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के मकसद से 11 जुलाई को जनसंख्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। तब से लेकर प्रत्येक वर्ष जुलाई माह की 11 तारीख को ’विश्व जनसंख्या दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा है।

दरअसल में 11 जुलाई 1987 को पूरी दुनिया की जनसंख्या पांच बिलियन या पांच अरब को छू गई थी, या पार कर गई थी। इसलिए दुनिया को इसकी भयावहता, विकरालता एवं दुष्परिणामों से आगाह करने या सचेत करने एवं करते रहने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के कार्यकारी परिषद ने यह निर्णय लिया था, कि जनसंख्या वृद्धि से भविष्य में उत्पन्न होने वाले समस्याओं एवं खतरों से लोगों को जागरूक करना आवश्यक है, अन्यथा आने वाले समय में जनसंख्या की विकरालता दुनिया को तबाह कर सकती है।

विस्फोटक जनसंख्या की भयावहता एवं विकरालता से बचने के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम के सभी उपायों को बढ़ावा देना, जिससे जनसंख्या नियंत्रण को लागू करने में सहायता मिल सके, इसका मुख्य उद्देश्य रहा है। वास्तव में विश्व जनसंख्या दिवस या इसे मनाने का उद्देश्य जनसंख्या मुद्दों, जैसे परिवार नियोजन, लैंगिक समानता, गरीबी, अशिक्षा, शिशु-मातृत्व सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, मानवाधिकार आदि; पर लोगों में जागरूकता पैदा करना है, या जनचेतना लाना होता है।

यह अलग बात है कि जनचेतना एवं जागरूकता लोगों और सरकार में कितनी आती है ? पिछले 30-31 सालों में कितनी आई है ? जबकि आज दुनिया की कुल जनसंख्या आठ अरब के लगभग हो चुकी है, यानि विश्व जनसंख्या दिवस मनाने की शुरूआत के बाद 32-33 वर्षों में दुनिया की कुल आबादी में लगभग तीन अरब की बढ़ोतरी हुई है।

हालांकि पिछले एक दशक 2010-2019 में जनसंख्या की वैश्विक वृद्धि दर में जोरदार गिरावट आई है, जो इस अवधि में घटकर 1.1 प्रतिशत तक सिमट चुकी है। इस समय केवल आफ्रीकी देशों में जनसंख्या वृद्धि दर 2.7 के आसपास बनी हुई है।

इधर 2020 के विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर कोरोना कालखण्ड के बीच जनसंख्या वृद्धि की समस्या के नियत्रंण को लेकर भारत के लिए एक अच्छी खबर आ रही है। दक्षिण के प्रमुख पांच राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना सहित देश के कुल 13-14 राज्यों जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड, ओड़िसा, पं. बंगाल, सिक्किम एवं हिमाचल प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आने के संकेत मिल रहे हैं।

इन राज्यों में महिलाओं की कुल प्रजनन दर, जो कि एक महिला द्वारा पूरे प्रजननकाल में कुल पैदा किये गए बच्चों की संख्या होती है, में उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है, जो कि देश की राष्ट्रीय औसत कुल प्रजनन दर 2.1 से कम है एवं इसमें लगातार गिरावट आ रही है। इसका मुख्य कारण इन राज्यों में उच्च साक्षरता दर, विशेष रूप से महिला साक्षरता एवं चेतना का ऊंचा होना है। इसकी वजह से जनसंख्या नियंत्रण के उपायों का सही तरीके से इस्तेमाल हो रहा है, फलतः जनसंख्या की वृद्धि दर में तेजी से गिरावट आ रही है।

लेकिन चिंता की बात यह है कि बिहार, उप्र, मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड आदि राज्यों में महिलाओं की कुल प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय औसत कुल प्रजनन दर 2.1 से अधिक बनी हुई है।

इसमें सबसे खराब स्थिति बिहार और उत्तरप्रदेश की है, जहां कुल प्रजनन दर 2.7 से 3.4 के आसपास बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण निम्न साक्षरता दर, विशेष रूप से महिला साक्षरता, शिक्षा एवं चेतना का निम्न होना है। इसकी वजह से जनसंख्या नियंत्रण के उपायों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा है, फलतः जनसंख्या की वृद्धि दर में अपेक्षित गिरावट, जो आनी चाहिए नहीं आ पा रही है।

कुल प्रजनन दर (TFR) की बात करें तो भारत में यह 1969 में 5.6 प्रति महिला थी, जो 1994 में गिर कर 3.7 और 2019 में 2.1 से 2.3 के आसपास औसत रूप से रही है। कहा जा रहा है कि इस समय देश में प्रति महिला राष्ट्रीय औसत कुल प्रजनन दर लगभग 2.1 है।

इधर संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) द्वारा जारी स्टेट आफ पापुलेशन 2019 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या में औसत बढ़ोतरी प्रति वर्ष 1.2 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो कि इसी अवधि में चीन की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर के दोगुने से अधिक है।

मतलब यह है कि 2010-2019 की अवधि में चीन ने अपनी जनसंख्या वृद्धि दर में अत्यधिक नियंत्रण करने में सफलता हासिल की है और चीन में इस अवधि में यह वृद्धि दर मात्र आधा प्रतिशत वार्षिक के आसपास रही है। इस प्रकार जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम में चीन, भारत से बहुत आगे, और भारत चीन से बहुत पीछे है।

इस समय भारत में 0 से 14 वर्ष के आयुवर्ग की जनसंख्या 27 प्रतिशत, 15 से 64 वर्ष के आयुवर्ग की जनसंख्या 67 प्रतिशत एवं 65 वर्ष से उपर आयुवर्ग की जनसंख्या 06 प्रतिशत के आसपास है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आयेगी 15 से 65 आयुवर्ग की जनसंख्या, जिसे कार्यशील जनसंख्या माना जाता है, में सिकुड़न आयेगी जिससे आने वाले समय में देश की उत्पादन एवं उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।

जहां तक जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की बात है तो कहा जाता है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्णं उपाय महिला शिक्षा एवं चेतना है। इसके साथ ही साथ समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास में तेजी आना या तेजी लाना भी होता है, इसमें अधिक उल्लेखनीय आर्थिक विकास का मुद्दा होता है। सरकारी एवं गैर-सरकारी क्षेत्रों में कार्यशील एवं कामकाजी महिलाओं की संख्या में तेजी के साथ बढ़ोतरी हो रही है, और जनसंख्या नियंत्रण के लिए यह एक बेहद खास कारण बन रहा है। इसी कारण आने वाले दिनों में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट आना तय है।

चूंकि इस समय देश में जनसंख्या का आकार ही बहुत बड़ा एवं बढ़ा है, इसलिए जनसंख्या की वृद्धि दर को एकाएक कम कर पाना असंभव है, लेकिन आने वाले दशक में इसमें और तेजी से गिरावट आनी तय है, जिससे देश की जनसंख्या तेजी से घटेगी। भले ही भारत आने वाले दो-तीन दशकों तक विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पायेगा, लेकिन देश की जनसंख्या वृद्धि दर में विकसित देशों की तर्ज पर तेजी से गिरावट आना अवश्यंभावी है।

(लेखक, अर्थशास्त्री एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं) 

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