देश विशेष : अडानी के खिलाफ लामबंद हसदेव अरण्यवासी, अब सरहदबंदी की तैयारी

कोरिया से देश टीवी की विशेष रिपोर्ट

बैकुंठपुर। अडानी को कोल ब्लाक दिए जाने के खिलाफ सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा के दो दर्जन गांवों के आदिवासी धरना दे रहे हैं। आज 14 नवंबर को उनके आंदोलन का एक माह पूरा हो गया। शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन कर रहे इन आदिवासियों की सुध अब तक प्रशासन ने नहीं ली है। आंदोलनकारी ग्रामीणों का कहना है कि अब वे पांचवी अनुसूची के तहत अपने गांवों की सरहदबंदी करेंगे। किसी भी कीमत पर अडानी को ये जंगल नहीं देंगे। कोल ब्लाक देने के लिए पेसा कानून की अनदेखी भी की गई है।


करीब एक लाख सत्तर हजार हेक्टेयर में फैले हसदेव अरण्य के वन क्षेत्र में कोयले का अकूत भंडार है इस इलाके में कुल 20 कोल ब्लॉक चिह्नित हैं, जिसमें से 6 ब्लॉक में खदानों के खोले जाने की प्रक्रिया जारी है। एक खदान परसा ईस्ट केते बासेन शुरू हो चुकी है और इसके विस्तार के लिए केते एक्सटेंशन के नाम से नई खदान खोलने की तैयारी है। वहीं परसा, पतुरिया, गिधमुड़ी, मदनपुर साउथ में भी खदानों को खोलने की कवायद जारी है। इन परियोजनाओं में करीब एक हजार आठ सौ बासठ हेक्टेयर निजी और शासकीय भूमि सहित सात हजार सात सौ तीस हेक्टेयर वनभूमि का भी अधिग्रहण होना है। पंचायत को विश्वास में लिए बिना की जा रही प्रक्रियाओं से हक्के-बक्के आदिवासी महीने भर से लामबंद होकर विरोध जारी रखे हुए हैं। इन प्रदर्शनकारियों ने दीपावली का त्योहार भी धरनास्थल पर ही मनाया। इस दिन आदिवासियों ने जल,जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प लेते हुए प्रत्येक गांव की तरफ से ग्राम रक्षा के प्रतीक विभिन्न देवी देवताओं के नाम से दिए जलाए और पारंपरिक करमा नृत्य किया।

                हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले धरना की शुरुआत 14 अक्टूबर को बिलासपुर-अम्बिकापुर नेशनल हाईवे में स्थित सूरजपुर जिला के तारा ग्राम में धरना शुरू किया गया पर सरपंच की आपत्ति के बाद 21 अक्टूबर से सरगुजा जिला के परसा कोल ब्लॉक के प्रभावित गांव फतेहपुर में लगातार धरना किया जा रहा है। इस आंदोलन में सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिले के साल्ही, फतेहपुर, हरिहरपुर, घाटबर्रा, सैदू, सुसकम, परोगिया, तारा, मदनपुर, मोरगा, पुटा, गिधमुड़ी, पतुरियाडांड़,खिरटी, जामपानी, करैहापारा, धजाक, बोटोपाल, उचलेंगा, ठिर्री आमा, केतमा, अरसियां गांवों के सैकड़ों आदिवासी व अन्य ग्रामीण प्रतिदिन शामिल हो रहे हैं।

क्या कहते हैं आंदोलनकर्ता ग्रामीण
आंदोलनकारियों का कहना है कि पूरा इलाका सघन वनों से भरपूर है। यही क्षेत्र हसदेव बांगो (मिनीमाता बांगो बांध) का कैचमेंट एरिया है. खदानों के खुलने से हसदेव व चोरनई नदियों का अस्तित्व संकट में आ जाएगा, जिससे बांध पर भी सूखे का संकट आ जाएगा, जबकि इसी बांध के पानी से ही करीब चार लाख तिरेपन हजार हेक्टेयर खेती की जमीन सिंचित होती है। इसके अलावा इस इलाके के वन्य जीवों, हाथी, भालू, हिरण और अन्य दुर्लभ वन्य जीवों के प्राकृतिक निवास हैं, खदानों से इनके अस्तित्व पर भी संकट आ जाएगा। दुर्लभ पेड़-पौधे भी खत्म हो जाएंगे।

घाटबर्रा के मुनेश्वर सिंह बताते है कि वो किसी भी हाल में अपनी भूमि अडानी को नही देंगे, कुछ दिन पहले उदयपुर के तहसीलदार आये थे, उनका कहना है कि हम लोग सरकारी भूमि पर आंदोलन कर रहे है कार्यवाही होगी तो हमने कह दिया कि आप हमारे ऊपर कार्यवाही लर दीजिये, हमने आपसे आंदोलन की सूचना दे रखी है, वे आगे बताते है जहां तक अडानी की कंपनी कोयला खोद चुकी है, उससे हम आगे बढ़ने नही देंगे।

प्यारो बाई कहती है कि हम कंपनी के अत्याचार से डरे हुए है। किसी भी कीमत पर हम उठने वाले नहीं हैं। महिला धुरपत्ति मरकाम का कहना है कि हमारे पुरखो की जमीन है हम ऐसे नहीं लेने देंगे, सरकार कुछ भी करे, पर हम लोग पीछे हटने वाले नहीं हैं। वही जयनंदन सिंह का कहना है कि अभी एक महीना से ज्यादा हो गया है कोई भी सरकार का प्रतिनिधि हमसे मिलने नहीं आया है, अब हम लोग पैदल चल कर कलेक्टर से मिलेंगे और जल्द ही सीमबन्दी की जाएगी, जिसमे बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही पर रोक होगी। ये ग्राम सभा को मिले अधिकार के तहत किया जाएगा, हमारे जिले में 5वी अनुसूची लागू है। समय लाल मरकाम का कहना कि चाहे हमारी जान चली जाए पर हम अपनी जमीन कंपनी के हवाले नहीं करेंगे।

विरोध दरकिनार
वर्ष 2011 में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री जयराम रमेश हसदेव अरण्य क्षेत्र को नो गो क्षेत्र घोषित किया गया था। फिर नर्ष 2011 में परसा ईस्ट केते बासेन और तारा कोल ब्लॉक में खनन की अनुमति यह कहते हुए दी कि ये बाहरी भाग में हैं और इनमें खनन परियोजनाओं से जैव विविधता को ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, पर इसके बाद किसी भी अन्य परियोजना को अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसके बाद भी फिर से इस क्षेत्र में नई परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं. प्रस्तावित परियोजनाएं सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिले के अंतर्गत हैं। तीनों ही जिले पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र हैं, जहां पेसा कानून 1996 का प्रावधान है। इन क्षेत्रों में ग्राम सभा का निर्णय ही सर्वोपरि होता है। पूरे क्षेत्र की 20 ग्राम सभाओं ने अक्टूबर 2014 में कोल परियोजनाओं के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था।

कई संगठनों का समर्थन
आंदोलन को दलित आदिवासी मंच, सोनाखान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (कोरबा),गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन,पोंड़ी (कोरबा), किसान महासभा (सरगुजा), कोयला श्रमिक संघ, विश्रामपुर (सूरजपुर) सहित कई संगठनों ने समर्थन दिया है। आदिवासी महासभा बस्तर संभाग ने भी छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को आंदोलन की मांगों के समर्थन में चेतावनी देते पत्र लिखा है। आंदोलनकारियों ने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखकर गैरकानूनी तरीकों और फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों से हो रही खदानों की अनुमति निरस्त करने की मांग की है।

राज्य सरकार अपनी भूमिका भूली- आलोक शुक्ला
हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक आलोक शुक्ला आरोप लगाते हुए कहते हैं कि कॉरपोरेट घराने को पिछले दरवाजे से लाभ पहुंचाने के लिए एमडीओ का तरीका बनाया गया है और समृद्ध जैव विविधता से परिपूर्ण हसदेव अरण्य के जंगलों में कोयला खदानों की अनुमति दी जा रही है। दो विरोधी दल, भाजपा-कांग्रेस अडानी के लिए एक साथ हैं। राज्य सरकार अपनी भूमिकाओं को भूलकर केंद्र का विषय बता देती हैं। उन्होंने बताया कि इन खनन परियोजनाओं की स्वीकृति की प्रक्रियाओं में पेसा कानून 1996, वन अधिकार मान्यता कानून 2006, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 और तमाम कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते हुए कोल बेयरिंग एक्ट 1957 और कोयला खदान विशेष प्रावधान अधिनियम दिसंबर 2014 का उपयोग किया जा रहा है। साथ ही लगातार खनन परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। उनका कहना था कि प्रस्तावित 6 परियोजनाओं में चोटिया कोल ब्लॉक नीलामी में बाल्को कंपनी को मिली है, अन्य 5 कोल ब्लॉक विभिन्न राज्य सरकारों को आवंटित हुई हैं, जिनके एमडीओ (माइन डेवलपर कम ऑपरेटर) अनुबंध अडानी कंपनी (और उसकी सहायक इकाइयों) को दिए गए हैं। वर्तमान में संचालित परसा ईस्ट केते बासेन का संचालन भी अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के द्वारा ही किया जा रहा है।

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