मिलादुन्नबी और इस्लाम का सन्देश…

-मोहम्मद आरिफ दगिया

(लेखक भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत हैं)

इस्लाम अपने प्रादुर्भाव से ही जनमानस में चर्चा, कौतूहल और आकर्षण का विषय रहा है. आज से 1400 साल पहले मक्का की गलियों में हर तरफ एक ही चर्चा होती थी की अबू तालिब का भतीजा मोहम्मद ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) नया धर्म लेकर आया है और स्वयं को अल्लाह का भेजा हुआ पैगम्बर कहता है . इस्लाम के अरब में स्थापित हो जाने के बाद कैसर और किसरा के साथ हुई लड़ाइयों में इसकी विजयों ने इसके मानने वालों के शोर्य , साहस , वीरता और शहादत के जज्बे ने इसे जनसामान्य में अपार लोकप्रियता प्रदान की. आज आतंकवाद के नाम पर इसे अमेरिका और पश्चिम द्वारा बदनाम किये जाने के बावजूद वहां इसकी मकबूलियत बढ़ती जा रही है और इसके सार्वाकालीन शत्रु पश्चिम के लिए इसे सांस्कृतिक चुनौती देना दुष्कर होता जा रहा है . चूँकि कुरान में हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम को ” सारे आलम के लिए रहमत ” की संज्ञा दी गई है इसलिए आपके पवित्र जीवन , चिंतन और कार्यपद्धति का पूर्वाग्रह रहित ,निष्पक्ष और वस्तुपरक अध्ययन मुसलमानों के साथ साथ अखिल विश्व के लिए कल्याण कारी सिद्ध हो सकता है।

जो लोग इस्लाम पर यह मिथ्या आरोप लगाते हैं कि वह काफिरों से जंग करने और उनको समूल नष्ट करने की आज्ञा देता है, उन्हें तत्संबंधित आयातों की पृष्ठभूमि और हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हयाते तय्यबा का अध्ययन करना चाहिए .इससे उनकी शंकाओं की तमाम ग्रंथियां खुल जायेंगीं .एक बार आपके चंद साथियों ने कहा कि काफिरों के लिए बद्दुआ कर दीजिये . आपने ऐसा करने से मना फरमाया और कहा ” मै लानत करने के लिए नहीं भेजा गया हूँ . मै तो सम्पूर्ण सृष्टि के लिए रहमत बना कर भेजा गया हूँ .”
न्याय के मामले में आपने अमीर-गरीब, गोर-काले, मुस्लिम-काफ़िर का भेदभाव मिटाते हुए फ़रमाया –
” अगर किसी मुसलमान ने किसी काफिर पर ज़ुल्म किया तो मै क़यामत के दिन उस मुसलमान के विरुद्ध काफिर का वकील बन कर खड़ा हौगा और उस काफिर को इन्साफ दिलाऊंगा!”

आपका यह कथन कुरान शरीफ की इस आयत का ही प्रतिबिम्ब है जिसमे कहा गया है कि ” किसी कौम की दुश्मनी तुमको इस बात पर आमादा न कर दे कि तुम उन लोगों के साथ अन्याय करने लग जाओ , बल्कि हरेक के साथ इन्साफ करो ।बेशक अल्लाह इंसाफ को पसंद करता है। ”

इसी तरह आपने एक मौके पर फरमाया – ” बेटी बहरहाल बेटी होती है ,चाहे काफ़िर की बेटी क्यों न हो।” इस से यह आरोप मिथ्या साबित हो जाता है के इस्लाम मानव -समाज को तंग दायरों में बांटता है और इस्लाम के दायरे के बाहर के लोगों के लिए इसमें कोई भ्रातृभाव नहीं है।

हजरत मोहम्मद एक क्रांतिकारी मिशन के नेतृत्वकर्ता थे. वे 1400 साल पहले के समाज सुधारक थे जब कोई नारी-उत्थान, शराब बंदी और सामाजिक समानता के बारे में सोच भी नही सकता था। जिस दौर में विधवाओं को ज़िंदा जला दिया जाता था और विधवा से विवाह के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था, आप ने उस दौर में अपने से 15 साल बड़ी विधवा से शादी कर के एक क्रांतिकारी मिसाल पेश की। जब विरासत में लड़कियों को हिस्सा देने की कोई कल्पना नही कर सकता था, उस दौर में आप ने लड़कियों को सम्पति का अधिकार दिया। जिस दौर में गुलामों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था, आप ने गुलामों को उनके हुक़ुक़ दे कर दुनिया मे मानवाधिकार का पहला चार्टर पेश किया मानवता को गरिमा बख्शी !
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आज हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम आपके दिव्य सन्देश की प्रासंगिकताको समझें , समझाएं और अपने वचन , कर्म और आचरण से इस धर्म के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करें और इस्लाम के यथार्थ ,कल्याणकारी स्वरुप को विश्व के सामने प्रस्तुत करे ,यही हुजुर सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम के प्रति सच्ची खिराजे -अकीदत होगी।

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