कभी बस्तर कलेक्टर रहे इस आईएएस अफसर ने यौन शोषण करने वालों की करा दी थी सामूहिक शादी, इनमें कई अफसर भी थे

डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा 7 दिसंबर पुण्यतिथि पर विशेष

डा. निर्मल कुमार साहू

कल 6 दिसंबर हैदराबाद में जब महिला पशुचिकित्सक से गैंगरेप-हत्या के आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। पुलिस की इस कार्रवाई पर लोग फूल बरसा रहे थे। अजा उसके ठीक एक दिन बाद 7 दिसंबर बस्तर में आदिवासियों को लिए अपना पूरा जीवन खफा देने वाले डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा की पुण्यतिथि है। बस्तर के या फिर छत्तीसगढ़ के कितने लोगों ने इन्हें याद किया हेोगा यह तो नहीं पता। पर उनके एक फैसले ने उस समय काफी हलचल मचा दी थी। आज जब हैदराबाद के मुठभेड़ को लोग सही करार दे रहे हैं तो उनके इस फैसले और उसके अमल पर भी चर्चा होनी चाहिए।

दरअसल, वर्ष 1968 के दौरान जब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ एक था। उस समय डॉक्टर ब्रह्मदेव बस्तर कलेक्टर थे। दौरे के दौरान उन्हें पता चला कि बैलाडीला में लौह अयस्क की खदानों में काम करने गए गैर जनजातीय पुरुषों ने शादी के नाम पर कई भोली-भाली आदिवासी युवतियों का दैहिक शोषण किया और फिर उन्हें छोड़ दिया। जिससे कई आदिवासी युवतियां गर्भवती हो गई और कुछ के तो बच्चों ने जन्म भी ले लिया था।
ऐसी परिस्थिति में डॉक्टर ब्रह्मदेव ने ऐसी तमाम आदिवासी युवतियों का सर्वे कराया और उनके साथ यौन संबंध बनाने वाले लोगों, जिनमें कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी थे, को बुलाकर कह दिया कि या तो इन युवतियों को पत्नी के रूप में स्वीकार करो या आपराधिक मुकदमे के लिए तैयार हो जाओ। आखिर डॉक्टर ब्रह्मदेव के सख्त तेवर देख सबको शादी के लिए तैयार होना पड़ा और 300 से अधिक आदिवासी युवतियों की सामूहिक शादी करवाई गई।
बहुत दिनों बाद 2012 वे मीडिया में तब आए जब नक्सलियों ने तत्कालीन कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन को अगवा कर लिया था। इस घटना ने सरकार को हिला कर रख दिया था। नक्सली भी सरकार की ओर से कोई बात नहीं सुनना चाहते थे. ऐसे में जब बातचीत की संभावना बनी तो सरकार ने डॉक्टर ब्रह्मदेव को नक्सलियों का समझाने और कलेक्टर को आजाद करवाने की जिम्मेदारी सौंपी. जिसमें उन्हें सफलता भी हासिल हुई।

बस्तर में 200 करोड़ के प्रोजेक्ट के खिलाफ
बता दे कि आदिवासियों को नुकसान से बचाने के लिए ऐसे कई मौके आए जब डॉक्टर ब्रह्मदेव सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। 1973-74 में वो केन्द्रीय गृह मंत्रालय में निदेशक बने और फिर संयुक्त सचिव भी। इस दौरान सरकार बस्तर में जनजातीय इलाके में विश्व बैंक से मिले 200 करोड़ रुपये की लागत से 15 कारखाने लगाए जाने की योजना लाई, जिसका डॉक्टर ब्रह्मदेव ने खुलकर विरोध किया।
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इससे सालों से उन इलाकों में रह रहे जनजातीय लोग दूसरे क्षेत्र में पलायन करने के लिए मजबूर हो जाएंगे, जो सही नहीं है. लेकिन सरकार उनसे सहमत नहीं हुई। आखिरकार 1980 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और आदिवासियों के लिए पूरी तरह से जुट गए।

“जनान्दोलन के प्रमुख शर्मा जी”
उन्हें याद करते उनके साथी गोपाल राठी फेसबुक पर लिखते हैं. भारत जनान्दोलन के प्रमुख शर्मा जी भारतीय प्रशासनिक सेवा के महत्वपूर्ण पदों पर रहे है l वे आदिवासियों के जल- जंगल- जमीन पर मालिकाना हक़ के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करने वाले योद्धा थे l वे प्राकृतिक संशाधनों की लूट और पर्यावरण को बर्बाद करने वाली विकाश की मौजूदा नीतियों का हमेशा विरोध करते रहे.l मैंने बहुत कम ऐसे अधिकारियों को देखा है, जो व्यवस्था के अंदर रहकर और फिर बाहर आकर भी, जनता के हक़ के लिए जूझते रहे हैं. आई ए एस अधिकारी रहे गाँधीवादी बी ड़ी शर्मा उनमे से ही एक थेlआपने ही मुझे नर्मदा नदी पर बने पहले बरगी बांध से विस्थापितो के पुनर्वास की लङाई को आगे बढ़ाने के लिए भेजा था।आपके साथ काम करने का अनुभव एवं आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं पर अध्ययन का मार्ग प्रशस्त किया । जनआंदोलनों को उनकी कमी हमेशा महसूस होती रहेगी l वे हम जैसे बहुत से लोगों के प्रेरणा स्रोत थे l उनकी जीवटता ,संघर्ष कॊ प्रणाम l

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