समाधि लेने के पहले क्या कहा था चमन ने

बाबा घासीदास के इस चेले की समाधिस्थल पर बनेगा मंदिर

पिथौरा। गुरु घासीदास की विश्वविख्यात समाधि स्थल गिरोधपुरी धाम की ध्वज पताका अब ग्राम पंचायत पचरी के चमन कुमार जोशी के समाधि स्थल पर स्थापित हो गई है। पूरे छत्तीसगढ़ में चमन की भूमि समाधि सम्भवतः पहली घटना है, जो इन दिनों चर्चा में है कि किसी हठयोगी की समाधि या जैन संत का संथारा के लिये जिद, जुनून और जान देने की इस तरह की समाधिस्थ घटना ‘चमन’ को हर समय के लिये चमकाती रहेगी।

पिथौरा के वरिष्ठ पत्रकार रजिंदर खनूजा और लालबहादुर महांती बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के एन एच पर स्थित झलप उपतहसील मुख्यालय से बागबाहरा की ओर मुख्य सड़क मार्ग पर 6 कि मी में स्थित अनुसूचित जाति बाहुल्य ग्राम पंचायत पचरी है। गांव के आख़िरी छोर पर स्थित चमन के निवास है। पचरी स्थित चमन के छोटे भाई नंदकुमार ने बताया कि वे लोग 2 भाई 6 बहन हैं। माता पिता बचपन के समय गुजर गये हैं। माता गंगाबाई और पिता का नाम दयालू राम है। हम सभी की शादी हो गयी है। चमन ने शादी करने से मना कर दिया और वो अविवाहित था। डेढ़-दो एकड़ जमीन है। रहने के लिये कच्चा खपरैल घर है। गरीबी रेखा में जीवन यापन चलता है। 25 के करीब पारिवारिक सदस्य है। चमन की समाधि के दौरान हुई मौत से इनका पूरा परिवार व्यथित है।

परिजनों के मुताबिक चमन शुरू से संकोची और अपने ढंग से काम करने का आदी था। ग्राम स्थित शाला से 5वीं तथा 8वीं करने के बाद पास स्थित नरतोरा के हाईस्कूल से 12वीं पास था। उसके बाद आगे पढ़ाई न कर घर के एक अलग कमरे को साधना स्थल बनाकर ध्यान साधना करता था। बाबा घासीदास को प्रेरणाश्रोत मान कर वह वर्ष में 1 बार गिरोधपुरी धाम अवश्य जाता था। खुद  खाना बनाकर खाता था। दूसरों को हर समय शिक्षित करने का काम करता था। चमन की उम्र 31 वर्ष ही थी।

ग्राम में रहने वाले उसके बहनोई सुभाष ने बताया वर्ष 2014 में चमन ने पहलीबार 72 घंटे का भूमि समाधि ली।दो वर्ष बाद लगातार तीन वर्ष तक 100 घंटे में उसकी समाधि समाहित हो गया।अब की छठी बार 8 घंटा अधिक का उसने प्रण किया था। परंतु इस बार चमनलाल का शरीर वैसा नहीं था जैसे पहले के समाधियों के बाद रहता था।

क्या फर्क था ? के सवाल पर नंद कुमार ने बताया कि समाधि के बाद जब हम उनको गड्ढ़े से निकालते थे तो  सिद्धआसन में बैठने के कारण उसका शरीर अकड़ जाया करता था।घर लाकर हम पूरे शरीर का मालिश करते थे।आधा-एक घंटे बाद ठीक हो कर सामान्य दिनचर्या में लग जाता था।

समाधि के पहले की तैयारी के बारे में नंदकुमार ने बताया 4-5 दिन पहले उपवास चालू कर देता था फिर घासीदास बाबा के सामने बैठकर प्राणायाम व ध्यान का साधना करता था। जब इस बार 8 धंटा ज्यादा समाधि की बात कही तो आप लोगों ने रोका नहीं के सवाल पर कहा, वह कहता था – मुझे बाबाजी से जैसी प्रेरणा मिलेगी वैसे मैं करूँगा।इस मामले में वो जिद्दी था, किसी की सुनता नहीं था।

अभी समाधि की घटना के बारे में पूछने पर परिवार वालों नेचुप्पी साध ली चूंकि ये उनकी सहज समझ के बाहर की घटना है।

इस संबध में ग्रामीणों ने ग्राम के सरपंच कुलदीप दीवान, कोटवार हेमलाल सोनवानी, बुजुर्ग मालू ने बताया कि 30 दिसम्बर को दशगात्र कार्यक्रम संम्पन्न हुआ है।अभी समाधिस्थल पर एक चबूतरा बनाया गया है।जल्द ही यहां एक मंदिर बनाया जाएगा। एक छात्रा डिम्पल ने बताया वो हमारे गुरुजी थे। हर समय नशा मुक्ति और सन्मार्ग की बात करते थे।

 समाधि में आखिरकार क्यों गई जान…