क्या आप जानते हैं साधना को फिल्मी दुनिया में लाने वाला छत्तीसगढ़िया था, और पाकिस्तान से आकर पहली पनाह छत्तीसगढ़ में ली

आज 25 दिसंबर पुण्यतिथि

 

-डॉ. निर्मल कुमार साहू

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के करांची में 2 सितंबर 1941 को जन्मी साधना ने आज ही के दिन 25 दिसंबर 2015 को इस दुनिया के अलविदा कर दिया। फिल्मी दुनिया में 60 के दशक का दौर जैसे साधना ने अपने नाम किया था। उस दौर में वे शिखर पर थीं और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनका हेयर स्टाइल आज साधन कट के नाम से जाना जाता है।

साधना अपने माता पिता की एकमात्र संतान थीं और 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया। साधना का नाम उनके पिता ने अपनी पसंदीदा अभिनेत्री साधना बोस के नाम पर रखा था। उनकी माँ ने उन्हें आठ वर्ष की उम्र तक घर पर ही पढा़या था। आज 25 दिसंबर को पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए आपको बतातें हैं कुछ दिलचस्प बातें।

साधना के प्रशंसकों में बहुत से लोगों को शायद ये मालूम नहीं होगा कि फिल्मी दुनिया में साधना को लाने वाला छत्तीसगढ़िया ही था। और साधना ने अपने कुछ दिन बिलासपुर में भी गुजारे थे। बिलासपुर में अपनी पत्रकारिता का कुछ समय बिताने वाले वरिष्ठ पत्रकार रतन जसवानी जो उन्हीं के बिरादरी के हैं बताते हैं कि उनकी मां सहित कई बुजुर्गों ने बताया था कि विभाजन के समय पाकिस्तान से आकर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बने चकरभाठा कैंप में अपने परिजनों के साथ कुछ दिन गुजारे फिर यहां से मुंबई का रूख किया।

छत्तीसगढ़ में पाक के सिंधी शरणार्थियों के लिए कई जगहों पर कैंप बनाए गए थे। तिल्दा, भाटापारा, बिलासपुर में चकरभाठा। आज भी कैंप के नाम से जाना जाता है पर आज इन जगहों पर बस्तियां तन गई हैं। सिधी बिरादरी की यहां बहुतायत है। वहीं साधना को फिल्मी दुनिया में स्थापित करने का श्रेय छत्तीसगढ़ में जन्मे पले बढ़े फिल्म निर्माता, अभिनेता, निर्देशक किशोर साहू को जाता है। जी हां, वही किशोर साहू जिन्होंने फिल्म गाइड में देवानंद के सहअभिनेता मारको की भूमिका निभाई थी इस फिल्म में वे नायिका वहीदा रहमान के पति थे।

                  मेरी आत्मकथा में वे लिखते हैं- वर्ष 1958 में शशधर मुकर्जी फिल्मिस्तान से अलग हो गए और फिल्मालय नाम से नई संस्था बनाई । मुझसे मेरा सहयोग मांगा था।…. मुकर्जी ने मुझे अपने चित्र लव इन शिमला में चरित्र भूमिका करने को कहा मैंने स्वीकार कर लिया। चित्र के दिग्दर्शक के लिए उन्होने होनहार युवक आर के नय्यर को लिया। मुकर्जी के दूसरे बेटे जाय मुकर्जी हीरो बने। हीरोइन के लिए एक नई लकी जो कि सिधी थी किंतु हिंदी अच्छी बोलती थी और एक सिंधी फिल्म में काम कर चुकी थी किंतु हिंदी फिल्मों के लिए जिसे हर निर्माता नापसंद करता चला गया था , जिसका स्क्रीन टेस्ट लेकर मैंने मुकर्जी से उसे हीरोइन बनाने का अनुरोध किया था –ले लीगई। उस लड़की का नाम साधना था।

साधान की शादी मशहूर निर्देशक आर के नैय्यर से हुई थी जो उनसे उम्र में काफी बड़े थे। साधना के माता-पिता इस शादी के लिए पूरी तरह राजी नहीं थे। नैय्यर से उनकी नजदीकियां इस फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थीं। किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में जिक्र करते लिखा है-
मार्च 1959 में लव इन शिमला के यूनिट के साथ आर के नय्यर,साधना, अजरा, शोभना समर्थ, विजयलक्ष्मी , दुर्गा खोटे और मैं शिमला गए। कुफरी में बर्फ पड़ी थी। शिमला और कुफरी में दस दिनों तक शूटिंग हुई।

साधना और नय्यर के बीच रोमांस यहां पहुंचकर गहरा होने लगा। रोमांस तथा रोमांस करते लोग मुझे अच्छे लगते हैं। उनके इस दबे-दबे, लुके –छिपे रोमांस के कारण शूटिंग में भले ही कुछ ढीलापनआ गया हो लेकिन यूनिट में रंग गया था।

वर्ष 1960 में रिलीज हुई ‘लव इन शिमला’ ने साधना को रातों रात स्टार बना दिया था। गई थीं। फैंस उनके हेयरस्टाइल से लेकर उनके कपड़ों को भी कॉपी करने लगे थे। साधना का नया लुक दिया ‘साधना कट’ के नाम से मशहूर हो गया। दरअसल नय्यर ने चूंकि साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे छुपाने के लिए उनके बालों को ऐसा कट दिया गया था।

वर्ष 1995 में आर के नय्यर साधना को अकेले छोड़ इस दुनियां को अलविदा कह गए। साधना की कोई संतान नहीं हुई। जीवन के आखिरी पलों में उन्होंने अभिनेत्री वहीदा रहमान, आशा पारेख और नंदा के साथ अच्छा संपर्क बनाये रखा लेकिन अपनी चचेरी बहन बबीता से दूरी बनाये रखी। वष 2015 में आज ही के दिन 25 दिसंबर को इस अभिनेत्री ने दुनिया के अलविदा कह दिया।

(संदर्भः मेरी आत्मकथा, किशोर साहू, राजकमल प्रकाशन, 2017)