देवानंद…जिनके काले कोट पर कोर्ट ने लगाई थी पाबंदी

बालीवुड के सदाबहार अभिनेता देवानंद की पुण्यतिथि

मुंबई। आज 3 दिसबंर बालीवुड के सदाबहार अभिनेता देवानंद की पुण्यतिथि है। देवानंद अपने दौर के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक थे और उस जमाने के फैशन आइकान भी।याद करें काला कोट और टोपी, बताया जाता है कि इसे देख उस दौर में लड़कियां मर मिटती थीं। सफेद शर्ट में काला कोट के साथ टोपी लगाए देवानंद को देख लड़कियां छलांग लगाकर जान देने तक को आतुर रहती थीं। लिहाजा अदालत तक को दखल देना पड़ा और उनके काले कोट पहनने पर रोक लगा दिया।

हिंदी सिनेमा में तकरीबन छह दशक तक दर्शकों पर अपने हुनर, अदाकारी और रूमानियत का जादू बिखेरने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम धरम देवत्त पिसोरीमल आनंद है। उनकी निज़ी ज़िंदगी की बात करें, तो वो भी काफ़ी संघर्ष भरी रही। सरकारी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई करने वाले देव साहब आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके माता-पिता के पास उन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। घर की मजबूरियों के चलते वो पैसा कमाने मुंबई आए और किस्मत ने उन्हें बॉलीवुड का सुपरस्टार बना दिया।

                       वे भारतीय सिनेमा के बहुत ही सफल कलाकार, निर्देशक और फ़िल्म निर्माता थे देव आनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक थे। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक शेखर कपूर की माँ है। भारतीय सरकार ने देव आनंद को भारतीय सिनेमा के योगदान के लिए 2001 में पद्म भूषण और 2002 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित किया।

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देव आनंद काम की तलाश में मुंबई आये और उन्होंने मिलट्री सेंसर ऑफिस में 160 रुपये प्रति माह के वेतन पर काम की शुरुआत की! पूना में शूटिंग के वक़्त उनकी दोस्ती अपने ज़माने के सुपर स्टार गुरु दत्त से हो गयी! कुछ समय बाद अशोक कुमार के द्वारा उन्हें एक फ़िल्म में बड़ा ब्रेक मिला! उन्हें बॉम्बे टाकीज़ प्रोडक्शन की फ़िल्म ज़िद्दी में मुख्य भूमिका प्राप्त हुई और इस फ़िल्म में उनकी सहकारा थीं कामिनी कौशल, ये फ़िल्म 1948 में रिलीज़ हुई और सफल भी हुई! 1949 में देव आनंद ने अपनी एक फ़िल्म कम्पनी बनाई, जिसका नाम नवकेतन रखा गया, इस तरह अब वो फ़िल्म निर्माता बन गए! देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरुदत्त का डाइरेक्टर के रूप में चयन किया और एक फ़िल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था बाज़ी, ये फ़िल्म 1951 में प्रदर्शित हुई और काफी सफ़ल हुई।

1965 में उनकी पहली रंगीन फ़िल्म प्रदर्शित हुई, जिसका नाम था गाइड, ये एक मशहूर लेखक आर के नारायण के अपन्यास पर आधारित थी, जिसका निर्माण उनके छोटे भाई विजय आनंद ने किया था। ये फ़िल्म देव साहब ही बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है, जिसके बारे में कहा जाता है कि अब दुबारा गाइड कभी नहीं बन सकती, ऐसी फ़िल्म सिर्फ एक बार ही बनती है।