जानिए…कितना खतरनाक है एंटीबायोटिक दवा लेना

एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी महामारी बन जाएगी

अगर आप डाक्टर की सलाह लिए बिना राशन या दवा दूकान जाकर दवा खरीद रहे हैं। तो यह आपके लिए खतरनाक हो सकता है। तुरंत तो आराम मिल जाए पर भविष्य में आपको इसके लिए अस्पताल जाकर बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है सेहत का नुकसान तो अलग है। वहीं उतना ही खतरनाक डाक्टर के बताये कोर्स को पूरा किए बिना ठीक ठगते ही दवा छोड़ देना। खांसी सर्दी जैसे सामान्य बीमारी के लिए आयुर्वेदिक दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा ले सकते हैं। । पूरी दुनिया में अभी भी एंटीबायोटिक ड्रग्स समेत दवाओं की कमी से मरने वालों की संख्या अभी भी एंटीबायोटिक प्रतिरोध से मरने वालों से ज़्यादा है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ हमें सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा।

बिलासपुर की आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉ सुष्मिता गुम्बर कहती है, एंटीबायोटिक के अविष्कार ने चिकित्सा जगत को एक मैजिक बुलेट थमा दी। 20वीं सदी के शुरुआत से पहले सामान्य और छोटी बीमारियों से भी छुटकारा पाने में महीनों लगते थे, लेकिन एंटीमाइक्रोबियल ड्रग्स (एंटीबायोटिक, एंटीफंगल, और एंटीवायरल दवाएँ) के इस्तेमाल से बीमारियों का त्वरित और सुविधाजनक इलाज़ होने लगा।लेकिन विज्ञान यहाँ भी वरदान के साथ-साथ अभिशाप होने के अपने गुण को चरितार्थ कर गया, इन दवाओं का धड़ल्ले से प्रयोग होने लगा। समय के साथ एंटीबायोटिक का धड़ल्ले से प्रयोग होने लगा। लेकिन एंटीबायोटिक खा-खाकर बैक्टीरिया अब इतना ताकतवर हो गया है कि उस पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होने लगा।

एंटीबायोटिक समेत एंटीमाइक्रोबियल ड्रग्स का अत्याधिक सेवन स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। एंटीमाइक्रोबियल ड्रग्स के अधिक और अनियमित प्रयोग से इसका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जाता है।विदित हो कि प्रत्यके व्यक्ति एक सीमित स्तर तक ही एंटीबायोटिक ले सकता है, इससे अधिक एंटीबायोटिक लेने से मानव शरीर एंटीबायोटिक के प्रति अक्रियाशील हो जाता है।और इन माइक्रोब्स से होने वाली बीमारियां ज्यादा जानलेवा हो जाती है।

आखिर एंटीमाईक्रोबियल्स प्रतिरोध के कारण क्या है ?
डॉ सुष्मिता गुम्बर कहती हैं मेडिकल शॉप कल्चर- हमारे देश में सर्दी खाँसी बुखार जैसी समस्याओं पर लोग मेडिकल से डायरेक्ट दवाई लेते है।उन दवाइयों में अधिकतर एंटीबायोटिक्स का प्रयोग किया जाता है। जिससे रोगी को तुरंत लाभ तो मिल जाता है लेकिन आगे के लिए वह माइक्रोब्स एंटीबायोटिक्स के आदि हो जाते है।

कोर्स पूरा न करना :- 1-2 दिन की दवा लेने के बाद रोगी को आराम मिलता है।जिससे वह जो एंटीबायोटिक्स ले रहा है उसे बिना डॉक्टर की सलाह के बंद कर देता है।जब अगली बार वही रोग होता है तो वह एंटीमिक्रोबिअल उस रोग के लिए प्रतिरोधी हो जाते है।
पोल्ट्रीफार्म और फिशरी में भी एंटीबायोटिक्स का प्रयोग ग्रोथ को बढ़ाने के लिए किया जाता है। जिसके कारण जो व्यक्ति इन का प्रयोग खाने के लिए करते है उनमें पहले से ही प्रतिरोधकता विकसित हो जाती है।

चिंताजनक आँकड़े, भारत अव्वल
डॉ सुष्मिता गुम्बर का कहना था कि एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध से होने वाली मौतों के संबंध में समुचित आँकड़ों का अभाव है, फिर भी एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2015 तक एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण 58,000 शिशुओं की मौत हो गई है। विदित हो कि पूरी दुनिया में भारत सबसे ज़्यादा एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करता है। एक अध्ययन के मुताबिक ‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी महामारी बन जाएगी।गौरतलब है कि अभी हर साल कैंसर से पूरी दुनिया में 80 लाख लोगों की मौत हो जाती थी। लेकिन, 2050 तक ‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ की वज़ह से हर साल एक करोड़ लोगों की मौत होगी, यानी ये कैंसर से भी बड़ा खतरा बन सकता है। एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के कारण रोगियों को अस्पतालों में लंबे समय तक भर्ती रहना पड़ता है। साथ ही उन्हें गहन देखभाल की भी ज़रूरत होती है।इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव तो बढ़ता ही है साथ में स्वास्थ्य देखभाल की लागत में भी व्यापक वृद्धि होती है।

                   डॉ सुष्मिता गुम्बर बताती है वर्ष 2012 में ‘चेन्नई डिक्लेरेशन’ में सुपरबग के बढ़ते खतरे से निपटने के लिये व्यापक योजना बनाई गई थी। इस योजना में 30 ऐसी प्रयोगशालाओं की स्थापना की बात की गई थी जो एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करेंगे, लेकिन अभी तक केवल ऐसी 10 प्रयोगशालाओं का ही निर्माण हो पाया है।

सरकार को सुपरबग से बचाव का उपाय खोजना होगा और इसके लिये अनुसंधान को प्रोत्साहन देना होगा।एंटीबायोटिक के अधिक प्रयोग को रोकने के लिये सरकार ने बिक्री योग्य दवाओं की नई सूची जारी कर उसके आधार पर ही दवा विक्रेताओं को दवा बेचने का निर्देश दिया है।लेकिन कहीं भी आसानी से एंटीबायोटिक का मिल जाना चिंताजनक है। अतः सरकार को अपने निगरानी तंत्र को और चौकस बनाना होगा।

हालाँकि इसमें एक महत्त्वपूर्ण बिंदु संतुलन बनाए रखने का भी है> भारत के ‘सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन’ (Central Drugs Standard Control Organization- CDSCO) ने अनुसूची एच-1 लागू किया है, जिसके अनुसार बिना किसी चिकित्सक के परामर्श 24 मूल एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

डॉ सुष्मिता कहती हैं किसी भी समस्या के समाधान के लिए यह जानना आवश्यक है कि समस्या कितनी बड़ी है। मॉनिटरिंग अच्छे से की जाये।बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के दवा का प्रयोग न किया जाये।सिर्फ जरूरी एंटीबायोटिक्स का ही इस्तेमाल किया जाये। डाइग्नोस्टिक सपोर्ट को मजबूत किया जाये।किसी भी एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा करने पर जोर दिया जाये। नेशनल एक्शन प्लान फॉर एंटीमाईक्रोबियल रेसीटेन्स का पालन किया जाये। जिन बीमारियों में एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता नही है उनमें इन दवाओं के प्रयोग से बचना चाहिए। आयुर्वेदिक दवाओं,योग और प्राकृतिक चिक्तिसा पर जागरूकता बढ़ाई जाए।जिससे इस मानव निर्मित महामारी से बचा जा सकता है।

डॉ सुष्मिता गुम्बर
(लेखिका छग के बिलासपुर में  आयुष चिकित्सा अधिकारी हैं)