संगीत से अलग होना अपनी पहचान को खोने जैसा : ममता चंद्राकर

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की कुलपति के रूप में विवि का विस्तार पहली प्राथमिकता

प्रदीप मेश्राम, राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ की चर्चित गायिका ममता चंद्राकर (मोक्षदा) की गिनती जल्द ही राज्य के कुलपतियों की श्रेणी में होगी। अब वह गायन के अलावा प्रशासनिक स्तर पर भी काम करती नजर आएंगी। हाल ही में राज्य सरकार ने उन्हें राजनांदगांव जिले के खैरागढ़ स्थित विश्व विख्यात इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया है। वह अपनी नई जिम्मेदारी के साथ राज्य की  लोककला को सहेजने तथा मजबूती देने की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। श्रीमती चंद्राकर यह मानती है कि संगीत से अलग होना खुद के पहचान को गंवाने जैसा कदम है। ‘देश टीवीÓ के साथ उन्होंने अपनी भावी रणनीति को लेकर चर्चा की।

प्र. – सरकार से मिले इस जिम्मेदारी जरिये आप किस क्षेत्र में काम करेंगी और प्राथमिकताएं क्या होगी?
उ. – मैं चाहूंगी कि इस विश्वविद्यालय से छात्र सिर्फ डिग्रीधारी बनकर न निकले, बल्कि एक कलाकार  के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाएं। इसलिए उनका पूरा ध्यान विद्यार्थियों को उनके चुने हुए विषयों पर पारंगत करना होगा। वह यह भी चाहती है कि इन विद्यार्थियों के कला के दम पर युनिवर्सिटी की पहचान बरकरार रहे।
प्र. – इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की पहचान  80-90 के दशक में वैश्विक स्तर पर थी। विदेशी विद्यार्थी संगीत की तालीम लेने पहुंचते थे, उसको लेकर क्या योजना है?
उ. – मैं चाहती हूं कि इस युनिवर्सिटी की देश-दुनिया में विस्तार हो। बिना विस्तार के विदेशी छात्राओं का युनिवर्सिटी में पहुंचना संभव नहीं है। विदेशी छात्र-छात्राओं के लिए बेहतर भविष्य गढऩे की दिशा में वह विशेष रूप से ध्यान देंगी।
प्र. – आप भी इस युनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। वर्तमान और आपके दौर में कितना बदलाव देखती हैं?
उ. – संगीत के क्षेत्र में बदलाव काफी आएं हैं। क्लासिकल संगीत को भी काफी प्रभाव पड़ा है। यह युनिवर्सिटी क्लासिकल शिक्षा के लिए जाना जाता है।  मैं चाहूंगी कि क्लासिकल संगीत के जरिये इस युनिवर्सिटी की साख बरकरार रहे, ताकि नई पीढ़ी इससे प्रभावित होकर संगीत को एक विषय के रूप में चुने।
प्र. – छत्तीसगढ़ में ऐसे कई लोककला के चर्चित शख्सियत रहे हैं, लेकिन आज वह गुमनामी में जीवन जी रहे हैं, इस विषय पर आपका क्या कहना है?
उ. – कुलपति के रूप में मेरा उद्देश्य है कि विश्वविद्यालय में एक शोधपीठ का गठन हो, ताकि नई पीढ़ी को राज्य के साहित्यकारों, लेखक, गायक समेत अन्य लोगों के विषय पर तथ्यात्मक और रचनात्मक जानकारी मिले, इसलिए वह इस दिशा में  काम करना चाहती हैं।
प्र. – अक्सर लोक गायिकाओं में आपकी और तीजनबाई के अलावा चुनिंदा नाम लोगों के जेहन में है, जबकि कई कलाकार भी गायिकी में अपना लोहा मनवा रहे हैं, इसको लेकर आपका क्या कहना है?
उ. – देखिए संगीत के क्षेत्र में निरंतर जुड़ाव होना जरूरी है। यह क्षेत्र कई कुर्बानियां मांगता है। पारिवारिक दायित्वों को भी त्याग करना पड़ता है। संगीत सीखने के बाद अलग होना मतलब खुद की पहचान को गंवाना है। इसलिए जरूरी है कि लगातार अभ्यास और  इससे जुड़े कार्यक्रम करते रहना चाहिए। कला एक साधना है। यह एक कठिन तप है। संगीत से अलग होने के बाद कई लोग इसी वजह से पहचान खो देते हैं।
प्र. – संगीत आपके लिए कितनी अहमियत रखता है, अब आप कुलपति के रूप में काम करेंगी, दोनों में कैसे तालमेल करेंगी?
उ. – संगीत मेरे लिए एक ईश्वर से जुडऩे का सशक्त जरिया है। कुलपति के रूप में वह प्रशासनिक स्तर पर संगीत को व्यापक रूप देने की कोशिश करेंगी। वहीं एक कलाकार के रूप में वह अपने पूर्ववत अभ्यास करेंगी। दोनों में तालमेल बिठाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
प्र. – नई पीढ़ी को आपकी ओर से क्या संदेश है? छत्तीसगढ़ की लोककला में युवाओं के लिए क्या संभावना है?
उ. – छत्तीसगढ़ की लोककला का कोई सानी नहीं है। यह एक सांस्कृतिक धरोहर है। निश्चिततौर पर युवाओं के लिए काफी संभावनाएं है। रोजगार के क्षेत्र में भी संगीत को चुना जा सकता है। बशर्ते पूरी शिद्दत और तप के साथ संगीत से जुड़े। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का मेल अद्भुत है, इसलिए यहां की लोककला भी समृद्धशाली है।