… तो छत्तीसगढ़ के इस गांव ने अपने नाम के आगे जोड़ लिया ‘गांधी’

आज गांधी जयंती पर विशेष: बालोद जिले के गुंडरदेही के गांव गोरकापार की कहानी

गुंडरदेही के ‘गांधी गोरकापार’ से लेकर डौंडी लोहारा तक मौजूद है आजादी के इस सिपाही की गाथा, अब तक ठोस पहल नहीं हुई स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की|स्व. वली मुहम्मद के वंशजों को भी इस बात का मलाल है कि अब तक सरकारी स्तर पर कोई पहल नहीं हुई।

-मुहम्मद जाकिर हुसैन

हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक सिपाही ऐसे भी हुए हैं,जिनकी रिहाई की वजह ‘बापू का सपना’ बना। जब बापू का यह सपना सच हो गया तो गांव वालों ने खुद ही नाम के आगे गांधी जोड़ लिया। अब इस बात को भी 100 साल होने जा रहे हैं। बात है उस वक्त के दुर्ग और अब के बालोद जिले के गुंडरदेही क्षेत्र के गांव गोरकापार की।
तब यहां के अमीन पटवारी वली मुहम्मद ने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे और एक वक्त ऐसा भी आया जब अंग्रेजों की जेल में ‘बापू का सपना’ उनकी रिहाई की वजह बना। इस घटना का असर यह हुआ कि ग्रामीणों ने अपने गांव का नाम ही गांधी गोरकापार कर दिया, जो आज भी कायम है। विडम्बना यह है कि स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद की वजह से इस गांव का नाम बदला, आज उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। स्व. वली मुहम्मद के वंशजों को भी इस बात का मलाल है कि अब तक सरकारी स्तर पर कोई पहल नहीं हुई।

अंग्रेजों के मुलाजिम वली मुहम्मद ऐसे बन गए थे गांधी के सिपाही
गुंडरदेही में अमीन पटवारी वली मुहम्मद का अंग्रेजों की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से जुड़ा तथ्य भी बेहद रोचक है। उनसे जुड़ी घटनाओं का जिक्र जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग के तत्कालीन महामंत्री बदरुद्दीन कुरैशी के संपादन में 1995 में निकाली गई किताब ‘आजादी के दीवाने’ और फरवरी 2020 में जगदीश देशमुख द्वारा लिखित किताब ‘छत्तीसगढ़ के भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी’ में विस्तार से है। इन्हें छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं पर प्रकाशित कई दूसरी किताबों में भी दर्ज किया गया है।

जेब में थी बापू की तस्वीर और बदल गई तकदीर
दस्तावेजों में दर्ज घटनाक्रम के मुताबिक 1920-21 में जब वली मुहम्मद पटवारी के तौर पर गुंडरदेही के गोरकापार में पदस्थ थे, तब एक आदिवासी को उसकी गुम भैंस का पता खुले बदन में सिर्फ धोती पहनेे हुए बूढ़े ने बताया था। जब आदिवासी उस बूढ़े को धन्यवाद देने खोजने लगा, तब अमीन पटवारी वली मुहम्मद वहां उसे मिल गए। संयोग से वली मुहम्मद की जेब में महात्मा गांधी की एक तस्वीर थी और अचानक आदिवासी की नजर इस तस्वीर पड़ी तो उसने उस बूढ़े के तौर पर महात्मा गांधी की इसी फोटो की शिनाख्त कर दी । इस घटना से वली मुहम्मद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने महात्मा गांधी को एक संत महात्मा मानते हुए अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

‘बापू का सपना’ ऐसे बना था वली मुहम्मद की रिहाई की वजह
स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद की पहली जेलयात्रा और वहां से रिहाई का एक रोचक किस्सा भी इन किताबों में दर्ज है, जिसके मुताबिक असहयोग आंदोलन के दौर में उन्हें नागपुर जेल में रखा गया था। यहां से उन्हें गोंदिया जेल भेज दिया गया था।
इस दौरान उन्हें जेल में आभास हुआ कि उनके ग्राम गोरकापार की संत प्रवृत्ति की महिला महात्मा दाई उन्हें बड़ा व सोंहारी देते हुए कह रही है कि जन्माष्टमी पर तुम्हारी रिहाई हो जाएगी। इस घटना का रोचक पहलू यह है कि महात्मा दाई ने प्रत्यक्ष तौर पर यह बात गोरकापार गांव के लोगों को भी बताई थी कि पटवारी वली मुहम्मद जन्माष्टमी के दिन रिहा हो जाएंगे। वाकई ऐसा हुआ भी।


जब अंग्रेजों की कैद से रिहा होकर वली मुहम्मद गोरकापार पहुंचे तो उनका खूब स्वागत हुआ। इसके बाद वली मुहम्मद ने महात्मा दाई से मुलाकात की और उनसे अपने सपने के बारे में बताया। इस पर महात्मा दाई ने कहा कि उन्हें सपने में आकर बापू ने कहा था। इसके बाद से आसपास गांव में मशहूर हो गया कि महात्मा दाई को स्वप्न में आकर महात्मा गांधी निर्देश देते हैं। धीरे-धीरे चर्चा बढ़ी तो फिर आस-पास के तमाम स्वतंत्रता सेनानी गोरकापार पहुंच कर महात्मा दाई और वली मुहम्मद से निर्देश लेने लगे। तब से इस गांव का नाम गांधी गोरकापार हो गया।
डौंडी लोहारा में एकजुट किया स्वतंत्रता सेनानियों को
स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद ने बाद के दिनों में डौंडी लोहारा को अपना कर्मक्षेत्र चुना। दस्तावेजों के मुताबिक डौण्डीलोहारा जमींदारी में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट किया और लगभग 100 लोगों ने उनके साथ जेल यात्रा की थी। उनके प्रमुख सहयोगी बालोद के स्व. सूरज प्रसाद वकील रहे है। वहीं कुटेरा के स्व. कृष्णाराम ठाकुर और भेड़ी गांव के रामदयाल ने उनसे प्रेरणा लेकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था। 24 जुलाई 1957 को स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद का निधन डौंडी लोहारा में हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन में रहे मुखर, कई बार की जेलयात्रा
वली मुहम्मद स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बेहद मुखर रहे। उनके वंशजों के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक अंग्रेजी राज के विरोध के चलते 7 मार्च 1923 को उन्हें गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेज दिया गया। फिर वहां से उन्हें 23 जुलाई 1923 को अकोला नागपुर में स्थानांतरित कर दिया गया। इसी तरह 23 अक्टूबर 1939 से 24 नवंबर 1939 तक उन्हें रायपुर की केन्द्रीय जेल में रखा गया। अंतिम बार सन 1943 से 1945 तक पूरे दो साल तक उन्हें नागपुर जेल में कैद कर रखा गया। देश आजाद होने पर स्वतंत्रता आंदोलन में उनके इस विशिष्ट योगदान के लिए महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर के सभापति सेठ गोविंददास के हस्ताक्षर युक्त एक ताम्रपत्र 15 अगस्त 1947 को प्रदान किया गया। जो आज भी वली मुहम्मद के वंशजों के पास एक धरोहर के तौर पर रखा है।

 

शासकीय भवन, योजना अथवा नगर का नामकरण हो वली मुहम्मद के नाम पर
स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद के गुजरने के छह दशक बाद भी आज तक उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने किसी तरह का ठोस प्रयास नहीं हुआ है। वर्ष 1997 में जब देश में स्वतंत्रता की 50 वीं वर्षगांठ मनाई गई तो उनका नाम अंकित शिलालेख डौंडी लोहारा में लगाया गया।

उनके वंशजों में पौत्र और शिक्षा विभाग से रिटायर सहायक संचालक मुहम्मद अब्दुल रशीद खान बताते हैं कि डौंडी लोहारा में एक मुहल्ले का नाम वली मुहम्मद नगर रखने की पहल की गई थी लेकिन इस पर अब तक सरकारी मुहर नहीं लग पाई है।

वहीं लोहारा के स्कूल का भी नामकरण वली मुहम्मद के नाम पर करने की मांग लंबे समय से रही है। उन्होंने राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि शासन अपनी संवेदना का परिचय देते हुए स्व. वली मुहम्मद की स्मृति में किसी शासकीय भवन, योजना अथवा नगर का नामकरण करेगा। यही बापू के इस अनुयायी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(भिलाई में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन चर्चित किताब वोल्गा से शिवनाथ तक के लेखक हैं )