गुरु पूर्णिमा : कौन है “महान गुरु” महर्षि वेदव्यास

गुरुपूर्णिमा में पूजे जा रहे है गुरुजन

रायपुर। गुरु पूर्णिमा आज देश भर में मनाया जा रहा है। भारतवर्ष में पौराणिक काल से ही गुरु शिष्य परंपरा चली आ रही है, जो आज भी कायम है। पौराणिक काल की कथाओं में अनेक ऐसी कथाएं सुनने को मिलती है, जिसमें गुरु शिष्य परंपरा से ही एक शिष्य सफलता के चरम तक पहुंचता है। यानी बिना गुरु के ज्ञान के कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु की शिक्षा और उनके सम्मान के लिए मनाया जाता है।


गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे एक तथ्य यह भी है कि गुरु महर्षि वेदव्यास जिन्होंने महाभारत श्रीमद्भगवद्गीता और 18 अद्भुत पुराणों की रचना की थी, उनका जन्म भी आज ही की तिथि में हुआ था। शास्त्रों के मुताबिक आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म माना जाता है, इसीलिए हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाने लगा। और इस साल यह थी आज यानी 16 जुलाई को पड़ी है।

इन क्षेत्रों में आज भी कायम है गुरु शिष्य परंपरा
आज भी कई विधाओं में गुरु शिष्य परंपरा का निर्वहन किया जाता है। जिसमें संगीत, नृत्य, अभिनय, पेंटिंग, वाद्ययंत्र, आश्रम-शिक्षा, आध्यात्म दीक्षा में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन सभी अभ्यार्थी अपने गुरुओं की आराधना करने है। पूरे सम्मान के साथ उन्हें ईश्वर तुल्य समर्पण भावना से पूज कर उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते है।

ये है पूजा का विधान
स्नान कर साफ कपडे पहनकर पूजा करनी चाहिए। अपने गुरु को एक उचित स्थान पर लाल कपडे के ऊपर रखे। आसन पर बैठाकर उन्हें रोली,चंदन, कुमकुम, हल्दी, अक्षत से तिलक करे। जिसके बाद फूल माला अर्पण कर हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम करे। उचित वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर कुछ दक्षिणा यथासामर्थ्य देकर गुरु का आशीर्वाद लें।