नक्सलवाद पर गोली के साथ “बोली” से भी होगा प्रहार

डीआरजी के जवानों को दी जा रही गोंडी भाषा की ट्रेनिंग

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल समस्या से निपटने के लिए अब पुलिस और तैनात फोर्स बस्तर की स्थानीय भाषा का भी उपयोग करेगा। यानी बस्तर में अब सिर्फ गोली नहीं बल्कि बोली से भी पुलिस नक्सलियों पर प्रहार करने की तैयारी में है। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में बोल जाने वाली गोंडी की ट्रेनिंग क्लासेस पुलिस और फोर्स के जवानों के लिए लगाई जा रही हैं। जिसमें जवानों को गोंडी बोली की ट्रेनिंग दी जा रही है।

          इस ट्रेनिंग की सबसे अहम बात ये है कि ये ट्रेनिंग कोई और नहीं बल्कि नक्सलवाद से त्रस्त होकर आत्म समर्पित हुए नक्सली ही ये पूरी ट्रेनिंग दे रहे है। गोंडी के कई अहम शब्दों को हिंदी ट्रांसलेट कर बताया जा रहा है, साथ ही उन शब्दों के मायने और उपयोग के उचित स्थान की बारीकियां भी आत्मा समर्पित नक्सली बता रहे हैं।
मिली जानकारी के मुताबिक दंतेवाड़ा जिले के पुलिस लाइन में यह ट्रेनिंग क्लासेस शुरू की गई है। जिसमें डीआरजी यानी डिस्टिक रिजर्व गार्ड के जवानों को यह ट्रेनिंग दी जा रही है। डीआरजी को ट्रेंड इसलिए किया जा रहा है क्योंकि सभी जवान स्थानीय है और गोंडी भाषा से थोड़ा बहुत ताल्लुख़ भी रखते है। लिहाजा इन जवानों को गोंडी भाषा में पारंगत करने का जिम्मा पुलिस ने आत्मसमर्पण क्र मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को सौंपा है, जो इन जवानों को ट्रेंड कर रहे है।

माओवादी धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इन जवानों को उतारने की तैयारी पुलिस की है। इस ट्रेनिंग से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों से उनकी स्थानीय भाषा में संवाद कर उनकी समस्याओं को सुनने और उसे समझने के साथ ही उसके निराकरण के लिए प्रयास किए जाएंगे। इसके अलावा पुलिस अपने विश्वास ग्रामीणों के बीच कायम करने में भी सफल हो पाएगी।

इंटेरोगेशन में मिलेगी मदद
पुलिस द्वारा गिरफ्तार नक्सलियों से इंटेरोगेशन में भी यह ट्रेनिंग बहुत काम आएगी। बस्तर संभाग के अधिकतर नक्सली जो स्थानीय हैं उन्हें केवल गोंडी भाषा का ही ज्ञान होता है। कुछ इलाकों में हल्बी भाषा बोलने वाले नक्सल भी पुलिस के हत्थे चढ़े थे जिसके प्रशिक्षित जवान पुलिस के पास पहले ही बहुतायत संख्या में मौजूद है।

 

तैयार हो रही है डिक्शनरी
दंतेवाड़ा एसपी अभिषेक पल्लव के मुताबिक ट्रेनिंग के साथ ही 30 हज़ार शब्दों की एक डिक्शनरी भी तैयार की जा रही है। स्टेशनरी के साथ ही गोंडी भाषा की वाक्यों की एक किताब भी तैयार की जा रही है, जिसका अनुवाद हिंदी और अंग्रेजी भाषा में किया जा रहा है। जिससे इस ट्रेनिंग के बाद भी डीआरजी के जवानों को इस भाषा से मुखातिब करा कर नक्सल ऑपरेशन में कई अहम पहलू को जोड़ा जा सके। वहीं ग्रामीणों का विश्वास जीतने के लिए यह ट्रेनिंग बेहद अहम साबित होगी जिसके लिए पुलिस प्रयास कर रही है।