रक्षाबंधन विशेष : देवराज इंद्र से पहले इन्हे बाँधी गई थी राखी…

रक्षाबंधन पर जानिए इनसे जुडी प्रथा और पौराणिक कहानियां

रायपुर। हमारी पुरातन संस्कृति के इतिहास मे रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है। जिसकी महिमा विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर पुराणो मे भरी पड़ी है।
मूलतः राखी सौहार्द का सूचक तथा शुद्ध भावनाओ का पर्व है। आपने कभी विचार किया है कि रक्षाबंधन क्यो मनाते है?? बस सीधा सा उत्तर जानते है कि भाई बहन का त्यौहार है। लेकिन ऐसा नही है। रक्षाबंधन एक ऐसा बन्धन जिसमे हमे दुनिया के हर बुरे प्रभाव से बचाने की कामना रहती है।

                        यह केवल भाई बहनों का त्यौहार मात्र होता तो लोग अपने घर के देवी देवताओं को, पेड़ पौधों को, अपने गाड़ी वाहन आदि को, अपने घर के पालतू जानवरों को, अपने व्यापार व्यवसाय के क्षेत्र में तराजू, कलम व खाता बही में, कोई बहन अपने बच्चों को, कोई देश के सैनिकों को, कोई राजनेताओं को, कोई पुलिसकर्मियों को, कोई साधु संतों को भी रक्षाबंधन नही बांधते।

उपरोक्त का तात्पर्य यह है कि जीवन मे बन्धन आवश्यक है किसी भी प्रकार के बन्धन में प्यार, दुलार, ममता, आशीर्वाद, कामना आदि का भाव होता है जिसके कारण हम एक पतले से धागे में मन – कर्म और वचन से बन्ध जाते है। रक्षाबंधन एक दूसरे को मानसिक रूप से आश्वस्त करता है।

महामाया मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला ने इसकी प्रमाणीकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सबसे पहले वशिष्ठ जी ने चन्द्रभागा के तट पर अरुंधति को बांधा था। जो उनकी पत्नी थी। जिसका उल्लेख कालिका पुराण में है। फिर देवराज इंद्र को उनकी पत्नी इंद्राणी ने, देवगुरु बृहस्पति के कहने पर बांधी थी।

             इसी तरह की रक्षा का आश्वासन भगवान कृष्ण द्वारा द्रौपदी को दिया गया था जब द्रौपदी ने अपने साड़ी का पल्लू फाड़ कर भगवान के उंगली में बांधी थी। इस तरह यह सूत्र रक्षा का आशीर्वाद देने वाला सूत्र तथा एक दूसरे को बन्धन में बांध कर कर्तव्यों को जिम्मेदारी से निभाने का संकल्प देता है ।

श्रावणी उपाकर्म का दिन है रक्षाबंधन
भविष्य पुराण के अनुसार रक्षाबंधन के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी, सरयू, क्षिप्रा आदि तीर्थ महानदियो मे स्नान, तर्पण व दान आदि करने से ब्रह्मा लोक की प्राप्ति होती है। तीर्थ स्थल मे न जा पाने की स्थिति मे अपने घर के पवित्र जल मे ही सारे तीर्थो का स्मरण कर पुण्य स्नान को भी पुण्यदायी बताया गया है।

“हेमाद्रिकल्प” के अनुसार
पुण्य स्नान पश्चात धर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण-पुरोहित से स्वस्तिवाचन मंत्रोंच्चार युक्त रक्षासुत्र बंधवाना चाहिए । तथा श्रद्धा पूर्वक उनको भोजन करवाने के बाद दान करना चाहिए। मनुस्मृति व अनेक शास्त्रों मे श्रावण मास की पुर्णिमा को वैदिक कृत्य किये जाने का वर्णन है जिसे “श्रावणी उपाकर्म” कहते है। इसके अनुसार वेदधर्म निष्ठ ब्राह्मणो व अन्य यज्ञोपवीत धारियो को किसी श्रेष्ठ तीर्थ या पवित्र सरोवर मे जाकर वैदिक-पौराणिक पद्धति से उपाकर्म करना चाहिए।

प्रभावशाली मंत्र
रक्षासूत्र बांधते समय आचार्य-पुरोहित, एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है श्लोक में कहा गया है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबन्धन से मैं तुम्हें बांधता हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।

मन्त्र :
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनु बध्नामि रक्षेमाचल मा चल।

भगवान वामन व राजा बलि की कथा में रक्षाबंधन
जनमानस मे प्रचलित कथाओ के अनुसार राजा बलि द्वारा अपना सर्वस्व दान कर देने की दयालुता व भक्ति को देख भगवान वामन प्रसन्न हो गये। तथा उन्हें सुतल लोक का राजा बनाकर वरदान माँगने कहा। तो राजा बलि ने भगवान से कहा कि अपने राजमहल के चारो दरवाजे से जब भी आऊँ या जाऊँ तो आपका दर्शन हो। इस तरह भगवान सुतल लोक मे राजा बलि के राजमहल मे ही रहने लगे। सब स्थिति स्पष्ट होने पर चिंतित लक्ष्मी जी ने देवर्षि नारद जी के कथनानुसार सुतल लोक मे जाकर राजा बलि को राखी बाँधी तथा भगवान को वापस लेकर आयी।